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चक्रवात 'अर्नब' का असर ओडिशा में भी देखने को मिला है. अर्नब के गुजरने के बाद भी कई राज्यों में मौसम संबंधी मुश्किलें बनी हुई हैं. इस बीच ओडिशा में भगवान जगन्नाथ महाप्रभु के मंदिर में दिलचस्प नजारा दिखा, यहां आंधी-तूफान सैकड़ों साल पुरानी परंपरा को रोक नहीं पाए. विश्वप्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर में तूफान-तेज हवाओं के बावजूद मंदिर का ध्वज बदलने की परंपरा निभाई गई. करीब 214 फीट ऊंचे मंदिर के शिखर पर पहुंचकर चुनरा सेवक ने नीलचक्र पर लगे पतितपावन ध्वज को बदला. इसी दौरान ध्वज पर रहस्यमयी गांठ दिखी.
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, इस ध्वज को प्रतिदिन सूर्यास्त से पहले बदलना जरूरी होता है. खराब मौसम के बावजूद परंपरा निभाए जाने से श्रद्धालुओं में खूब उत्साह देखा गया. वहीं रहस्यमयी गांठ को लेकर भी भक्तों में जिज्ञासा नजर आई.
मंदिर के ध्वज में चमत्कारी गांठ.
तेज हवाओं में भी न रुकी परंपरा.
नीलचक्र पर ध्वज बदलने की रस्म.
ध्वज की गांठ ने बढ़ाई जिज्ञासा.
श्रद्धालुओं पर पड़ा असर.
चक्रवात अर्नब के चलते तेज हवाओं ने मंदिर परिषर और आस-पास के इलाके को भी प्रभावित किया. मंदिर के शिखर पर लगी पवित्र पतितपावन ध्वजा तेज हवा के कारण फट गई. इसी दौरान ध्वजा में ‘शून्य गांठ’ बन गई.
वहीं, श्रद्धालुओं की ओर से मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना के साथ नीलचक्र पर बांधी गईं सैकड़ों छोटी-छोटी पताकाएं भी टूटकर मंदिर के ऊपरी हिस्से पर जा गिरीं.
प्राचीन ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, पतितपावन ध्वजा में शून्य गांठ बनना शुभ संकेत माना जाता है. तेज हवा चलने पर जब दो या उससे अधिक ध्वजाएं आपस में उलझकर गांठ का रूप ले लेती हैं, तो इसे शून्य गांठ कहा जाता है. आंधी-तूफान और भारी बारिश के दौरान ऐसा होने की संभावना रहती है. इसे ब्रह्म गांठ भी कहा जाता है.
मंदिर में काम करने का सौभाग्य प्राप्त करने वाले सेवादारों में से एक ने बताया कि अमूमन ऐसी गांठ का वजन 5 से 10 किलोग्राम तक हो सकता है. हालांकि, अब ऐसा घटनाक्रम पहले की तुलना में कम देखने को मिलता है, क्योंकि ध्वजाओं की लंबाई घटाकर करीब 14 हाथ कर दी गई है. उन्होंने ये भी बताया कि पहले जब रोजाना 51 हाथ या 150 हाथ लंबी ध्वजाएं चढ़ाई जाती थीं, तब ऐसी गांठें ज्यादा बनती थीं.
परंपरागत मान्यताओं के मुताबिक, पतितपावन ध्वज में शून्य गांठ बनना शुभ संकेत माना जाता है. श्रद्धालु इसे बड़ी विपत्ति टलने और भगवान के आशीर्वाद से भी जोड़कर देखते हैं. मौके पर मौजूद कुछ भक्तों ने ध्वजा में गांठ लगने की घटना को भगवान जगन्नाथ की कृपा का संकेत बताया. एक श्रद्धालु ने कहा, 'महाप्रभु भगवान जगन्नाथ हम सभी की रक्षा करेंगे. इस गांठ का मतलब है कि चक्रवात अर्नब कमजोर पड़ जाएगा और इससे ज्यादा नुकसान नहीं होगा.'
सेवादार के मुताबिक, कोरोना महामारी के दौरान भी तेज हवाओं और भारी बारिश के बीच मंदिर में करीब 5.5 किलोग्राम वजन की शून्य गांठ बनी थी. उस समय ओडिशा में भी काफी उथल-पुथल का माहौल था. लेकिन जगत के स्वामी 'जगन्नाथ' ने सबकुछ संभाल लिया था.
शून्य गांठ से होकर बहने वाले पानी को भी विशेष महत्व दिया जाता है. पहले ये पानी गर्भवती महिलाओं को दिया जाता था. मान्यता है कि इससे लेबर पेन कम होने के साथ प्रसव बिना किसी परेशानी के हो जाएगा. इस पानी का इस्तेमाल नवजात बच्चों को बुरी नजर, नकारात्मक ऊर्जा से बचाने के लिए भी किया जाता था.
इसी मंदिर से जुड़ी एक और ऐसी मान्यता भी है, जो सुनने में किसी रहस्य से कम नहीं लगती. कहा जाता है कि मंदिर के सिंहद्वार के बाहर खड़े होकर समंदर की लहरों का शोर सुनाई देता है, लेकिन जैसे ही मंदिर परिसर में प्रवेश करते हैं, यह आवाज सुनाई देनी बंद हो जाती है. इस चमत्कार से जुड़ी दो कथाएं सनातन धर्म को मानने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं के बीच आज भी मशहूर हैं.
पौराणिक दंतकथाओं के मुताबिक अमूमन भगवान के मंदिरों में उनकी अर्धांगिनी की मौजूदगी होती है, लेकिन जगन्नाथ मंदिर की महिमा और लोकरीति सबसे निराली है. यहां भगवान अपने बड़े भाई बलदाऊ (बलभद्र) और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान है. पहली कथा के मुताबिक भगवान जगन्नाथ की बहन देवी सुभद्रा जी ये चाहती थीं कि मंदिर के भीतर शांति रहे. समुद्र की तेज गर्जना से उनकी शांति में खलल पड़ता था. उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए भगवान जगन्नाथ ने ऐसी व्यवस्था की कि मंदिर के भीतर समुद्र की आवाज न सुनाई दे. इसी वजह से सिंहद्वार से मंदिर में प्रवेश करते ही समुद्र की लहरों का शोर सुनाई देना बंद हो जाता है.
दूसरी कथा रुद्रावतार हनुमानजी से जुड़ी है. हनुमानजी अजर-अमर हैं. त्रेतायुग में भगवान राम और मां जानकी के चरणों से प्रीत लगा बैठे हनुमानजी महराज ने द्वापर युग में प्रभु ने कृष्ण अवतार में भी मंगलगान किया. आगे हनुमानजी को प्रभु के इस धाम का पता चला तब वो यहां जगन्नाथपुरी धाम भी पहुंच गए. कहते हैं कि एक बार नारद मुनि सप्त पुरियों में से एक जगन्नाथपुरी पहुंचे तो उन्होंने अपने आराध्य जगन्नाथ को चिंतित देखा. भगवान ने बताया कि समुद्र की तेज आवाज से उन्हें परेशानी होती है.
तब नारद जी ने हनुमान जी से इसका उपाय करने को कहा. हनुमान जी समुद्र देव के पास पहुंचे, यूं तो समुद्र देव रामचरित मानस में वर्णित दोहा- 'बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति। बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति. यानी भगवान राम के बाण की शक्ति देख चुके थे, तब उन्होंने भगवान को सेना समेत लंका जाने के लिए सागर में सेतु यानी पुल बनने का उपाय बताया था. लेकिन भगवान ने आगे चलकर जब जगन्नाथ के रूप में आए तो हनुमानजी को ये बताया गया कि समुद्र की गर्जना रोकने के लिए हवा की दिशा बदलनी होगी.
इसके बाद हनुमान जी ने अपनी शक्ति से हवा के बहाव को प्रभावित किया, जिससे समुद्र की आवाज मंदिर तक पहुंचनी बंद हो गई. इस लोककथा के अनुसार पुरी में हनुमान जी की और एक भक्त की बहुत मान्यता है.
इसी कथा के अनुसार, एक बार सभी देवी-देवता सहित मनुष्यों और गंधर्व भी भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए पुरी धाम पहुंचे. समुद्र देव को भी भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने की अभिलाषा हुई और वह मंदिर में प्रवेश कर गए. इस कारण मंदिर और भक्तों को काफी समस्या का सामना करना पड़ा.
तब भगवान जगन्नाथ ने हनुमान जी को पुरी धाम की रक्षा की जिम्मेदारी सौंपते हुए समुद्र तट के किनारे तैनात किया. हनुमानजी सबकुछ अच्छी तरह से संभाल चुके थे. लेकिन इसमें एक पेंच ये था कि जब भी हनुमान जी को किसी भक्त के मुंह से रामजी का नाम या रामजी का भजन-कीर्तन सुनाई पड़ता, तो फौरन वहीं चले जाते. ऐसे में मौका पाते ही समुद्र देव मंदिर में भगवान के दर्शन के लिए पहुंच जाते.
तब भगवान ने उन्हें लोहे की बेड़ियों से बांध दिया, ताकि समुद्र मंदिर में प्रवेश न कर सके और जगन्नाथ स्वामी के भक्त बिना किसी दिक्कत के उनके दर्शन कर सकें. यानी हनुमान जी पुरी की रक्षा करते रहें. यहां बेड़ी का मतलब हर युग में हनुमानजी का भगवान राम के प्रति भक्तिभाव का बंधन है. तभी से यहां हनुमानजी बेड़ी हनुमान के नाम से भी जाने जाते हैं.
पुरी स्थित बेड़ी हनुमान मंदिर को दरिया महावीर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है. जो भक्त जगन्नाथ पुरी आते हैं, वो बेणी हनुमानजी के दर्शन करना नहीं भूलते.
ओडिया वेबसाइट्स की रिपोर्ट के मुताबिक भगवान श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन ने बताया कि प्रभु के सेवक मंदिर के शिखर पर चढ़कर परंपराओं के मुताबिक उस ध्वजा की जगह नई ध्वजा लगाएंगे. जलभराव के कारण भी कुछ श्रद्धालुओं को थोड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा.