Analysis: जहरीली शराब से मौतें: हर हादसे के बाद जागता है प्रशासन, लेकिन देश अब तक क्यों नहीं जागा?
मध्य प्रदेश के सागर जिले में जहरीली शराब से 20 से अधिक लोगों की मौत यही बता रही है कि देश में समय के साथ कुछ समस्याएं किस तरह विकराल होती जा रही हैं. सवाल यह है कि आखिर भारत को राष्ट्रीय शराब नीति की जरूरत कब महसूस होगी?
मध्य प्रदेश के सागर जिले में जहरीली शराब पीने से 20 से अधिक लोगों की मौत की घटना केवल एक स्थानीय त्रासदी नहीं है. यह उस बड़ी समस्या की ओर इशारा करती है, जिससे देश लंबे समय से जूझ रहा है.
सागर की घटना में शुरुआती जांच में मेथनॉल विषाक्तता की बात सामने आई है और प्रशासन ने कार्रवाई शुरू कर दी है. मुख्यमंत्री ने न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं और अवैध शराब के खिलाफ राज्यव्यापी कार्रवाई की बात कही है.
लेकिन सवाल यह है कि क्या कुछ गिरफ्तारियां, कुछ अधिकारियों का निलंबन और कुछ दिनों तक चलने वाला अभियान इस समस्या का समाधान कर देगा?
इस सवाल का जवाब शायद खुद देश में जहरीली शराब से होने वाली घटनाओं का इतिहास देता है. जब भी किसी राज्य में जहरीली शराब से बड़ी संख्या में लोगों की मौत होती है, तब शासन-प्रशासन सक्रिय होता है.
अवैध शराब बनाने और बेचने वालों की गिरफ्तारी होती है. संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई होती है. सरकारें मुआवजे का ऐलान करती हैं. फिर धीरे-धीरे मामला ठंडा पड़ जाता है.
कुछ समय बाद देश के किसी दूसरे हिस्से से फिर खबर आती है कि जहरीली शराब पीने से कई लोगों की मौत हो गई. यही इस समस्या की सबसे गंभीर बात है.
सागर से पहले भी वही कहानी
मध्य प्रदेश का सागर हादसा कोई पहला मामला नहीं है. देश में जहरीली या अवैध शराब से मौतों की घटनाएं अलग-अलग राज्यों में समय-समय पर सामने आती रही हैं. हाल के दिनों में गुजरात के भावनगर में भी जहरीली शराब से मौतों की घटना सामने आई.
सागर मामले की जांच में उत्तर प्रदेश के ललितपुर से कथित सप्लाई कनेक्शन की भी जांच हो रही है. इससे यह संकेत मिलता है कि अवैध शराब का कारोबार कई बार किसी एक गांव या जिले तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसकी सप्लाई चेन राज्यों की सीमाओं तक फैली हो सकती है.
सागर मामले की एक और चिंताजनक बात यह है कि जांच में कथित तौर पर नकली रैपर और क्यू आर कोड जैसी चीजें भी सामने आई हैं. कुछ पीड़ितों ने पुलिस को बताया कि उन्हें सस्ती शराब को यह कहकर बेचा गया कि वह असली शराब ही है, केवल उसी फॉर्मूले से तैयार की गई है.
यानी समस्या केवल जहरीला रसायन मिलाकर शराब बनाने तक सीमित नहीं है. इसके साथ नकली ब्रांड, नकली पैकेजिंग, अवैध उत्पादन, अंतरराज्यीय सप्लाई और कमजोर निगरानी का पूरा तंत्र जुड़ा हुआ है.
आखिर जहरीली शराब बनती क्यों है?
इसका एक सबसे बड़ा कारण कम लागत में ज्यादा मुनाफा कमाना है. कानूनी शराब के उत्पादन और बिक्री की पूरी प्रक्रिया पर नियम लागू होते हैं. उत्पादन, गुणवत्ता, पैकेजिंग, लेबलिंग, टैक्स, लाइसेंस और वितरण की निगरानी की व्यवस्था होती है.
इसके विपरीत अवैध शराब का कारोबार नियमों से बाहर चलता है. यहीं से खतरा शुरू होता है. अवैध शराब बनाने वाला व्यक्ति गुणवत्ता, सुरक्षा या उपभोक्ता के स्वास्थ्य की चिंता नहीं करता.
उसका उद्देश्य कम लागत में ज्यादा से ज्यादा शराब तैयार करना होता है. यदि इस प्रक्रिया में कोई जहरीला रसायन इस्तेमाल हो गया या शराब में मेथनॉल जैसी खतरनाक चीज मिल गई, तो वह पूरी खेप लोगों की जान ले सकती है.
इसलिए जहरीली शराब को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानना पर्याप्त नहीं है. यह सार्वजनिक स्वास्थ्य, खाद्य एवं उत्पाद सुरक्षा, कर व्यवस्था, सीमा-पार अपराध और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ी हुई समस्या है.
सवाल सिर्फ देसी शराब का नहीं है
यह मान लेना भी ठीक नहीं होगा कि गुणवत्ता का सवाल केवल अवैध या देसी शराब तक सीमित है. हाल में शराब की गुणवत्ता और उसकी लेबलिंग को लेकर भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी FSSAI की कार्रवाई ने भी एक अलग तरह का सवाल खड़ा किया है.
FSSAI ने कुछ अल्कोहलिक उत्पादों में ऐसे बाहरी फ्लेवर और उम्र संबंधी दावों पर आपत्ति जताई है, जिनसे उपभोक्ता को उत्पाद की वास्तविक प्रकृति को लेकर भ्रम हो सकता है.
सरकार ने भी स्पष्ट किया है कि कुछ निर्माताओं द्वारा उत्पाद के प्राकृतिक स्वाद और सुगंध की नकल करने वाले बाहरी फ्लेवर का इस्तेमाल किए जाने पर कार्रवाई की गई है.
रम को लेकर FSSAI के मौजूदा नियमों में उत्पादन के आधार और उसके विशिष्ट स्वाद-सुगंध की आवश्यकताओं का उल्लेख है.
एक देश, कानून अलग
भारत में अभी कोई भी एकीकृत राष्ट्रीय आबकारी नीति लागू नहीं है. यहीं से भारत की शराब नीति की सबसे बड़ी विसंगति सामने आती है.
भारत में शराब का नियमन मुख्य रूप से राज्यों के अधिकार क्षेत्र में है. संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची में 'intoxicating liquors' से जुड़े उत्पादन, कब्जे, परिवहन, खरीद और बिक्री से संबंधित विषय राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं. इसी तरह शराब से जुड़े राज्य उत्पाद शुल्क का अधिकार भी राज्यों के पास है.
इसका मतलब है कि देश में शराब को लेकर एक समान व्यवस्था नहीं है. एक राज्य में शराब खरीदने और पीने की कानूनी उम्र 18 वर्ष हो सकती है, दूसरे में 21 वर्ष और कहीं 25 वर्ष.
कुछ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अलग-अलग नियम हैं और कुछ राज्यों में शराबबंदी लागू है.
उदाहरण के लिए उपलब्ध राज्यवार आंकड़ों के अनुसार गोवा, राजस्थान, सिक्किम और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में न्यूनतम उम्र 18 साल है जबकि मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना समेत कई राज्यों में यह 21 साल है. केरलम में यह सीमा 23 साल और दिल्ली, पंजाब, महाराष्ट्र जैसे कुछ स्थानों में 25 साल है.
यानी भारत में एक व्यक्ति के लिए शराब से जुड़े कानूनी नियम राज्य की सीमा पार करते ही बदल सकते हैं.
यह संघीय ढांचे की अपनी वास्तविकता है. राज्यों को अपने सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार नियम बनाने का अधिकार है लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है कि जब अवैध शराब का नेटवर्क राज्य की सीमा पार करता है तब केवल राज्यवार कार्रवाई पर्याप्त नहीं रह जाती.
सागर की जांच में ललितपुर कनेक्शन की चर्चा इसी समस्या को सामने लाती है. यदि अवैध शराब एक राज्य में तैयार होकर दूसरे राज्य में पहुंच रही है तो पुलिस, आबकारी और प्रशासनिक एजेंसियों के बीच समन्वय भी उतना ही महत्वपूर्ण हो जाता है.
राष्ट्रीय शराब नीति सबसे महत्वपूर्ण सवाल क्यों
भारत में तंबाकू और नशीले पदार्थों से जुड़े क्षेत्रों में राष्ट्रीय स्तर पर नीतिगत ढांचे मौजूद हैं. शराब के लिए राज्यों पर लागू होने वाली कोई व्यापक, एकरूप और बाध्यकारी राष्ट्रीय शराब नीति मौजूद नहीं है.
यह कहना अधिक सही होगा कि केंद्र के स्तर पर शराब से जुड़े नुकसान को रोकने और शराब निर्भरता से जूझ रहे लोगों के पुनर्वास से संबंधित योजनाएं और नीतिगत प्रयास मौजूद हैं लेकिन राज्यों के लिए एक समान व्यापक 'National Alcohol Policy' लागू नहीं है.
बाकी देशों में क्या है पॉलिसी
- भारत की तरह संघीय ढांचे वाले अमेरिका में शराब को लेकर एक राष्ट्रीय नीति है.अमेरिका में संघीय स्तर पर शराब पीने की न्यूनतम उम्र (21 वर्ष) तय करने के लिए कानून है, लेकिन दुकान खोलने के समय और लाइसेंसिंग की विस्तृत नीतियां वहां के राज्य और स्थानीय प्रशासन ही तय करते हैं.
- नेपाल में राष्ट्रीय स्तर पर शराब को लेकर एक नीति है. इसके तहत सुबह पांच से रात सात बजे तक शराब की बिक्री नहीं होगी. एक दिन में एक व्यक्ति को एक लीटर से अधिक शराब नहीं मिलेगी. इसके अलावा 21 साल से कम उम्र के युवक व गर्भवती महिलाएं खरीदारी नहीं कर सकेंगे.
- बांग्लादेश में भी शराब की बिक्री और खपत प्रतिबंधित है. हालांकि, देश के गैर-मुसलमानों और यहां आने वाले पर्यटकों को इसमें छूट है. ये लोग निजी स्थान पर शराब का सेवन कर सकते हैं. देश के प्रमुख पर्यटकों केंद्रों पर स्थित रेस्त्रां, होटल आदि में शराब बेचने की अनुमति है.
- पाकिस्तान में मुस्लिमों के लिये शराब पूरी तरह से प्रतिबंधित है. लेकिन गैर-मुस्लिम लोग शराब को सरकार से लाइसेंस प्राप्त कर खरीद सकते हैं. गैर-मुस्लिम विदेशियों को कुछ होटलों में शराब सेवन की अनुमति है.
- मालदीव में समंदर के तटों और विश्व स्तरीय रिजॉर्ट्स वाले देश मालदीव में स्थानीय लोगों को शराब के सेवन की अनुमति नहीं है. देश में केवल कुछ रिजॉर्ट्स और होटल ही एक खास परमिट लेने के बाद ही विदेशी पर्यटकों को शराब बेच सकते हैं.
- ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, लीबिया, सूडान, सऊदी अरब, यमन जैसे कई इस्लामिक देशों में शराब पीना प्रतिबंधित है. हालांकि, इनमें से कई देशों के गैर-मुसलमानों और यहां आने वाले पर्यटकों को इसमें छूट है.
शराब पीना मौलिक अधिकार नहीं है
राष्ट्रीय नीति पर बहस करते समय एक भ्रम को दूर करना भी जरूरी है. भारत में शराब पीना कोई मौलिक अधिकार नहीं है. संविधान स्वयं राज्य को सार्वजनिक स्वास्थ्य के हित में मादक पेय पदार्थों के सेवन पर रोक की दिशा में प्रयास करने की नीति-निर्देशक व्यवस्था देता है.
इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर शराब की रोकथाम, गुणवत्ता, उपलब्धता और उससे होने वाले नुकसान को लेकर नीति बनाने की चर्चा को इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि इससे व्यक्ति के किसी मौलिक अधिकार का हनन होगा.
सुप्रीम कोर्ट, बॉम्बे हाई कोर्ट और केरलम हाईकोर्ट ने अपने विभिन्न फैसलों में यह साफ किया है कि भारत में शराब पीना मौलिक अधिकार के दायरे में नहीं आता है.
यहां मुद्दा शराब को पूरी तरह प्रतिबंधित करने का नहीं, बल्कि यह तय करने का है कि यदि शराब का उत्पादन और बिक्री कानूनी रूप से हो रही है तो उसके मानक, लेबलिंग, वितरण और उपभोक्ता सुरक्षा के लिए न्यूनतम राष्ट्रीय मानक क्या होंगे.
नुकसान केवल जहरीली शराब तक सीमित नहीं
जहरीली शराब से होने वाली मौतें इस समस्या का सबसे भयावह चेहरा हैं, लेकिन शराब से होने वाले स्वास्थ्य नुकसान का दायरा इससे कहीं बड़ा है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2024 की Global Status Report के अनुसार वर्ष 2019 में दुनिया भर में शराब के सेवन से लगभग 26 लाख मौतें हुईं. यह दुनिया भर में होने वाली कुल मौतों का लगभग 4.7 प्रतिशत था. शराब से होने वाली मौतों में पुरुषों की संख्या महिलाओं की तुलना में काफी अधिक थी.
WHO के मुताबिक, शराब केवल लीवर से जुड़ी बीमारी का कारण नहीं है. इसके सेवन का संबंध कैंसर, हृदय संबंधी बीमारियों, पाचन तंत्र की बीमारियों, चोट, दुर्घटनाओं और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं से भी है. 20 से 39 वर्ष की उम्र के लोगों में शराब से संबंधित मौतों का अनुपात विशेष रूप से चिंता का विषय है.
राष्ट्रीय नीति का अर्थ शराबबंदी नहीं
राष्ट्रीय शराब नीति की मांग का अर्थ यह नहीं है कि पूरे देश में शराबबंदी लागू कर दी जाए. शराबबंदी का अपना अलग सामाजिक और आर्थिक प्रभाव है और बिहार, गुजरात जैसे राज्यों का अनुभव इस विषय पर अलग-अलग निष्कर्षों और बहस की गुंजाइश देता है.
राष्ट्रीय नीति का पहला उद्देश्य यह हो सकता है कि पूरे देश में कुछ न्यूनतम मानक तय किए जाएं. जैसे-
- शराब की गुणवत्ता की न्यूनतम राष्ट्रीय कसौटी क्या होगी?
- लेबल पर कौन-कौन सी जानकारी अनिवार्य होगी?
- नकली ब्रांड और नकली QR कोड के खिलाफ राज्यों के बीच डेटा साझा करने की व्यवस्था कैसी होगी?
- मेथनॉल जैसी विषैली मिलावट की पहचान के लिए किस तरह की निगरानी व्यवस्था होगी?
- अवैध शराब के मामलों में राज्यों के बीच पुलिस और आबकारी विभाग किस समय सीमा में सूचना साझा करेंगे?
- शराब के अवैध उत्पादन वाले हॉटस्पॉट की पहचान कैसे होगी?
- शराब के स्वास्थ्य नुकसान की निगरानी के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कौन-सा डेटा तैयार होगा?
- सबसे महत्वपूर्ण किसी राज्य में जहरीली शराब से मौत होने के बाद सिर्फ आरोपियों की गिरफ्तारी होगी या संबंधित प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही भी तय होगी?
नेशनल पॉलिसी बनाने से क्या होगा फायदा
- शराब के वितरण और उसकी क्वालिटी की निगरानी की जा सकेगी
- केंद्रीय स्तर पर शराब पीने से रोकथाम के लिए नीतियां बनाने में आसानी होगी
- टैक्स की दरों को सामान करने से अवैध बिक्री कम होगी
- अवैध शराब पर रोकथाम के लिए केंद्रीय स्तर से प्रयास किए जा सकेंगे
- शराब से होने वाले नुकसान की केंद्रीय स्तर पर समीक्षा की जा सकेगी.
भारत में पिछले 20 साल में शराब की खपत लगभग दोगुनी से ज्यादा बढ़ी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2005 में प्रति व्यक्ति शराब की खपत 2.4 लीटर थी जो 2016 में बढ़कर 5.7 लीटर हो गई है. 2026 में इसके प्रति व्यक्ति 6.2 लीटर होने का आंकड़ा सामने आया है
बता दें कि भारत में शराब को लेकर राष्ट्रीय नीति बनाने को लेकर संसद में सिर्फ चर्चा ही हुई है. 2009 में तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणि रामदास ने लोकसभा में कहा था कि शराब के सेवन पर रोक लगाने के लिए राष्ट्रीय शराब नीति बननी चाहिए.
सागर की त्रासदी ने एक बार फिर वही सवाल सामने रखा है, जिसे भारत पिछले कई दशकों से टालता आया है कि क्या शराब के मामले में राज्यों की अलग-अलग नीतियों के साथ एक साझा राष्ट्रीय नीति का ढांचा भी होना चाहिए?
शायद अब इस सवाल को टालने का समय नहीं है, क्योंकि जहरीली शराब की हर अगली बोतल में सिर्फ अवैध कारोबार का मुनाफा नहीं होगा. उसमें किसी परिवार की जिंदगी दांव पर लगी होगी.