मेडल से आगे खिलाड़ियों के संघर्ष की अनकही कहानियां: 16 साल की शरण्या की किताब को देवेंद्र झाझरिया ने सराहा
मैदान में जब कोई खिलाड़ी मेडल जीतता है, तो हमें कुछ ही चीजें नजर आती हैं. हमें उस कामयाबी के पीछे का संघर्ष, दर्दनाक असफलताएं, मुश्किल फैसले और लगातार अभ्यास जैसी चीजों से अनजान रहते हैं. इन्हीं कहानियों को बयान करने वाली एक किताब अब चर्चा में है.
महज 16 साल की उम्र में जहां बच्चे अपने करियर के सपने बुन रहे होते हैं, वहीं मुंबई की शरण्या खेरुका ने ऐसा काम किया है, जो देश के उन खिलाड़ियों को पहचान दिला रहा है, जिनकी कामयाबी के पीछे संघर्ष की लंबी कहानी छिपी है. शरण्या ने महाराष्ट्र के पैरा-एथलीटों की जिंदगी और उनके संघर्ष पर एक किताब लिखी है, जिसे पैरालंपिक कमेटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष देवेंद्र झाझरिया से सराहना मिली है. उनकी किताब 'Living Histories: Stories of Maharashtra’s Paralympians' उन खिलाड़ियों की अनकही कहानियों को सामने लाती है, जिन्होंने तमाम चुनौतियों के बावजूद अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का नाम रोशन किया. इस किताब में सुकांत कदम और संदीप संजय सरगर समेत महाराष्ट्र के पैरा-एथलीट्स के साहस, मजबूत इरादे और तमाम चुनौतियों के बावजूद अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करने के सफर को दर्ज किया गया है. इस मौके पर PCI के डायरेक्टर सत्यनारायण भी मौजूद रहे.
PCI के अध्यक्ष देवेंद्र झाझरिया ने की तारीफ
इतनी कम उम्र में इस तरह की उपलब्धि हासिल करते हुए, शरण्या खेरुका को पैरालंपिक कमेटी ऑफ इंडिया (PCI) के अध्यक्ष देवेंद्र झाझरिया से अपनी किताब 'लिविंग हिस्ट्रीज: स्टोरीज ऑफ महाराष्ट्र्स पैरालंपियंस' के लिए पहचान मिली है. यह किताब महाराष्ट्र के पैरा-एथलीट्स की प्रेरणादायक, लेकिन अक्सर अनकही रह जाने वाली कहानियों को बड़े पाठक वर्ग तक पहुंचाती है. इसमें मुश्किल हालात के बावजूद उनकी हिम्मत, मजबूत इरादे और संघर्ष की यात्रा को दर्ज किया गया है. यह पहचान मिलने के मौके पर PCI के डायरेक्टर सत्यनारायण, पैरा-एथलीट सुकांत कदम और संदीप संजय सरगर भी मौजूद थे. इन दोनों खिलाड़ियों की प्रेरणादायक यात्राओं को किताब में शामिल किया गया है.
हर मेडल के पीछे एक ऐसा सफर होता है, जिसे चंद लोग देख पाते हैं. इसमें दर्दनाक नाकामियां, मुश्किल फैसले, लगातार प्रैक्टिस, संदेह के पल और बार-बार फिर से शुरुआत करने का साहस शामिल होता है.'लिविंग हिस्ट्रीज' इन खिलाड़ियों की व्यक्तिगत कहानियों को जिंदा करती है. यह बताती है कि किस तरह पैरा-एथलीट्स ने व्यक्तिगत और शारीरिक चुनौतियों का सामना किया, मुश्किलों से लड़े और वैश्विक मंच पर भारत का परचम लहराया. हैरानी की बात यह है कि बेहतरीन कामयाबी और इंटरनेशनल लेवल पर मेडल जीतने के बावजूद, इनमें से कई खिलाड़ी आज भी अनजान हैं. उनकी मेहनत और सफलता की कहानियां अब तक बड़े स्तर पर लोगों तक नहीं पहुंच पाई हैं.
किताब लिखने की प्रेरणा कैसे आई
मुंबई में पली-बढ़ीं शरण्या को यह जानकर हैरानी हुई कि महाराष्ट्र के कई प्रतिभाशाली पैरा-एथलीट्स की ऐसी कहानियां दबी हुई हैं, जो लोगों के लिए सबक बन सकती हैं. इसी एहसास ने उन्हें इन खिलाड़ियों के साहस, मजबूत इरादे और कामयाबियों की कहानियां नौजवान पाठकों तक पहुंचाने के लिए प्रेरित किया, ताकि वे अगली नस्ल के लिए प्रेरणा का जरिया बन सकें.
'लिविंग हिस्ट्रीज' लिखने की प्रेरणा के बारे में बात करते हुए शरण्या ने कहा,'खेल हमेशा से मेरी जिंदगी का एक अहम हिस्सा रहा है और खेल के दौरान लगी एक चोट ने नाकामियों को देखने का मेरा नजरिया बदल दिया. जब मैंने इन पैरालंपियंस से बात की और उनकी कहानियां सुनीं, तो उनके साहस, आभार और चुनौतियों का सामना करने के बावजूद अपने सपनों को पूरा करने के मजबूत इरादे ने मुझे गहराई से प्रभावित किया.'
शरण्या ने आगे बताया,'मुझे यह जानकर हैरानी हुई कि इनमें से कई खिलाड़ियों ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व किया था और पदक जीते थे, फिर भी बहुत कम लोग उनकी कहानियों को जानते थे. मैं सोचने लगी कि कितने दूसरे बच्चे भी उनकी यात्राओं से बेखबर होंगे. इसी बात ने मुझे यह किताब लिखने के लिए प्रेरित किया, ताकि मैं उनकी कहानियां युवा पाठकों तक पहुंचा सकूं, उन्हें दिखा सकूं कि मुश्किल हालात में भी हिम्मत पाया जा सकता है, बाधाओं को पार किया जा सकता है और सपनों को पूरा करने की कोशिश की जा सकती है.'