धर्म और रिलीजन में बड़ा अंतर...उज्जैन में बोले RSS प्रमुख मोहन भागवत-गीता और रामायण बुढ़ापे की नहीं, जीवन का आधार
उज्जैन में आयोजित तीन दिवसीय युवा धर्म संसद का शुभारंभ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने किया. सेवाज्ञ संस्थान की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में मोहन भागवात ने धर्म, राष्ट्र और समाज से जुड़े विभिन्न विषयों पर युवाओं से संवाद किया.
धर्म और रिलिजन में बड़ा अंतर है. धर्म रिलीजन के ऊपर है...ये बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने उज्जैन में आयोजित 'युवा धर्म संसद' को संबोधित करते हुए कही. उन्होंने कहा कि भारत का सनातन 'धर्म' और पश्चिमी अवधारणा 'रिलीजन' दो अलग बातें हैं. उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म किसी को बांधता नहीं बल्कि मुक्त करता है, जबकि रिलीजन अनुशासन के दायरे में बांधने का काम करता है. संघ प्रमुख ने इस धारणा को भी खारिज किया कि धर्म का पालन केवल वृद्धावस्था में किया जाना चाहिए.
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता और रामायण केवल रिटायरमेंट के बाद पढ़ने वाले ग्रंथ नहीं हैं, बल्कि यह मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक पूरे जीवन का मार्गदर्शन करने वाला वास्तविक आधार हैं. जब कोई व्यक्ति अहंकार में आकर नियमों की अनदेखी करता है तो वह भ्रम का शिकार होता है, जबकि पूरी सृष्टि धर्म और नीतिगत नियमों से ही संचालित होती है.
धर्म और रिलीजन के बीच अंतर
RSS प्रमुख मोहन भागवत ने धर्म और रिलीजन के बीच का अंतर बताते हुए कहा कि, धर्म रिलीजन से ऊपर है. उन्होंने गुरुदेव रानाडे का उल्लेख करते हुए कहा कि, वे इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में डीन ऑफ फिलॉसफी और एक साक्षात्कारी महापुरुष थे. गुरुदेव रानाडे कहा करते थे कि 'हर धर्म के ऊपर एक और धर्म है.' भागवत ने कहा कि, 'उस रिलीजन को देखकर ये रिलीजन चलेंगे तो ठीक रहेगा'. क्योंकि उनके समय अंग्रेजी भाषा में धर्म के लिए कोई समय, कोई शब्द नहीं था, आज भी नहीं है. उस समय हमारे देश पर अंग्रेजों का राज था और जिनको समझाना था कि हमारी विरासत श्रेष्ठ है. इसलिए उन्होंने 'रिलीजन' शब्द का इस्तेमाल किया...धर्म रिलीजन के ऊपर है. जब रिलीजन धर्म के अनुसार चलते हैं तो रिलीजन मनुष्य को मुक्ति दिलाते हैं. जब रिलीजन धर्म को छोड़कर चलते हैं, तब फिर सांप्रदायिक कलह होते हैं. धर्म के नाम पर सब प्रकार के अत्याचार होते हैं...रिलीजन शब्द का अर्थ अलग है. रिलीजन रिलीजियो से आया है, जिसका मतलब बांधना होता है और एक अनुशासन में रखना होता है, उसको कहते हैं रिलीजियो.
'धर्म बांधता नहीं'
आगे उन्होंने कहा कि, धर्म बांधता नहीं है, धर्म मुक्त करता है. धर्म का 'धृ' शब्द से शब्द आया है. धारणा करना यह होता है और इसलिए ये जो हमारे मन में सैकड़ों वर्षों की आत्मविस्मरण के कारण और दो सौ वर्षों की कुसंस्कार के कारण जो गांठें बनी हैं, जो परत बनी है, जो सत्य ज्ञान को अंदर आने नहीं देती... 'मोहन भागवत ने कहा कि, 'मैं कहता हूं कि धर्म को समझना है तो हम लोगों को पहले कुछ बातें जो अपने मन में बैठी हैं, उससे मुक्त होना पड़ेगा. एक बात का उल्लेख मैंने किया, धर्म ये बुढ़ापे की बात नहीं है. सृष्टि के अस्तित्व से धर्म है, सृष्टि के विलय तक निश्चित चलेगा. सब कुछ उसी से चलता है. मेरे लिए मेरा धर्म मेरे जन्म से निश्चित है, मेरे मृत्यु तक वो रहेगा...धर्म सभी सुख का कारण है. इतना बड़ा महाभारत, इतिहास जो बताया गया? व्यास महर्षि के द्वारा, क्यों बताया गया? लोगों को धर्म समझ में आए इसलिए. महाभारत में भगवद् गीता है, कर्तव्य का उपदेश है, कर्मयोग का उपदेश है और महाभारत के अंत में पांच श्लोक हैं, उसको भारत सावित्री कहते हैं, वो कहते हैं कि महाभारत का सार है...'