असल जिंदगी पर आधारित है विजय-रश्मिका की नई फिल्म ‘रणबाली’? दिल दहला देने वाली 1876-78 में मद्रास के भीषण अकाल की कहानी
Vijay‑Rashmika Movie Ranabaali: विजय देवरकोंडा और रश्मिका मंदाना की नई फिल्म ‘रणबाली’ का टीजर आते ही छा गया है. पर क्या आप जानते हैं कि पर्दे पर दिखने वाला ये खूनी संघर्ष कोई कोरी कल्पना कहानी नहीं, बल्कि 1876 के उस भयानक अकाल का कड़वा सच है जहां भूख से तड़पते लोगों ने बगावत का रास्ता चुना था.
विजय देवरकोंडा की आने वाली नई फिल्म ‘रणबाली’ का टीजर हाल ही में रिलीज हुआ है और आते ही इसने इंटरनेट पर तहलका मचा दिया है. टीजर की शुरुआत से ही समझ आ जाता है कि कहानी कितनी सीरियस और बड़े लेवल की है. पर्दे पर विजय एक खूंखार योद्धा के किरदार में नजर आ रहे हैं, जिसकी आंखों में गुस्सा और दर्द साफ दिखता है. उनके चारों तरफ फैली दुनिया आग की लपटों में घिरी है. एक तरफ उनके अपने लोग दाने-दाने को मोहताज हैं और भूख से तड़प रहे हैं, तो दूसरी तरफ अंग्रेजी हुकूमत अपनी ताकत के दम पर जनता को कुचल रही है. ऐसे बुरे हालात में बगावत ही अकेला रास्ता बचता है.
फिल्म में रश्मिका मंदाना ने जयम्मा का रोल निभाया है, जो विजय के किरदार की पत्नी हैं और इस पूरी लड़ाई में उनका बराबर साथ देती हैं. वहीं, अंग्रेजों के क्रूर अफसर सर थियोडोर हेक्टर के रोल में हॉलीवुड के जाने-माने एक्टर अर्नोल्ड वोस्लो दिखाई दे रहे हैं, जो उनके रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा हैं. डायरेक्टर राहुल सांकृत्यायन ने इस टीजर में बिल्कुल साफ कर दिया है कि कहानी किस मोड़ पर जाने वाली है. ये लड़ाई एक आम आदमी, उसके स्वाभिमानी समाज और उस बेरहम हुकूमत के बीच है, जो किसी भी कीमत पर अपनी हार नहीं मानती. ये टकराव पर्दे पर रोंगटे खड़े कर देने वाला रोमांच पैदा करने वाला होगा.
अकाल की वो मार जिसने सब उजाड़ दिया
फिल्म से जुड़े मेकर्स के पुराने बयानों की मानें तो ‘रणबाली’ की पूरी कहानी 1876 से 1878 के बीच आए मद्रास के उस भयानक अकाल पर आधारित है, जिसने रायलसीमा के इलाके को पूरी तरह निगल लिया था. साल 1876 में मानसून पूरी तरह दगा दे गया और बारिश की एक-एक बूंद के लिए लोग तरस गए. ये इलाका पहले से ही सूखे की मार झेल रहा था, इसलिए लोगों के पास आगे खाने के लिए कोई जमा पूंजी या अनाज का दाना नहीं बचा था. खेत में खड़ी फसलें जलकर राख हो गई थी. गरीब किसानों ने अपनी आंखों के सामने अपनी जिंदगी भर की मेहनत और रोजी-रोटी को एक ही झटके में खत्म होते देखा.
जब कुदरती आफत अंग्रेजों का जुर्म बन गई
इतिहास के पन्नों को पलटें तो समझ आता है कि ये तबाही सिर्फ बारिश न होने से नहीं आई थी, बल्कि अंग्रेजी हुकूमत की गंदी नीतियों ने इसे एक बहुत बड़ा जुर्म बना दिया था. उस वक्त पूरे भारत पर अंग्रेजों का राज था और उनकी सोच में सिर्फ एक ही बात हावी थी कि ज्यादा से ज्यादा व्यापार हो और खजाना भरे. इसलिए एक तरफ रायलसीमा में औरतें और बच्चे भूख से तड़प-तड़पकर दम तोड़ रहे थे, तो दूसरी तरफ बंदरगाहों से पानी के बड़े-बड़े जहाज अनाज भरकर विदेशों में भेजा करते थे. अंग्रेज अफसर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे और बाजार के भरोसे सब छोड़ दिया.
इंसान नहीं, सिर्फ कागजों का हिसाब देखा
उस दौर में राहत का काम देखने वाले अंग्रेज अफसर सर रिचर्ड टेम्पल ने इस मानवीय त्रासदी को सुलझाने के बजाय इसे एक बहीखाता बनाकर रख दिया. उन्होंने राहत शिविरों में मिलने वाले खाने के राशन में भारी कटौती कर दी. ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स और पुराने दस्तावेजों की मानें तो इन राहत कैंपों में भूखे लोगों को जेल के कैदियों से भी कम खाना और कैलोरी दी जाती थी, ताकि सरकारी खर्च कम हो. इसके आंकड़े आज भी इंसानियत को शर्मसार कर देते हैं. अकेले रायलसीमा में लगभग 7 लाख लोग मारे गए थे, जबकि पूरे देश में ये आंकड़ा 1 करोड़ से ऊपर माना जाता है. फिल्म टीजर में 80 लाख मौतों का जिक्र है.
भूखे पेट और अंग्रेजी हुकूमत का भारी लगान
इतने बुरे अकाल और तबाही के बाद भी अंग्रेजों का दिल नहीं पसीजा और उनके लगान वसूलने वाले सिपाही गरीबों के दरवाजों पर दस्तक देते रहे. एक तरफ घरों में भुखमरी का साया था और दूसरी तरफ मालगुजारी का भारी दबाव. यही वो दर्दनाक मोड़ था जहां से ‘रणबाली’ के अंदर दिखाई जाने वाली बगावत की असली नींव पड़ी. जब लोगों को लगा कि वो वैसे भी भूख से मर ही रहे हैं, तो उन्होंने अनाज के गोदामों पर छापे मारने शुरू कर दिए. पूरे के पूरे गांवों ने अंग्रेजों को लगान देने से साफ मना कर दिया. ये कोई सोची-समझी बगावत नहीं थी, बल्कि अपनी जान बचाने की आखिरी कोशिश थी.
जिन्हें डाकू कहा गया, वो लोककथाओं के हीरो बने
उस जमाने में ब्रिटिश सरकार ने इस पूरे विरोध को हमेशा की तरह एक बड़ा जुर्म और कानून व्यवस्था की समस्या करार दिया. अंग्रेजों के लिए अपनी हक की रोटी मांगना भी अपराध था, लेकिन रायलसीमा की माटी और वहां की पीढ़ियां इस बात को बिल्कुल अलग नजरिए से याद रखती हैं. वहां की पुरानी लोककथाओं में ये लोग कोई मुजरिम नहीं थे, बल्कि वे आम इंसान थे जिन्होंने सरकार के बेरहम रवैये के खिलाफ हथियार उठाए थे. इतिहास की मोटी-मोटी किताबों में भले ही इन गुमनाम नायकों का नाम मिटा दिया गया हो, लेकिन वहां के लोकगीत आज भी इनकी वीरता की गवाही सीना तानकर देते हैं.
क्या ‘रणबाली’ असल जिंदगी में थे?
अगर आप सोच रहे हैं कि ये फिल्म किसी एक बागी की बायोपिक है, तो ऐसा बिल्कुल नहीं है. फिल्म किसी एक दर्ज ऐतिहासिक चेहरे की हूबहू कहानी नहीं दिखाती. इसके उलट डायरेक्टर ने उस पूरे दौर के दर्द, भुखमरी, धोखे और अंग्रेजों के जुल्म को उठाकर एक दमदार योद्धा के किरदार में ढाल दिया है. ये फिक्शनल रोल उन तमाम गुमनाम सूरमाओं का अक्स है, जिन्होंने कभी झुकना नहीं सीखा. माइथ्री मूवी मेकर्स के बैनर तले बनी ये पीरियड ड्रामा फिल्म सिर्फ अंग्रेजों के कपड़े पहनकर दिखाने का तमाशा नहीं है, बल्कि असली इतिहास का वो दर्द है, जो 16 अक्टूबर को सिनेमाघरों में रिलीज होगी.