दिल्ली के लड़के का मुंबई में संघर्ष, ऐसे तय किया विलेन से हीरो बनने तक का सफर; Zee News के साथ ताहिर राज भसीन ने खोले दिल के राज
Tahir Raj Bhasin Zee News Interview: परिणीति चोपड़ा के साथ नई वेब सीरीज ‘शक’ को लेकर चर्चा में चल रहे ताहिर राज भसीन ने हाल ही में Zee News के साथ अपने 10 साल के फिल्मी सफर पर खुलकर बात की है. 15 साल की उम्र में एक्टिंग का सपना देखने, मुंबई में घर ढूंढने की जद्दोजहद और ‘मर्दानी’ से रातों-रात बदली किस्मत की अनसुनी दास्तान.
21 अप्रैल 1987 को दिल्ली में जन्मे ताहिर राज भसीन ने काफी कम उम्र से ही एक्टिंग सीखना शुरू कर दिया था. पर्दे पर उन्होंने अपने करियर की शुरुआत साल 2012 में आई फिल्म ‘किस्मत लव पैसा दिल्ली’ में एक छोटे से रोल से की थी. हालांकि, 2014 की फिल्म ‘मर्दानी’ में उनके दमदार विलेन के किरदार ने उन्हें घर-घर में पहचान दिलाई. इसके बाद उन्होंने ‘फोर्स 2’, ‘मंटो’, ‘छिछोरे’, ‘83’ और ‘लूप लपेटा’ जैसी करीब 10 फीचर फिल्मों में अपने बेहतरीन काम से लाखों-करोड़ों दर्शकों का दिल जीत लिया.
हाल ही में 24 सितंबर को नेटफ्लिक्स पर आई मिस्ट्री-थ्रिलर सीरीज ‘शक: ट्रस्ट नो वन’ में ताहिर, परिणीति चोपड़ा के साथ नजर आ रहे हैं. इसमें वे एक ऐसे पिता के रोल में दिखाई दे रहे हैं, जो अस्पताल से अपने नवजान बच्चे के किडनैप होने के बाद मुश्किल हालातों से जूझता है. ताहिर के मुताबिक इस कहानी के सस्पेंस ने उन्हें तुरंत खींच लिया था. हाल ही में ताहिर ने Zee News के साथ अपने सफर पर खुलकर बात की. इस दौरान उन्होंने अपनी जिंदगी और करियर से जुड़े कई उतार-चढ़ाव के बारे में बताया.
Zee News के साथ ताहिर राज भसीन ने की ढेर सारी बातें
सवाल: आपने सिर्फ 15 साल की उम्र में एक्टिंग की शुरुआत की थी और आज आप इंडस्ट्री में जाना-पहचाना नाम हैं. जब शुरुआत की थी, तो क्या कभी लगा था कि बॉलीवुड में इतने बड़े मुकाम पर पहुंचेंगे?
ताहिर राज भसीन: सच कहूं तो ऐसी कोई पक्की उम्मीद नहीं थी, बस एक सपना था. इतनी कम उम्र में जब मैंने शुरुआत की, तो दिल्ली में बैरी जॉन एक्टिंग स्टूडियो गया. वहां सुना था कि शाहरुख खान, मनोज बाजपेयी और नसीरुद्दीन शाह जैसे दिग्गजों ने भी वहीं से सीखा है. बस वहीं से मेरी एक्टिंग की ट्रेनिंग शुरू हुई.
इसके बाद मैंने फिल्म और मीडिया में मास्टर्स किया. पापा एयरफोर्स में थे, तो उनका जहां ट्रांसफर होता, हम भी साथ जाते. मैं ग्वालियर, जामनगर और इलाहाबाद जैसी जगहों पर रहा. छोटे शहरों में रहने से आपको असली भारत और लोगों को समझने का मौका मिलता है. फिर कॉलेज के लिए दिल्ली लौटा. दिमाग में बस एक ही धुन थी कि मुंबई जाना है.
लगता था मुंबई जाते ही फिल्म मिल जाएगी और काम चालू हो जाएगा, लेकिन असलियत बहुत अलग निकली; यहां तो 6 महीने सिर्फ किराए का कमरा खोजने में लग गए. फिर ऑडिशन्स का दौर चला और 3 साल की भागदौड़ के बाद ‘मर्दानी’ मिली. पिछले 10 सालों में मेरी यही कोशिश रही है कि हर तरह के रोल करूं ताकि कोई मुझे किसी एक इमेज में बांध न सके.
सवाल: आपने ‘किस्मत लव पैसा दिल्ली’ और ‘काई पो छे’ में छोटे-मोटे रोल किए और फिर सीधे ‘मर्दानी’ में विलेन बने. ये शुरुआत कैसी रही?
ताहिर राज भसीन: ये सफर मेरे लिए बहुत यादगार रहा. ‘मर्दानी’ में ऑडियंस और क्रिटिक्स ने मुझे कोई आम विलेन नहीं, बल्कि एक ‘एंटी-हीरो’ की तरह देखा. एंटी-हीरो वो होता है, जिसके काम तो बुरे होते हैं, लेकिन उसका चेहरा-मोहरा आम लड़के जैसा लगता है और लोग उससे कनेक्ट कर जाते हैं.
ये एक अलग तरह का डेब्यू था, जो लोगों को पसंद आया, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती ये थी कि मैं विलेन के रोल में ही टाइपकास्ट न हो जाऊं. उस इमेज को तोड़ने के लिए ही मैंने बाद में ‘मंटो’ और ‘छिछोरे’ जैसी फिल्में चुनीं, जिससे मेकर्स का मुझे देखने का नजरिया बदला.
सवाल: ‘मर्दानी’ से आपको जबरदस्त पहचान मिली. क्या शूटिंग के वक्त आपको ये अंदाजा था कि ये फिल्म आपकी किस्मत बदल देगी?
ताहिर राज भसीन: बिल्कुल भी नहीं. मैं बस यही सोचकर काम कर रहा था कि अपनी मेहनत पूरी रखनी है, आगे जो होगा देखा जाएगा. शूटिंग के वक्त किसी को नहीं पता होता कि फिल्म चलेगी या नहीं. जब अच्छे रिव्यूज आने लगे तो मैं सबसे पहले मंदिर गया.
फिल्मों में सुना था कि शुक्रवार को किस्मत पलट जाती है, लेकिन मेरे साथ ये सच हुआ. गुरुवार तक मुझे कोई खास नहीं जानता था और सोमवार आते-आते सब बदल गया. पहले ‘मर्दानी’ सिर्फ एक ही फिल्म बननी थी, पर प्यार इतना मिला कि इसका दूसरा और तीसरा पार्ट भी बना. यशराज फिल्म्स और स्वर्गीय प्रदीप सरकार के साथ डेब्यू करना मेरे लिए मैच की आखिरी गेंद पर छक्का लगाने जैसा था.
सवाल: जब कोई नई स्क्रिप्ट आती है, तो आप किस बात पर सबसे ज्यादा ध्यान देते हैं—कहानी या अपना किरदार?
ताहिर राज भसीन: मेरे लिए दोनों चीजें बहुत मायने रखती हैं. कहानी में दम होना सबसे पहली शर्त है, लेकिन उस कहानी में मेरा रोल क्या कर रहा है और वह कहानी को कहां ले जा रहा है, यह भी उतना ही जरूरी है. इसके अलावा डायरेक्टर कौन है, ये भी बहुत अहम होता है. कहानी कितनी भी अच्छी हो, अगर डायरेक्टर उसे सही से संभाल न पाए तो बात बिगड़ जाती है. मैं खुशकिस्मत हूं कि मुझे हमेशा अच्छे डायरेक्टर्स मिले.
सवाल: एक एक्टर के नाते आपको कौन सा प्लेटफॉर्म ज्यादा पसंद आता है—थिएटर या ओटीटी?
ताहिर राज भसीन: दोनों की अपनी अलग अहमियत है. ‘पठान’ या ‘83’ जैसी फिल्में दोस्तों के साथ थिएटर में पॉपकॉर्न खाते हुए देखने का अलग ही क्रेज है. वहीं ‘ये काली काली आंखें’ जैसी आठ-आठ एपिसोड की वेब सीरीज को लोग ओटीटी पर सुकून से देखते हैं. ओटीटी ने एक्टर्स को एक नया मंच दिया है, जहां लोग सफर करते हुए या मेट्रो में भी आपका काम देख सकते हैं.
सवाल: आपकी नई सीरीज ‘शक’ में रोल आपका रोल काफी भारी और इमोशनल है. इसके लिए आपने खुद को कैसे तैयार किया?
ताहिर राज भसीन: ये काफी लेयर्ड किरदार है, इसे पूरी तरह सही या गलत नहीं कह सकते. वो कुछ ऐसे कदम उठाता है, जिसका असर पूरे परिवार पर पड़ता है. इसकी कहानी रेंसिल डिसिल्वा ने लिखी है, जिन्होंने ‘रंग दे बसंती’ लिखी थी. वे किरदारों को बहुत खूबसूरती से पेश करते हैं.
तैयारी के दौरान मैंने सबसे पहले ये समझा कि मेरे किरदार ‘आलोक’ की असली चाहत क्या है. वो बस एक खुशहाल परिवार चाहता है, लेकिन जब जिंदगी में मुश्किलें आती हैं, तब किरदार में असली दम दिखता है. एक पिता, पति और बेटे के अंदर की उलझन को पर्दे पर उतारना काफी दिलचस्प और थका देने वाला एक्सपीरियंस था.
सवाल: परिणीति चोपड़ा के साथ आपका स्क्रीन शेयर करने का एक्सपीरियंस कैसा रहा?
ताहिर राज भसीन: बहुत ही शानदार. हम दोनों ने अपने करियर की शुरुआत यशराज फिल्म्स से की थी, तो एक-दूसरे को बहुत पहले से जानते थे, लेकिन काम पहली बार साथ किया. परिणीति बहुत ही डाउन-टू-अर्थ और सहज को-स्टार हैं. वे मुझसे सीनियर हैं, लेकिन सेट पर जरा भी घमंड नहीं दिखातीं. हम सीन्स को लेकर आपस में खूब चर्चा करते थे. वे जितनी मस्तीखोर स्क्रीन पर दिखती हैं, असल में भी वैसी ही जिंदादिल हैं. जब सीन बहुत सीरियस हो, तो उनके जैसे हंसमुख को-स्टार के साथ काम करना आसान हो जाता है.
सवाल: आपकी आने वाली फिल्म ‘पल भर के लिए’ के बारे में कुछ बताइए?
ताहिर राज भसीन: ये एक बेहद सेंसिटिव फिल्म है. ये मेंटल हेल्थ और उसकी वजह से पूरे परिवार पर पड़ने वाले असर की कहानी कहती है. फैशन डिजाइनर विक्रम फडणीस ने बतौर डायरेक्टर अपनी पहली हिंदी फिल्म बनाई है. जब हमने इसे ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न फिल्म फेस्टिवल में दिखाया था, तो लोगों ने खड़े होकर तालियां बजाई थीं. मुझे इंतजार है कि भारत के लोग इसे कब देखेंगे.
सवाल: शूटिंग के दौरान कोई ऐसा सीन था, जिसने आपको बहुत ज्यादा इमोशनल और थका दिया?
ताहिर राज भसीन: हां, गणपति विसर्जन के बीच शूट किया गया एक सीन था. चारों तरफ भारी भीड़, तेज आवाजें और ढोल-नगाड़े बज रहे थे. इतने शोर के बीच अंदर के गहरे दर्द और इमोशन को चेहरे पर बनाए रखना बहुत मुश्किल था, लेकिन जब एडिटिंग के बाद वो सीन देखा, तो लगा कि सारी मेहनत वसूल हो गई.
सवाल: बॉलीवुड में अक्सर एक्टर्स को एक ही सांचे में ढाल दिया जाता है. आप खुद को इससे कैसे बचाते हैं?
ताहिर राज भसीन: ये पूरी तरह एक एक्टर के अपने हाथ में होता है कि वो किस तरह के रोल चुनता है. जब कोई ऑफर आता है और लगता है कि ऐसा मैं पहले कर चुका हूं, तो मैं उससे बचता हूं. मैं हमेशा अलग-अलग जॉनर में हाथ आजमाने की कोशिश करता हूं.
मुझे ‘ये काली काली आंखें’ जैसा लवर बॉय बनना भी पसंद है और ‘मर्दानी’ जैसा विलेन बनना भी. मैं शाहरुख खान और इरफान खान जैसे एक्टर्स को देखकर बड़ा हुआ हूं, जिन्होंने हर तरह के रोल में अपनी छाप छोड़ी. एक अच्छे एक्टर को हर सांचे में ढलना आना चाहिए.
सवाल: रीयल लाइफ में आप ‘शक’ करने वाले इंसान हैं या लोगों पर आसानी से भरोसा कर लेते हैं?
ताहिर राज भसीन: (हंसते हुए) इस सीरीज को करने के बाद थोड़ा असर जरूर पड़ा है, क्योंकि रेंसिल सर की कहानी ही ऐसी थी, लेकिन सच कहूं तो मैं लोगों पर आसानी से भरोसा कर लेता हूं. मुझे लगता है कि जिंदगी में कुछ गिने-चुने दोस्तों और परिवार पर भरोसा होना बहुत जरूरी है, जो आपको सही सलाह दे सकें.
सवाल: दिल्ली और एयरफोर्स बैकग्राउंड ने आपको बॉलीवुड की चकाचौंध के बीच ग्राउंडेड रहने में कितनी मदद की?
ताहिर राज भसीन: मुंबई आने से पहले और स्ट्रगल के दिनों में जो दोस्त मेरे साथ थे, आज भी वही मेरे सबसे करीबी हैं. अपनी लाइफ को सिंपल रखना ही मेरा फंडा है. जब भी काम से फुर्सत मिलती है, मैं फिल्मों की दुनिया से दूर अकेले घूमने निकल जाता हूं या किताबें पढ़ता हूं. मुझे लगता है कि 24 घंटे सिर्फ फिल्मों की बात करते रहने से आपकी निजी सोच का दायरा सिमट जाता है.