SIR, CAA और जनगणना के बीच NRC की गूंज: जानिए क्या है संघ का प्लान और ओवैसी का डर?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने पूरे देश में एनआरसी लाने की मांग उठाई है. जबकि ओवैसी का आरोप है कि यह 'बैकडोर NRC' है. इस वजह से एक बार फिर नागरिकता की बहस तेज हो गई है. समझिए क्या है आबादी के असंतुलन का तर्क और इस नए विवाद की कहानी.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने पूरे देश में NRC लागू करने की मांग की है. आरएसएस का कहना है कि आबादी के असंतुलन को ठीक करने और देश की एकता, अखंडता और सुरक्षा की रक्षा के लिए नागरिकों की पहचान करना जरूरी है. 30 सितंबर को इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर द आर्ट्स (IGNCA) में एक कार्यक्रम के दौरान RSS के प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने कहा, 'जब (आबादी के असंतुलन के) समाधान पर चर्चा होती है, तो कहा जाता है कि एक NRC होना चाहिए.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, आंबेकर ने कहा कि उन लोगों की पहचान करने की जरूरत है, जिन्हें वोटर लिस्ट में गलत तरीके से शामिल किया गया था और उन लोगों की नागरिकता पक्की करने की जरूरत है जो सिटिजनशिप अमेंडमेंट एक्ट (CAA) के तहत पड़ोसी देशों से भारत आए हैं.
उनकी यह टिप्पणी चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर मचे भारी राजनीतिक विवाद के बीच आई है. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने SIR प्रक्रिया से जुड़े फैसलों और तरीकों पर 10 महीनों में कम से कम 14 बार आपत्तियां जताई थीं.
अपनी बात के समर्थन में आंबेकर ने कहा कि भारत का बंटवारा आबादी के असंतुलन के कारण हुआ था. 1947 के बाद जो पड़ोसी देश इस्लामिक देश बन गए, वहां जो लोग पीछे छूट गए, उनमें से कई SC/ST और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के थे और उन्हें लगातार उत्पीड़न का सामना करना पड़ा.
उन्होंने कहा, 'जो लोग वापस आए हैं, उनके लिए CAA के जरिए नागरिकता पक्की करना जरूरी है. NRC के जरिए ऐसे लोगों की पहचान करना जरूरी है. अगर लोगों को वोटर लिस्ट में गलत तरीके से शामिल किया गया है, तो उनकी पहचान करना जरूरी है.'
NRC क्या है?
नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स यानी NRC एक सरकारी रजिस्टर है, जिसमें भारतीय नागरिक के तौर पर पहचाने गए लोगों की जानकारी होती है. 1951 की जनगणना के बाद एक NRC तैयार किया गया था. बाद में असम में इस प्रक्रिया को खास अहमियत दी गई, क्योंकि वहां माइग्रेशन (प्रवास) और 1985 के असम समझौते को लेकर चिंताएं थीं.
2019-20 में CAA और प्रस्तावित NRC के खिलाफ देशव्यापी विरोध-प्रदर्शनों के बाद NRC राजनीतिक एजेंडे में शामिल नहीं रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिसंबर 2019 में कहा था कि सत्ता में आने के बाद से उनकी सरकार ने NRC पर कोई चर्चा नहीं की है, और बाद में BJP ने अपने 2024 के चुनावी घोषणापत्र से भी इस प्रस्ताव को हटा दिया.
हालांकि, जनगणना की मौजूदा प्रक्रिया के साथ NRC पर बहस फिर से शुरू हो गई है. जनगणना प्रश्नावली में कई ऐसे सवाल शामिल हैं, जो 2020 के NPR (नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर) शेड्यूल का भी हिस्सा थे, जैसे कि राष्ट्रीयता और माता-पिता का विवरण, आधार और वोटर ID। कानूनी ढांचे में भारतीय नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर को तैयार करने के लिए पॉपुलेशन रजिस्टर के वेरिफिकेशन का प्रावधान है, जिसमें उन मामलों की पहचान करना भी शामिल है जहां नागरिकता संदिग्ध मानी जा सकती है.
सरकार ने देशव्यापी NRC के बारे में आधिकारिक तौर पर कुछ भी घोषित नहीं किया है. NPR प्रक्रिया, जिसे 2021 की जनगणना के साथ ही किया जाना था, उसे कोविड-19 महामारी के दौरान टाल दिया गया था और जनगणना प्रक्रिया के दोबारा शुरू होने पर इसके लिए कोई नई अधिसूचना जारी नहीं की गई.
असम अलग क्यों है?
नागरिकता नियमों के तहत असम में NRC की एक विशेष प्रक्रिया है. अपडेटेड असम NRC में ऐसे दस्तावेजों और रिकॉर्ड्स का इस्तेमाल किया गया जो 24 मार्च 1971 या उससे पहले असम में किसी व्यक्ति या उनके पूर्वज की मौजूदगी को साबित करते हों. इनमें 1951 का NRC और उस तारीख तक की वोटर लिस्ट (इलेक्टोरल रोल) के साथ-साथ तय किए गए सहायक दस्तावेज भी शामिल थे.
RSS का सालों से यह मानना रहा है कि देशव्यापी NRC लागू किया जाना चाहिए. 2019 में, तत्कालीन RSS महासचिव सुरेश भैयाजी जोशी ने कहा था कि जो लोग भारतीय नागरिक नहीं हैं, उनकी पहचान करने के लिए NRC तैयार करना सरकार की जिम्मेदारी है. बाद में 2021 में RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि NRC का मकसद यह तय करना है कि असली नागरिक कौन हैं और इसे हिंदू-मुस्लिम मुद्दे के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए.
ओवैसी ने खोला मोर्चा
AIMIM प्रमुख और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने शनिवार को आरोप लगाया कि वोटर लिस्ट का SIR असल में पिछले दरवाजे से NRC लागू करने की कोशिश है. उन्होंने दावा किया कि इस प्रक्रिया का इस्तेमाल आगे चलकर NRC लागू करने के आधार के तौर पर किया जाएगा. पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी समेत विपक्ष के कई नेताओं ने भी SIR को NRC से जोड़ा है. ओवैसी ने कहा कि दूसरी पार्टियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने का फैसला भविष्य में लिया जाएगा, लेकिन उन्होंने SIR प्रक्रिया का विरोध जारी रखने की बात दोहराई.
ओवैसी ने ANI से कहा, 'हम कंधे से कंधा मिलाकर चलेंगे या नहीं, यह भविष्य की बात है. हालांकि, हम शुरू से ही कह रहे हैं कि SIR पिछले दरवाजे से NRC है. मैं फिर दोहराता हूं कि देश के गृह मंत्री ने एक कमीशन बनाया है,जिसके प्रमुख सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज हैं. उन्हें उन इलाकों में आबादी में हुए बदलावों की जांच करने का काम सौंपा गया है जहां फाइनल NRC लागू किया गया था. गृह मंत्री ने कहा है कि वे फाइनल NRC लिस्ट की समीक्षा करेंगे.'
'SIR से 100 गुना बुरा'
देश भर में NRC को लेकर बातचीत की अटकलों के बीच, ओवैसी उन्होंने पहले कहा था कि NRC '100 गुना ज्यादा बुरा' होगा. हैदराबाद के सांसद ने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया से पहले ही बहुत परेशानी हुई है, खासकर अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और प्रवासियों को. ओवैसी ने कहा कि NRC सभी को लाइन में खड़ा होने और अपनी नागरिकता साबित करने के लिए मजबूर करेगा. उन्होंने सवाल किया कि खाने के लिए राशन पर निर्भर लोग दस्तावेज कैसे ढूंढ पाएंगे और अपनी नागरिकता कैसे साबित कर पाएंगे.
उन्होंने कहा, 'NRC सभी को लाइन में खड़ा होने और अपनी नागरिकता साबित करने के लिए मजबूर करेगा. ऐसे देश में जहां 80 करोड़ लोग खाने के लिए राशन पर निर्भर हैं, आप चाहते हैं कि वे दस्तावेज ढूंढें और अपनी नागरिकता साबित करें? किस मकसद से?'
ओवैसी ने आरोप लगाया कि सरकार चाहती है कि इस प्रक्रिया के दौरान लोग सरकारी अधिकारियों की दया पर निर्भर रहें. उन्होंने कहा, 'हम अब SIR के साथ एक त्रासदी देख रहे हैं, जिसमें आम लोगों को दस्तावेजों के साथ सुनवाई में शामिल होने के लिए मजबूर किया जा रहा है.'