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मुरासु का धावा, 100 KM की रफ्तार से चली हवा, 7 दिन के अंदर बैक-टू-बैक दो तूफानों का प्रहार, इस बार कैसी है तैयारी?

चक्रवाती तूफान 'अर्नब' के बाद अब भारत के कई इलाकों में 'मुरासु' का खतरा पैदा हो गया है. इस चक्रवाती तूफान से बचने के लिए आंध्र प्रदेश, ओडिशा और तमिलनाडु जैसे राज्यों ने क्या-क्या तैयारी की हैं? मौसम विभाग िसपर कितनी नजर रख रहा है?

Written By Shruti Kaul
Published: Nov 02, 2026, 10:53 AM IST | Updated: Nov 02, 2026, 11:11 AM IST
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Disaster Managaement In India: भारत के पूर्वी तट पर शक्तिशाली तूफानों से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए साइक्लोन-वॉर्निंग सिस्टम, मौसम रडार, इवैक्युएशन शेल्टर और डिजास्टर रिस्पॉन्स टीमों का एक नेटवर्क बनाने में एक दशक से अधिक समय लगा है, लेकिन साइक्लोन अर्नब के भारत के पूर्वी तट पर आने के एक हफ्ते से भी कम समय में एक और वेदर सिस्टम 'मुरासु' के आंध्र प्रदेश तट पर आने का खतरा है. यह इलाका बार-बार आने वाले चक्रवाती तूफानों से निपटने के लिए कितना तैयार है?

चक्रवाती तूफान का खतरा आंध्र प्रदेश, ओडिशा और तमिलनाडु के लिए सबसे ज्यादा है. यहां लाखों लोग निचले तटीय जिलों में रहते हैं, जिन्हें तेज हवाओ, तूफान और बाढ़ का खतरा रहता है. भारतीय मौसम विभाग साइक्लोन और भारी बारिश समेत वेदर सिस्टम की लोकेशन, मूवमेंट और इंटेंसिटी को ट्रैक करने के लिए डॉप्लर वेदर रडार (DWRs) का इस्तेमाल करता है.

तूफान से कैसे लड़ेगा भारत 


IMD की 2025 की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक, ईस्ट कोस्ट यानी चेन्नई, कोलकाता, मछलीपट्टनम, विशाखापट्टनम, पारादीप, गोपालपुर, श्रीहरिकोटा और कराईकल में 8 रडार लोकेशन हैं. इनमें IMD की ओर से ऑपरेट किए जाने वाले रडार के साथ-साथ वे फैसिलिटी भी शामिल हैं, जिनका डेटा इसके मॉनिटरिंग नेटवर्क में इंटीग्रेटेड है. 

 

रडार नेटवर्क को ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन, रेन गेज, सैटेलाइट ऑब्जर्वेशन और ओशन मॉनिटरिंग सिस्टम से सपोर्ट मिलता है. ये इंस्ट्रूमेंट मौसम वैज्ञानिकों को बारिश, हवा के पैटर्न और जमीन के पास आने वाले तूफान का अंदाजा लगाने में मदद करते हैं.

आंध्र प्रदेश की क्या है तैयारी? 


आंध्र प्रदेश ने तूफान से निपटने के लिए एक साइक्लोन इन्फॉर्मेशन मैनेजमेंट सिस्टम बनाया है, जो तूफान के ट्रैक, जमीन पर गिरने की संभावना, कमजोर आबादी, शेल्टर, हॉस्पिटल, स्कूल और जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर के बारे में जानकारी इकट्ठा करता है.

 स्टेट डैशबोर्ड अधिकारियों को उन जिलों और मंडलों की पहचान करने में मदद करता है. यह पावर ट्रांसफॉर्मर और हेल्थ सुविधाओं जैसी जरूरी चीजों को भी मैप करता है. लंबे और कमजोर कोस्टलाइन के लिए यह सिस्टम बेहद जरूरी है.

ओडिशा ने बनाया अर्ली वॉर्निंग डिसेमिनेशन सिस्टम 


ओडिशा में भी एक अर्ली वॉर्निंग डिसेमिनेशन सिस्टम है. इसे डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी से सीधा कोस्टल समुदाय तक अलर्ट भेजने के लिए डिजाइन किया गया है. यह सिस्टम 6 तटीय जिलों के 22 ब्लॉक के 1,205 गांवों को कवर करता है. वहीं, इसमें तट के 1.5 किलोमीटर के अंदर 122 अलर्ट टावर हैं और इसमें सैटेलाइट बेस्ड कम्युनिकेशन और डिजिटल रेडियो लिंक हैं जो राज्य, जिला और ब्लॉक लेवल के इमरजेंसी सेंटर को जोड़ते हैं.

 

 इस अर्ली वॉर्निंग डिसेमिनेशन सिस्टम का मकसद नॉर्मल कम्युनिकेशन नेटवर्क में रुकावट आने पर भी वॉर्निंग देते रहना है. इसके अलावा ओडिशा में डिजास्टर रिस्पॉन्स टीमें भी हैं, जिसमें ओडिशा डिजास्टर रैपिड एक्शन फोर्स टीम, फायर सर्विस और चौबीसों घंटे चलने वाले कंट्रोल रूम के जरिए कोॉर्डिनेशन भी शामिल है.

तमिलनाडु में भारी बारिश से बचने के उपाय 


तमिलनाडु में भारी बारिश, ड्रेनेज और पानी भरने जैसी समस्याओं के लिए एक नेटवर्क स्थापित किया गया है, जिसमें ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन और बारिश मापने वाले गेज शामिल हैं. इसकी रडार लोकेशन में चेन्नई, कराईकल और श्रीहरिकोटा शामिल हैं. चेन्नई में ग्रेटर चेन्नई कॉर्पोरेशन अपने स्टॉर्मवॉटर ड्रेनेज नेटवर्क को बढ़ा रहा है और उसका मेंटेनेंस कर रहा है. यह शहर अपनी कम ऊंचाई, समतल जमीन और समुद्र के पास होने की वजह से खास तौर पर कमजोर है. यहां सैकड़ों किलोमीटर लंबे नालों पर काम चल रहा है, साथ ही डीसिल्टिंग और मेंटेनेंस ऑपरेशन भी चल रहे हैं.

तूफान से बचने के लिए कोस्टल इंफ्रास्ट्रक्चर 


बता दें कि भारत ने तूफान से बचने के लिए कोस्टल इंफ्रास्ट्रक्चर का अधिकतर हिस्सा नेशनल साइक्लोन रिस्क मिटिगेशन प्रोजेक्ट (NCRMP) के तहत बनाया है. इसका पहला फेज आंध्र प्रदेश और ओडिशा को कवर करता था और दिसंबर 2018 में पूरा हुआ था. दूसरे फेज में पश्चिम बंगाल समेत 6 राज्य शामिल थे और यह मार्च 2023 में पूरा हुआ. इस प्रोजेक्ट में अर्लीवॉर्निंग सिस्टम, मल्टीपर्पस साइक्लोन शेल्टर, इवैक्युएशन रोड और पुल, सलाइन एम्बैंकमेंट, अंडरग्राउंड इलेक्ट्रिकल केबलिंग और डिजास्टर मैनेजमेंट के लिए ट्रेनिंग शामिल थी. सरकार ने पहले फेज में लगभग Rs 2,525 करोड़ और दूसरे फेज में Rs 1,807 करोड़ खर्च होने की जानकारी दी थी. 

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ज़ी न्यूज में सब एडिटर. वनस्थली विद्यापीठ यूनिवर्सिटी, राजस्थान से जर्नलिज्म और मास कम्युनिकेशन में ग्रेजुएशन. ये राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मुद्दो से जुड़े विषयों पर लिखती हैं. लिखने के अलावा श्रुति को नई जगहों पर घूमना, संगीत सुनना, फिल्में देखना और फूड एक्सप्लोर करने का बेहद शौक है. 
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