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भारत 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है. ये चौथा मौका है जब हमें इस समूह की कमान मिली है. 20 साल पहले चार देशों- ब्राजील, रूस, भारत और चीन के सहयोग से शुरू हुआ ब्रिक्स आज चार महाद्वीपों को कवर कर रहा है. जब इसका जन्म हुआ था, तब परिस्थितियां और चुनौतियां अलग थीं, आज और उस समय के हालात में जमीन-आसमान का अंतर है. चीन, रूस और ब्राजील से इतर हम ये जानने की कोशिश करते हैं कि क्या ब्रिक्स के महामंथन से भारत में महंगाई कम होगी?
चीन, 2010 से दुनिया की सबसे बड़ी इकोनॉमी है. उसका मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर अमेरिका से लेकर सातों महाद्वीपों के एक बड़े हिस्से की जरूरतों को पूरा करता है. यूं तो दुनियादारी पैसे से ही चलती है. इसलिए इकोनॉमी का मजबूत होना बहुत जरूरी है.
दिल्ली में आयोजित समिट में खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और निवेश जैसे मुद्दे प्रमुख एजेंडे में हैं. भारत इससे जुड़ी कई बैठकें कर चुका है. ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्री 14-15 मई 2026 को दिल्ली में और वित्त मंत्री और और केंद्रीय बैंक गवर्नर दो दिन पहले 9 और 10 सितंबर 2026 को मुंबई में भविष्य का रोडमैप बना चुके हैं. समिट से पहले 11 सितंबर यानी शुक्रवार की शाम पांच बजे बिजनेस फोरम की बैठक होगी.
ऐसे में माना जा रहा है कि अपनी अध्यक्षता में हो रही ब्रिक्स समिट-2026 में भारत अपने व्यापार घाटे को कम करने की पहल कर सकता है.
भारत ब्रिक्स देशों से सालाना 321 अरब डॉलर का आयात करता है. जबकि सबसे ज्यादा कारोबारी घाटा हमें चीन से है. चीन से भारत सालाना 130 अरब डालर तो रूस से 55 अरब डालर का आयात करता है. मौजूदा वित्तीय साल 2026-27 में चीन में भारत का निर्यात बढ़ रहा है, लेकिन वो अभी उस लेवल तक नहीं पहुंचा, जिसकी अपेक्षा की जाती है.
Global Trade Research Initiative की रिपोर्ट के मुताबिक ब्रिक्स देशों के साथ अकेले भारत का व्यापार घाटा 2026 में आते-आते तीन गुना होकर 226.1 अरब डॉलर यानी करीब 19 लाख करोड़ रुपये पहुंच चुका है.
व्यापार घाटा कम हो जाए और सप्लाई चेन बाधित न हो यानी ब्रिक्स के महामंथन से जो फाइनल रोडमैप निकले, उस पर सही से अमल हो जाए तो महंगाई पर काबू पाने में कुछ मदद जरूर मिल सकती है.

व्यापार घाटा कम होगा तो डॉलर की मांग भी घटेगी. भारत का रुपया मजबूत होगा. रुपया मजबूत होगा तो बाहर से तेल-गैस और खाद्य तेल समेत अन्य जरूरी सामान मंगाने का बजट बढ़ेगा. रुपया मजबूत होने से कई चीजों का आयात सस्ता पड़ेगा. चीज सस्ती आएगी तो आपको भी सस्ती मिलेगी. यानी महंगाई से ऑटोमेटिक राहत मिलने लगेगी. हालांकि ये इतना आसान नहीं है को असंभव भी नहीं है.
इकोनॉमी, मैन्युफेक्चरिंग और कॉमर्स सेक्टर के जानकारों का मानना है कि ब्रिक्स का महंगाई पर पड़ने वाला असर अप्रत्यक्ष और मध्यम अवधि का होगा. अगर इस मंच से फूड सप्लाई, यूरिया, ऊर्जा संकट का समाधान निकालकर सस्ते तेल-गैस का इंतजाम करके कारोबार में अपनी-अपनी करेंसी में भुगतान व्यवस्था में वास्तविक सहयोग लागू कर पाता है, तो महंगाई के दबाव को कम करने में मदद मिल सकती है.
इकोनॉमी मजबूत होती है अच्छे बिजनेस से, जिसमें कारोबारी घाटा कम से कम हो. इससे नई-नई नौकरियों के अवसर बनते हैं. इसके साथ ही अगर लोगों की परचेजिंग पावर यानी लोगों की खरीदारी की क्षमता बढ़ जाए तो सोने पर सुहागा हो जाता है.
जाहिर है सदस्य देश इस दौरान महंगाई पर भी काबू पाने की दिशा में कोई कदम उठाते हुए रोडमैप बना सकते हैं. हालांकि ये कोई चिराग घिसकर जिन्न निकालने जैसा नहीं होगा कि ब्रिक्स समिट-2026 से निकले डिक्लेरेशन से तत्काल भारत में तेल-गैस यानी पेट्रोल-डीजल के दाम घट जाएंगे, सप्लाई चेन मजबूत हो जाएगी और राशन, फल और सब्जियों समेत रोजमर्रा की चीजों के दाम कम हो जाएंगे.
यानी भारत में महंगाई से राहत के लिए फिलहाल रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की मौद्रिक नीति, मोदी सरकार की टैक्स और सब्सिडी पॉलिसी समेत, घरेलू उत्पादन और वैश्विक तेल की कीमतें ही आखिर में अपना रोल निभाएंगी.