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महाराष्ट्र विधान परिषद (MLC) चुनाव 2026 के नतीजों के बाद सत्ताधारी महायुति गठबंधन के भीतर खींचतान और बयानबाजी का दौर शुरू हो गया है. चुनाव में मिली हार के बाद जब भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इसका ठीकरा शिवसेना पर फोड़ने की कोशिश की, तो शिवसेना ने भी चुप रहने के बजाय अपनी सहयोगी पार्टी को करारा जवाब दिया है. शिवसेना का साफ कहना है कि बीजेपी को पुणे स्नातक सीट से किसी 'बाहरी' प्रत्याशी को टिकट देने से बचना चाहिए था, जिससे पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं में भारी असंतोष फैला.
शिवसेना प्रवक्ता आनंद परांजपे ने एमएलसी चुनाव के नतीजों पर प्रतिक्रिया देते हुए बीजेपी के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि पुणे स्नातक सीट पर बीजेपी ने जिस उम्मीदवार को उतारा, वह पार्टी की प्राथमिक सदस्य तक नहीं थीं. परांजपे ने कहा, 'अगर बीजेपी ने अपने किसी ऐसे जमीनी कार्यकर्ता को टिकट दिया होता, जिसने अपना पूरा जीवन पार्टी के लिए समर्पित किया है, तो कार्यकर्ताओं और मतदाताओं में एक अलग उत्साह देखने को मिलता. लेकिन एक बाहरी उम्मीदवार को मैदान में उतारने से बीजेपी के ही वफादार कार्यकर्ताओं में गहरी नाराजगी पैदा हुई. इस उम्मीदवार को शिवसेना ने नहीं, बल्कि खुद बीजेपी के कार्यकर्ताओं और मतदाताओं ने नाकार दिया है.'
शिवसेना प्रवक्ता ने बीजेपी नेतृत्व को आत्ममंथन करने की सलाह दी. उन्होंने कहा कि आरोप-प्रत्यारोप लगाने के बजाय बीजेपी नेताओं को जमीन पर उतरकर अपने कार्यकर्ताओं की जमीनी भावना और जमीनी हकीकत को समझना चाहिए. उन्होंने आगे कहा, 'छत्रपति संभाजीनगर और अमरावती में बीजेपी नेताओं के ढुलमुल और आक्रामक रुख ने महायुति गठबंधन की संभावनाओं को भारी नुकसान पहुंचाया है. विधान परिषद चुनावों में हार के लिए शिवसेना को जिम्मेदार ठहराना पूरी तरह से बेबुनियाद है. सच तो यह है कि महायुति की तीनों प्रमुख पार्टियों बीजेपी, शिवसेना और एनसीपी को इन नतीजों पर मिलकर आत्ममंथन करने की जरूरत है.'
सीटों के आवंटन का जिक्र करते हुए आनंद परांजपे ने कहा कि शिवसेना ने शुरुआत से ही पुणे स्नातक या पुणे शिक्षक सीट में से किसी एक की मांग की थी. महायुति की समन्वय समिति की बैठक में चार सीटों पर निर्णय लिया गया था, जिसके बाद बीजेपी ने पुणे स्नातक, पुणे शिक्षक और नागपुर स्नातक सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी थी. गठबंधन धर्म निभाते हुए शिवसेना ने चुनाव से ठीक पहले पुणे शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से अपने उम्मीदवार मंगेश चिवटे का नामांकन वापस ले लिया था.
परांजपे ने सवाल उठाते हुए कहा, 'शिवसेना के स्थानीय कार्यकर्ताओं की इच्छा थी कि पार्टी पुणे की कम से कम एक सीट पर चुनाव लड़े. चूंकि पुणे की दोनों ही सीटों पर पहले से बीजेपी का कोई एमएलसी नहीं था, इसलिए सिर्फ बीजेपी द्वारा इन दोनों सीटों पर अपना एकतरफा दावा ठोकना कितना सही था, इस पर विचार होना चाहिए.'
शिवसेना प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि उनकी मंशा बीजेपी पर बेबुनियाद आरोप लगाने की नहीं है, लेकिन गठबंधन चलाने के लिए पारस्परिक सम्मान बहुत जरूरी है. उन्होंने कहा, 'हमने बीजेपी पर कोई आरोप नहीं लगाया है और न ही हम ऐसा करना चाहते हैं. हालांकि, बीजेपी को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी. उसे शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) जैसे अपने सहयोगियों को विश्वास में लेकर चलना होगा और बेहतर समन्वय के साथ काम करना होगा. महायुति गठबंधन की एकता और मजबूती को बनाए रखना किसी एक दल की नहीं, बल्कि सभी सहयोगी दलों की साझी जिम्मेदारी है.'