52 साल बाद फिर इतिहास रचने को तैयार मीना कुमारी की खूबसूरती! विदेशों में लहराएगा ‘पाकीजा’ के 4K वर्जन का परचम
Pakeezah 4K Restoration: भारतीय सिनेमा की सबसे हसीन मीना कुमारी की क्लासिक फिल्म ‘पाकीजा’ अब 4K अवतार में ऑडियंस के सामने आ रही है. करीब दो साल की कड़ी मेहनत के बाद इसे फ्रांस और लंदन के बड़े और फेमस फिल्म फेस्टिवल में दिखाया जाएगा. मीना कुमारी की खूबसूरती और जादू एक बार फिर बड़े पर्दे पर इतिहास रचने को तैयार है.
भारतीय सिनेमा की सबसे यादगार और खूबसूरत फिल्मों में शुमार मीना कुमारी की ‘पाकीजा’ एक बार फिर बड़े पर्दे पर अपनी चमक बिखेरने के लिए तैयार है. साल 1972 में आई इस क्लासिक फिल्म को अब 4K क्वालिटी में रिस्टोर किया गया है. इस नए वर्जन का वर्ल्ड प्रीमियर फ्रांस के ल्यों शहर में ऑर्गेनाइज होने वाले मशहूर फेस्टिवल ल्यूमियर में ग्रैंड लेवल पर किया जाएगा. इसके बाद ये फिल्म ब्रिटेन के फेमस बीएफआई लंदन फिल्म फेस्टिवल का रुख करेगी. फिल्म को उसके पुराने और असली रंग-रूप में लौटाने का ये बड़ा बीड़ा नॉन-प्रॉफिट ऑर्गेनाइजेशन फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन ने उठाया था.
इस ऑर्गेनाइजेशन ने लगभग दो साल की दिन-रात मेहनत के बाद फिल्म के हर एक फ्रेम को फिर से जिंदा किया है. फ्रांस में होने वाले इस प्रीमियर का जिम्मा कान और ल्यूमियर फेस्टिवल के थिएरी फर्मो संभालेंगे, जो वर्ल्ड सिनेमा के एक बड़े नाम हैं. ल्यों में अपनी चमक बिखेरने के बाद ये आइकॉनिक फिल्म सीधे लंदन पहुंचेगी, जहां बीएफआई आईमैक्स में इसका गाला शो ऑर्गेनाइज किया जाएगा. इस खास मौके पर फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन के डायरेक्टर शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर के साथ डायरेक्टर कमाल अमरोही के बेटे ताजदार, बेटी रुखसार और पोते बिलाल अमरोही भी मौजूद रहेंगे.
‘पाकीजा’ बनने का 15 साल लंबा सफर
जाने-माने फिल्म क्रिटिक्स डेरेक मैल्कम ने एक बार इस फिल्म को अब तक के सबसे शानदार म्यूजिकल मेलोड्रामा में से एक बताया था. इस फिल्म का नया रूप पुरानी यादों को बड़े पर्दे पर ताजा कर देगा. फिल्म ‘पाकीजा’ का इतिहास पर्दे की कहानी जितना ही इमोशनल और उतार-चढ़ाव से भरा रहा है. इसे कमाल अमरोही ने 1950 में अपनी पत्नी और एक्ट्रेस मीना कुमारी के हुस्न और अदाकारी को समर्पित करने के लिए सोचा था, लेकिन इस सपने को बड़े पर्दे पर उतरने में पूरे 15 साल का लंबा वक्त लग गया. साल 1956 में जब इसकी शूटिंग शुरू हुई थी, तब इसे ब्लैक एंड व्हाइट में शूट किया जा रहा था.
मीना कुमारी की आखिरी फिल्म
लखनऊ में नवाबों के दौर के आखिरी समय के बैकग्राउंड पर बनी फिल्म ‘पाकीजा’ में मीना कुमारी ने तवायफ नरगिस और उनकी बेटी साहिबजान, दोनों के यादगार किरदार निभाए थे. लगभग 15 साल के प्रोडक्शन के बाद, ये फिल्म आखिरकार 4 फरवरी, 1972 को देश भर में सिनेमाघरों में रिलीज हुई. ये फिल्म बॉक्स-ऑफिस पर बहुत हिट रही और इसे फिल्म क्रिटिक्स से भी खूब तारीफ मिली. रिलीज के कुछ ही हफ्तों बाद मीना कुमारी के निधन ने इस फिल्म की विरासत को और भी खास बना दिया. 1968 में लिवर सिरोसिस से पीड़ित मीना कुमारी का 38 साल की उम्र में 31 मार्च, 1972 को निधन हो गया.
पुरानी तस्वीरों और यादों का सहारा
बाद में 1958 के आसपास तकनीक बदलने पर इसे ईस्टमैनकलर में फिल्माया जाने लगा. मशहूर जर्मन कैमरामैन जोसेफ विर्शिंग ने अपने कैमरे से फिल्म के हर सीन को जादुई बना दिया था, जिसे लोग आज भी भूल नहीं पाए. फिल्म को रिस्टोर करने का ये काम बिल्कुल भी आसान नहीं था, क्योंकि वक्त की मार से कई हिस्से खराब हो चुके थे. रिसर्च के दौरान फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन की टीम को शूटिंग की कुछ पुरानी असली तस्वीरें मिलीं, जिनसे काफी मदद मिली. इसके अलावा शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर ने कमाल अमरोही के बेटे ताजदार और बेटी रुखसार से भी लंबी बातचीत की, जिन्होंने सेट और शूटिंग का माहौल देखा था.
ग्लोबल प्लेटफॉर्मस पर भारतीय सिनेमा का डंका
उनके दिमाग में उस दौर की हर बात बिल्कुल साफ थी, जिससे टीम को असली रंग और आवाज को वापस लाने में सही दिशा मिली. इस काम में अमरोही परिवार ने पूरा सहयोग दिया. कमाल अमरोही परिवार और ऑर्गेनाइजेशन के कोलेबरेशन से तैयार ये रिस्टोर्ड प्रिंट अब पूरी दुनिया में भारत का मान बढ़ा रहा है. फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन के लिए पिछला एक साल इंटरनेशनल लेवल पर बेहद शानदार और ऐतिहासिक रहा है. ऑर्गेनाइजेशन ने पिछले 12 महीनों में दुनिया के लगभग सभी बड़े फिल्म फिस्टेवल्स में अपनी रिस्टोर की गई फिल्मों को पहुंचाया है. इस लिस्ट में कई बड़े नाम शामिल हैं.
नए दौर में पुरानी कला की वापसी
इनमें बर्लिन में ‘इन व्हिच एनी गिव्स इट दोज वन्स’, कान में ‘अम्मा अरियन’ और वेनिस में ‘इंग्लिश, अगस्त’ की सक्सेसफुल स्क्रीनिंग शामिल है. अब ‘पाकीजा’ के साथ ऑर्गेनाइजेशन का ये सफर और भी ज्यादा प्राउड बन गया है. ‘पाकीजा’ का 4K में आना सिर्फ एक पुरानी फिल्म का दोबारा रिलीज होना भर नहीं है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर को अगली पीढ़ी के लिए सहेजने का बड़ा कदम है. आज की युवा पीढ़ी, जिसने इस फिल्म को केवल टीवी स्क्रीन या मोबाइल पर देखा है, वे अब इसके दिल में बसे गाने, म्यूजिक, शायरी और उस दौर के बड़े-बड़े सेट को स्क्रीन पर महसूस कर सकेगी.