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'क्या महिलाएं LPG सिलेंडर नहीं उठा सकतीं?', नौकरी से वंचित महिला के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट, IOC देगा 12 लाख

मामला हरियाणा की रहने वाली एक महिला से जुड़ा है. महिला का नाम उन 49 लोगों में शामिल था, जिन्हें डिप्टी कमिश्नर की अध्यक्षता वाली एक स्थानीय समिति ने इंडियन ऑयल के एलपीजी बॉटलिंग प्लांट में नौकरी के लिए सुझाया था.

Written ByArvind Singh
Published: Sep 17, 2026, 08:12 PM IST|Updated: Sep 17, 2026, 08:16 PM IST
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'क्या महिलाएं LPG सिलेंडर नहीं उठा सकतीं?', नौकरी से वंचित महिला के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट, IOC देगा 12 लाख
Image Credit: सांकेतिक तस्वीर एआई

About the Author

Arvind Singh

Arvind Singh

अरविन्द सिंह ज़ी न्यूज़ में सीनियर जर्नलिस्ट हैं. पत्रकारिता में करीब दो दशक का अनुभव है. वह मुख्यत: सुप्रीम कोर्ट की रिपोर्टिंग करते हैं. इसके अलावा देशभर में कोर्ट से आने वाली बड़ी ख़बरों पर भी उनकी नज़र रहती है. कानून की जटिल, तकनीकी खबरों को सरल अंदाज में पेश करना उनकी खासियत है, इन्होंने जामिया यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई की है. 
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सुप्रीम कोर्ट ने एक अनोखे मामले में इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन  को एक महिला को 12 लाख का मुआवज़ा देने का आदेश दिया है. महिला का आरोप था कि एलपीजी प्लांट में सिर्फ महिला होने की वजह से उसे रिफिलिंग हेल्पर की नौकरी नहीं दी गई, जबकि वह इस पद के लिए योग्य थी. महिला अब रिटायरमेंट की उम्र पार कर चुकी हैं, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें नौकरी देने के बजाय उनके साथ हुए भेदभाव की भरपाई के लिए मुआवज़ा देने का आदेश दिया.

समान अवसर से वंचित करना सम्मान और गरिमा का अपमान
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच  ने महिला को नौकरी न देने के लिए इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन को कड़ी फटकार लगाई. कोर्ट ने कहा कि किसी महिला को समान अवसर से वंचित करना उसके सम्मान और गरिमा का अपमान है.

महिलाओं को देवी का दर्जा देता है भारत
इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि अधिकारियों ने शायद महिला को इस नौकरी के लिए इसलिए उपयुक्त नहीं माना होगा, क्योंकि इस काम में शारीरिक मेहनत करनी पड़ती है. रिफिलिंग हेल्पर के पद पर काम करने वाले व्यक्ति को एलपीजी गैस सिलेंडर उठाने पड़ते हैं और इस नौकरी में रात की शिफ्ट भी होती है.

हालांकि, कोर्ट ने इस दलील पर आपत्ति जताई. जस्टिस अरविंद कुमार ने कहा कि हम भारत में रहते हैं और हर दिन महिलाओं के सम्मान की बात दोहराते हैं. उन्हें देवी का दर्जा देते हैं. ऐसे में किसी महिला के साथ इस तरह का व्यवहार महिलाओं के सम्मान का अपमान है. कोर्ट ने यह भी कहा कि हैरानी की बात है कि यह काम किसी निजी संस्था ने नहीं, बल्कि भारत सरकार के अंतर्गत आने वाले संस्थान ने किया है.


घर में महिलाएं उठाती हैं गैस सिलेंडर, फिर नौकरी के लिए कमतर क्यों?
कोर्ट ने यह भी कहा कि घर में महिलाएं रोज़ गैस सिलेंडर उठाती और बदलती हैं. जब घर में पुरुष नहीं होते, तब महिलाएं ही गैस सिलेंडर बदलती हैं. ऐसे में उन्हें इस तरह के काम के लिए कमतर आंकना कहां तक उचित है?

कोर्ट के सामने मामला क्या था
यह मामला हरियाणा के गांव गुढ़ा की रहने वाली एक महिला से जुड़ा था. महिला का नाम उन 49 लोगों में शामिल था, जिन्हें डिप्टी कमिश्नर की अध्यक्षता वाली एक स्थानीय समिति ने इंडियन ऑयल के एलपीजी बॉटलिंग प्लांट में नौकरी के लिए सुझाया था.

महिला ने कैजुअल खलासी/चपरासी/रिफिलिंग हेल्पर के पद के लिए इंटरव्यू दिया था. हालांकि, उन्हें नौकरी नहीं मिली, जबकि 43 अन्य लोगों को नियुक्त कर लिया गया.

ट्रायल कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक

महिला ने नौकरी न दिए जाने के खिलाफ अदालत का रुख किया. ट्रायल कोर्ट ने माना कि वह नौकरी के लिए पूरी तरह योग्य थीं और उन्हें सिर्फ महिला होने की वजह से नौकरी नहीं दी गई. कोर्ट ने इंडियन ऑयल को उन्हें कैजुअल कर्मचारी/ प्रशासनिक कर्मचारी या चपरासी के पद पर नियुक्त करने का आदेश दिया.

हालांकि, बाद में हाई कोर्ट ने 14 अक्टूबर 2025 को दिए अपने फैसले में कहा कि महिला के पास नौकरी पाने का पुख्ता कानूनी अधिकार नहीं था. ऐसे में सिर्फ यह कहना कि उन्हें महिला होने की वजह से नौकरी नहीं दी गई, नियुक्ति का आदेश जारी करने के लिए पर्याप्त नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला, नौकरी के बजाय मिला मुआवज़ा
महिला ने हाई कोर्ट के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. सुनवाई के दौरान इंडियन ऑयल के वकील ने मामले को आपसी बातचीत के जरिए सुलझाने का सुझाव दिया. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया.

कोर्ट ने कहा कि महिला अब रिटायरमेंट की उम्र पार कर चुकी हैं. इसलिए उन्हें नौकरी देने के बजाय इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन को नौकरी से वंचित की  भरपाई के तौर पर 12 लाख का मुआवज़ा देना होगा.

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