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तूफान अर्नब भी नहीं डिगा पाया महाप्रभु भगवान जगन्नाथ की परंपरा: 214 फीट ऊंचे शिखर पर ध्वज में बनी रहस्यमयी गांठ, क्या है ‘शून्य ग्रंथि’?

चक्रवात अर्नब के चलते ओडिशा के कई इलाकों में जनजीवन प्रभावित हुआ है. खासकर धार्मिक महत्व से देखें तो भगवान विष्णु के चारों धामों से एक श्री जगन्नाथपुरी में स्थित भगवान के मंदिर के शिखर पर लगे पतितपावन ध्वज को तूफानी हवाओं के बीच बदला गया. इस बीच ध्वज में गांठ जैसी आकृति बनने के बाद ‘शून्य गांठ’ की धार्मिक मान्यता की चर्चा हो रही है. आइए जानते हैं इस अनोखी घटना से जुड़ी मान्यता.

Written By Shwetank Ratnamber
Published: Oct 29, 2026, 07:32 AM IST | Updated: Oct 29, 2026, 10:01 AM IST
Image Credit: जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर लगा ध्वज (AI)
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चक्रवात 'अर्नब' का असर ओडिशा में भी देखने को मिला है. अर्नब के गुजरने के बाद भी कई राज्यों में मौसम संबंधी मुश्किलें बनी हुई हैं. इस बीच ओडिशा में भगवान जगन्नाथ महाप्रभु के मंदिर में दिलचस्प नजारा दिखा, यहां आंधी-तूफान सैकड़ों साल पुरानी परंपरा को रोक नहीं पाए. विश्वप्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर में तूफान-तेज हवाओं के बावजूद मंदिर का ध्वज बदलने की परंपरा निभाई गई. करीब 214 फीट ऊंचे मंदिर के शिखर पर पहुंचकर चुनरा सेवक ने नीलचक्र पर लगे पतितपावन ध्वज को बदला. इसी दौरान ध्वज पर रहस्यमयी गांठ दिखी. 

धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, इस ध्वज को प्रतिदिन सूर्यास्त से पहले बदलना जरूरी होता है. खराब मौसम के बावजूद परंपरा निभाए जाने से श्रद्धालुओं में खूब उत्साह देखा गया. वहीं रहस्यमयी गांठ को लेकर भी भक्तों में जिज्ञासा नजर आई.

चक्रवात के बीच जगन्नाथ मंदिर का ध्वज परिवर्तन

मंदिर के ध्वज में चमत्कारी गांठ.

तेज हवाओं में भी न रुकी परंपरा.

नीलचक्र पर ध्वज बदलने की रस्म.

ध्वज की गांठ ने बढ़ाई जिज्ञासा.

चक्रवात अर्नब के चलते तेज हवाओं ने मंदिर परिसर और आस-पास के इलाके को भी प्रभावित किया. मंदिर के शिखर पर लगी पवित्र पतितपावन ध्वजा तेज हवा के कारण फट गई. इसी दौरान ध्वजा में ‘शून्य गांठ’ बन गई. 

वहीं, श्रद्धालुओं की ओर से मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना के साथ नीलचक्र पर बांधी गईं सैकड़ों छोटी-छोटी पताकाएं भी टूटकर मंदिर के ऊपरी हिस्से पर जा गिरीं.

शून्य गांठ या ब्रह्म गांठ

प्राचीन ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, पतितपावन ध्वजा में शून्य गांठ बनना शुभ संकेत माना जाता है. तेज हवा चलने पर जब दो या उससे अधिक ध्वजाएं आपस में उलझकर गांठ का रूप ले लेती हैं, तो इसे शून्य गांठ कहा जाता है. आंधी-तूफान और भारी बारिश के दौरान ऐसा होने की संभावना रहती है. इसे ब्रह्म गांठ भी कहा जाता है.

मंदिर में काम करने का सौभाग्य प्राप्त करने वाले सेवादारों में से एक ने बताया कि अमूमन ऐसी गांठ का वजन 5 से 10 किलोग्राम तक हो सकता है. हालांकि, अब ऐसा घटनाक्रम पहले की तुलना में कम देखने को मिलता है, क्योंकि ध्वजाओं की लंबाई घटाकर करीब 14 हाथ कर दी गई है. उन्होंने ये भी बताया कि पहले जब रोजाना 51 हाथ या 150 हाथ लंबी ध्वजाएं चढ़ाई जाती थीं, तब ऐसी गांठें ज्यादा बनती थीं.

क्या है मान्यता?

परंपरागत मान्यताओं के मुताबिक, पतितपावन ध्वज में शून्य गांठ बनना शुभ संकेत माना जाता है. श्रद्धालु इसे बड़ी विपत्ति टलने और भगवान के आशीर्वाद से भी जोड़कर देखते हैं. मौके पर मौजूद कुछ भक्तों ने ध्वजा में गांठ लगने की घटना को भगवान जगन्नाथ की कृपा का संकेत बताया. एक श्रद्धालु ने कहा, 'महाप्रभु भगवान जगन्नाथ हम सभी की रक्षा करेंगे. इस गांठ का मतलब है कि चक्रवात अर्नब कमजोर पड़ जाएगा और इससे ज्यादा नुकसान नहीं होगा.'

सेवादार के मुताबिक, कोरोना महामारी के दौरान भी तेज हवाओं और भारी बारिश के बीच मंदिर में करीब 5.5 किलोग्राम वजन की शून्य गांठ बनी थी. उस समय ओडिशा में भी काफी उथल-पुथल का माहौल था. लेकिन जगत के स्वामी 'जगन्नाथ' ने सबकुछ संभाल लिया था.

मंदिर के अंदर नहीं जाती समंदर की आवाज

इसी मंदिर से जुड़ी एक और ऐसी मान्यता भी है, जो सुनने में किसी रहस्य से कम नहीं लगती. कहा जाता है कि मंदिर के सिंहद्वार के बाहर खड़े होकर समंदर की लहरों का शोर सुनाई देता है, लेकिन जैसे ही मंदिर परिसर में प्रवेश करते हैं, यह आवाज सुनाई देनी बंद हो जाती है. इस मान्यता से जुड़ी कथाएं आज भी प्रचलित हैं.

पौराणिक दंतकथाओं के मुताबिक अमूमन भगवान के मंदिरों में उनकी अर्धांगिनी की मौजूदगी होती है, लेकिन जगन्नाथ मंदिर की महिमा और लोकरीति सबसे निराली है. भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं. एक कथा के मुताबिक भगवान जगन्नाथ की बहन देवी सुभद्रा जी यह चाहती थीं कि मंदिर के भीतर शांति रहे. समुद्र की गर्जना से उनकी शांति में खलल पड़ता था. 

यही कथा रुद्रावतार हनुमानजी से भी जुड़ती है. एक लोककथा के अनुसार, नारद मुनि ने भगवान जगन्नाथ को चिंतित देखा. कारण पूछने पर पता ये चला कि समुद्र की तेज आवाज से प्रभु को परेशानी होती है. 

तब नारद जी ने हनुमान जी से इसका उपाय करने को कहा. हनुमान जी समुद्र देव के पास पहुंचे. यूं तो समुद्र देव रामचरित मानस में वर्णित दोहा- 'बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति। बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति. यानी भगवान राम के बाण की शक्ति देख चुके थे. तब उन्होंने लंका तक जाने के लिए सागर में सेतु बनाने का उपाय बताया था. वही भगवान जब जगन्नाथ के रूप में आए तो हनुमानजी को ये बताया गया कि समुद्र की गर्जना रोकने के लिए हवा की दिशा बदलनी होगी. 

इसके बाद हनुमान जी ने अपनी शक्ति से हवा के बहाव को प्रभावित किया, जिससे समुद्र की आवाज मंदिर तक पहुंचनी बंद हो गई.

बेणी हनुमान की कथा

एक बार सभी देवी-देवता सहित मनुष्यों और गंधर्व भी भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए पुरी धाम पहुंचे. समुद्र देव को भी भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने की अभिलाषा हुई और वह मंदिर में प्रवेश कर गए. इस कारण मंदिर में अव्यवस्था हुई, वहीं भक्तों को भी समस्या का सामना करना पड़ा. 

तब भगवान जगन्‍नाथ ने हनुमानजी को पुरी की रक्षा की जिम्मेदारी सौंपी. वो समुद्र तट पर बैठकर राम-नाम का जाप करते. हालांकि इसमें एक पेंच ये था कि जब भी हनुमानजी को किसी भक्त के मुंह से रामजी का नाम या भजन सुनाई पड़ता, तो फौरन वहीं चले जाते. तब मौका पाते ही समुद्र देव मंदिर के अंदर पहुंच जाते. तब भगवान ने उन्हें लोहे की बेड़ियों से बांध दिया, ताकि वो समुद्र की निगरानी करें. यहां बेड़ी, हनुमानजी का भगवान से भक्तिभाव का बंधन दिखाती है. तभी से हनुमानजी यहां 'बेड़ी हनुमान' के नाम से जाने जाते हैं.

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About the Author

श्वेतांक रत्नाम्बर वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें टीवी और डिजिटल न्यूज़ मीडिया में 22 वर्षों से ज्यादा का व्यापक अनुभव है. वर्तमान में वे Zee News (Hindi) की डिजिटल टीम में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय (देश-दुनिया) खबरों की डेस्क पर कार्यरत हैं. समसामयिक मुद्दों, वैश्विक राजनीति और कूटनीति पर गहरी समझ रखने वाले श्वेतांक जटिल अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों और राजनीतिक समीकरणों का सटीक विश्लेषण करने के विशेषज्ञ हैं.Zee News डिजिटल से पहले उन्होंने ज़ी मीडिया नेटवर्क के ग्लोबल न्यूज़ चैनल 'WION' के साथ काम किया है. इस दौरान उन्होंने 'Gravitas', 'The West Asia Post' और 'One Africa' जैसे कई प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय प्राइम-टाइम शोज़ के हिंदी प्रोडक्शन और इंटरप्रिटेशन में अहम भूमिका निभाई. 2004 से शुरू हुए अपने पत्रकारिता करियर में श्वेतांक ने रिपोर्टिंग और एंकरिंग के साथ-साथ चार लोकसभा और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की व्यापक ग्राउंड कवरेज की है.जामिया मिल्लिया इस्लामिया (JMI), नई दिल्ली से जर्नलिज्म में पीजी डिप्लोमा के बाद मास कम्युनिकेशन और पॉलिटिकल साइंस में मास्टर्स डिग्री हासिल करने वाले श्वेतांक लंबे समय से 'प्रेस क्लब ऑफ इंडिया' (PCI) के सम्मानित सदस्य हैं.आप श्वेतांक रत्नाम्बर से सीधे shwetank.ratnamber@india.com पर ईमेल के जरिए संपर्क कर सकते हैं. इसके अलावा आप उनसे एक्स (ट्विटर), मेटा (फेसबुक) और लिंक्डइन पर भी कनेक्ट कर सकते हैं.' 
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