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न हार-जीत... फिर भी चलते हैं बारूद के गोले: इंदौर के गौतमपुरा में कैसे होता है 'हिंगोट युद्ध'? जानिए 'तुर्रा और कलंगी' दल की कहानी

मध्य प्रदेश के इंदौर जिले के गौतमपुरा में दिवाली के अगले दिन हिंगोट युद्ध होता है, जिसमें योद्धा एक दूसरे पर बारूद से भरे हिंगोट बरसाते हैं. इस युद्ध में न किसी की हार होती है और न ही किसी की जीत.

Written By Sumit Rai
Published: Nov 06, 2026, 11:31 AM IST | Updated: Nov 06, 2026, 01:14 PM IST
Image Credit: दिवाली के अगले दिन हिंगोट युद्ध होता है
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भारत देश में त्योहारों पर कई अलग-अलग परंपराएं निभाई जाती हैं. इस बीच कुछ ऐसी परंपराएं भी हैं, जो अपने आप में सबसे अलग हैं और सबको हैरान कर देने वाली हैं. ऐसे ही दीपावली के दूसरे दिन यानी पड़वा पर मध्य प्रदेश के इंदौर जिले के गौतमपुरा में हिंगोट युद्ध होता है, जिसमें योद्धा एक-दूसरे पर बारूद से भरे हिंगोट बरसाते हैं, लेकिन इस युद्ध की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें न किसी की हार होती है और न ही किसी की जीत. यह युद्ध आपसी भाईचारे की भी एक अनूठी मिसाल है.

सबसे बड़ी बात तो यह होती है कि इस युद्ध में ना तो कोई आयोजक होता है और ना ही कोई प्रायोजक होता है. युद्ध रूपी यह परंपरा सालों से आज भी आधुनिक युग तक चली आ रही है. इस युद्ध को लेकर योद्धा एक माह पूर्व ही तैयारी में जुट जाते हैं. यह युद्ध कब शुरू हुआ? किसी को नहीं पता, लेकिन बुजुर्ग बताते हैं कि उनके भी बाप-दादाओं के जमाने से यह परंपरा चली आ रही है.

जोखिम और खतरों से कम नहीं युद्ध

यह युद्ध किसी जोखिम से कम और खतरों से खाली नहीं है, लेकिन इसके बाद भी लोग दूर-दूर जंगलों में जाकर युद्ध के लिए हिंगोनिया नामक पेड़ से फल तोड़कर लाते हैं. फल का गूदा निकाला जाता है और उन्हें सुखाया जाता है. इसके बाद योद्धा फल के आंदर बारूद भरते हैं और फिर उसके आखिरी सिरे पर पीली मिट्टी लगाकर पैक किया जाता है.

ऐसे तैयार होता है हिंगोट

हिंगोट युद्ध में दो योद्धा दल होते हैं. एक योद्धा दल का नाम तुर्रा होता है, तो दूसरे योद्धा दल का नाम कलंगी होता है. दोनों ही दल के योद्धा सर पर पगड़ी और हेलमेट लगाकर युद्ध में जाने की तैयारी करते हैं. इससे पहले घर की माताएं-बेटियां तिलक लगाकर उन्हें युद्ध मैदान में भेजती हैं. दोनों ही दल के योद्धा सबसे पहले युद्ध मैदान के पास स्थित भगवान देवनारायण के मंदिर जाते हैं और भगवान का आशीर्वाद लेकर युद्ध के लिए मैदान में पहुंचते हैं.

फिर शुरू हो जाता है हिंगोट युद्ध

भगवान से आशीर्वाद लेने के बाद योद्धा मैदान में उतरते हैं और एक-दूसरे पर हिंगोट फेंकते हैं. इस युद्ध में कई बार योद्धा के साथ-साथ कई दर्शक भी घायल हो जाते हैं. ऐसे में उनकी सुरक्षा के लिए बड़ी-बड़ी जालिया लगाई जाती हैं और स्वास्थ विभाग का अमला एंबुलेंस के साथ तैयार रहता है. हिंगोट युद्ध को लेकर प्रशासन भी अपनी तैयारी रखता है. युद्ध मैदान में बड़ी संख्या में बैरिकेडिंग और बड़ी-बड़ी जालियां लगाने के साथ ही मैदान में सीसीटीवी कैमरे भी लगाए जाते हैं, ताकि चप्पे-चप्पे पर निगरानी रखी जा सके.

न हार-जीत... फिर भी चलते हैं बारूद के गोले

इस युद्ध की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि इस युद्ध का ना तो कोई आयोजक होता है और ना ही कोई प्रायोजक होता है. इतना ही नहीं, इस युद्ध में दो दल होते हैं. आमने-सामने हिंगोट फेंककर युद्ध भी होता है, लेकिन इस युद्ध में ना तो किसी की हार होती है और ना ही किसी की जीत होती है, जिसे भाईचारे का सबसे बड़ा प्रतीक भी माना जाता है. (इनपुट- यत्नेश सेन)

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न्यूज़ मीडिया में 13 सालों से अधिक के अनुभव के साथ सुमित राय एक डिजिटल पत्रकार हैं. वर्तमान में सुमित राय Zee News (MP-CG) की डिजिटल टीम के लीड की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की राजनीति, प्रशासनिक फैसलों, क्राइम और हाइपरलोकल मुद्दों के सटीक और गहरे विश्लेषण पर उनकी मजबूत पकड़ है.भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (MCU) से जर्नलिज्म में मास्टर डिग्री पूरी करने के बाद सुमित ने मीडिया जगत में अपनी पहचान बनाई. अपने करियर के दौरान उन्होंने राजस्थान पत्रिका, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, एनडीटीवी और लोकमत हिंदी जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया है. ग्राउंड रिपोर्टिंग के साथ-साथ जटिल राजनीतिक और सामाजिक घटनाक्रमों पर आसान भाषा में 'एक्सप्लेनर' और 'ओपिनियन' लिखना उनकी मुख्य पहचान है. वे न्यूज़ डेस्क मैनेजमेंट और क्वालिटी एश्योरेंस के उच्च मानकों को बनाए रखते हैं, ताकि पाठकों तक प्रामाणिक, निष्पक्ष और तथ्य-आधारित खबरें ही पहुंचे.सुमित राय से संपर्क करने के लिए आप उन्हें sumit2.kumar@zeemedia.com पर ईमेल कर सकते हैं. इसके अलावा, आप एक्स (ट्विटर), फेसबुक और लिंक्डइन पर उनके हैंडल @imSumitKRai के जरिए उनसे सीधे जुड़ सकते हैं.
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