स्वामित्व योजना पर कहां अटका पेच? पटवारी-सरकार के बीच क्या है विवाद, आसान भाषा में समझिए
प्रदेशभर में स्वामित्व योजना के जरिए 50 लाख प्रॉपर्टी की फ्री रजिस्ट्री का लक्ष्य रखा गया है. योजना के शुरू होने के 19 दिन बाद एक भी रजिस्ट्री नहीं हो पाई है. इसके पीछे बड़ा पेच फंसा हुआ है. आइए आपको इन प्वाइंट्स के जरिए पूरे विवाद को समझाते हैं.
मध्य प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं में शामिल स्वामित्व योजना का विवाद कम होने का नाम नहीं ले रहा है. योजना की शुरुआत के 19 दिन बाद भी प्रदेश में एक भी रजिस्ट्री नहीं हो सकी है. जबकि 17 सितंबर 2026 से प्रदेश में करीब 50 लाख प्रॉपर्टी की फ्री रजिस्ट्री कराने का लक्ष्य रखा गया था. पटवारियों के विरोध के चलते पूरी प्रक्रिया अटक गई है.
दरअसल, एमपी में स्वामित्व योजना की शुरुआत 17 सितंबर 2026 को इंदौर से मुख्यमंत्री ने खुद की थी. योजना का मकसद ग्रामीण इलाकों के आबादी वाले क्षेत्रों में जमीन और मकानों का सटीक सर्वे कराकर लोगों को उनकी संपत्ति का मालिकाना हक दिलाना है. इसके तहत लोगों को उनकी संपत्ति की प्रॉपर्टी आईडी या अधिकार अभिलेख उपलब्ध कराए जाने हैं. हालांकि, पटवारियों के विरोध के चलते योजना के तहत रजिस्ट्री की प्रक्रिया अब तक शुरू नहीं हो सकी है.
भोपाल में भी प्रक्रिया शुरू नहीं
जारी आंकड़ों के मुताबिक, राजधानी भोपाल में भी 41,726 रजिस्ट्रियां की जानी हैं, लेकिन पटवारियों के विरोध के चलते यहां भी प्रक्रिया शुरू नहीं हो सकी है. इतना ही नहीं, इस प्रक्रिया से तहसीलदार, नायब तहसीलदार और राजस्व निरीक्षकों ने भी खुद को अलग कर लिया है. ऐसे में योजना को लेकर पूरा पेंच पटवारियों की आपत्तियों पर आकर अटक गया है. आखिर पटवारियों की वे कौन-कौन सी मांगें और आपत्तियां हैं, जिनके चलते स्वामित्व योजना की रजिस्ट्री प्रक्रिया शुरू नहीं हो पा रही है.
ऐसे समझिए कहां फंसा पेच?
1. पटवारियों की मांग थी, कि रजिस्ट्री उनके या व्यक्तिगत स्तर पर दर्ज होने के बजाय सीधे सरकार के नाम पर दर्ज की जाए. इसे सरकार ने मान भी लिया था, लेकिन उसके बाद भी कानूनी दस्तावेज में पटवारी का नाम नहीं हटा है. पटवारी संघ के अध्यक्ष उपेंद्र बघेल का कहना है कि नई डीड में भी नाम है.
2. दूसरी सबसे बड़ी बात यह है कि एमपी पंजीयन विभाग सालभर में 15 लाख रजिस्ट्रियां करता है. लेकिन स्वामित्व योजना के जरिए एक महीने में 50 लाख रजिस्ट्रियां कराने का लक्ष्य रखा गया है. पटवारियों का कहना है कि इतने कम समय में इतना बड़ा लक्ष्य कैसे होगा. इसमें गड़बड़ी होने की भी आशंका है. इसलिए भोपाल में गांव-गांव सारा ऐप से रजिस्ट्री के लिए कैंप लगने थे, लेकिन इस विरोध के चलते कैंप शुरू नहीं हो सके.
3. तीसरा सबसे बड़ा प्वाइंट यह है कि रजिस्ट्री प्रक्रिया में पटवारी को निष्पादक बनाया गया है. अगर भविष्य में उस संपत्ति पर कभी भी विवाद खड़ा हुआ तो कर्मचारी-अधिकारी कानूनी कार्रवाई में फंस सकते हैं. इसके अलावा, अगर उसमें गलती होती है, तो गलती सुधारने के लिए सिविल कोर्ट जाना पड़ सकता है. इसलिए संघ लीगल प्रोटेक्शन यानी हितों को दी जाने वाली सुरक्षा चाहता है.
4. चौथा सबसे बड़ा प्वाइंट यह है कि अगर जमीन का रिकॉर्ड अधूरा या पुराना है, इसकी रजिस्ट्री करने में भी काफी झंझट होगा. क्योंकि कई जगह आधार व अधिकार अभिलेख में नाम अलग है, तो कहीं पिता या पति का नाम नहीं है. सर्वे के बाद बिकी कई संपत्तियों में नए मालिक का नाम भी दर्ज नहीं हुआ है. इसमें अधिकारी सबसे पहले रिकॉर्ड सुधारने की मांग कर रहे हैं.
5. स्वामित्व योजना-2020 के तहत जारी अधिकार अभिलेख पहले से ही वैधानिक दस्तावेज हैं. इनका इस्तेमाल बैंक लोन समेत कई जरूरी कामों में किया जा सकता है. ऐसे में जब जमीन के मालिकाना हक का रिकॉर्ड पहले से मौजूद है, तो उसके लिए अलग से रजिस्ट्री कराने की जरूरत क्यों पड़ रही है. इस पर सवाल उठ रहे हैं. तर्क यह है कि पहले से मान्य अधिकार अभिलेख के बावजूद नई रजिस्ट्री की प्रक्रिया लोगों पर अतिरिक्त कागजी कार्रवाई और खर्च का बोझ डाल सकती है.