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कुछ साल पहले जब पहली बार ऐसी खबरें आईं कि हिंदू महाकाव्य 'रामायण' पर एक भव्य बॉलीवुड फिल्म बनने जा रही है, तो एक बात तय थी. वो ये की यह खूब चर्चा में रहेगी. यकीनन इसके पीछे सिर्फ अच्छे कारण ही नहीं होंगे. जहां एक तरफ कुछ लोग बड़े पर्दे पर इस भव्य प्रस्तुति को देखने के लिए उत्साहित थे. वहीं, कुछ लोगों को 'रामायण' के गलत चित्रण पर आपत्ति थी. उनका तर्क था कि कुछ घटनाओं या पात्रों को जिस तरह से दिखाया गया है, वह सही नहीं है. जैसे-जैसे निर्देशक नितेश तिवारी की 'रामायण: पार्ट 1' रिलीज के करीब आ रही है. सोशल मीडिया पर इस तरह की चर्चाओं की बाढ़ आ गई है. भगवान राम के रूप में रणबीर कपूर के लुक से लेकर माता सीता के रूप में साई पल्लवी की स्टाइलिंग तक, इस पौराणिक एक्शन फिल्म के रिलीज़ होने से पहले ही 'रामायण' के कई पहलुओं पर लोगों ने नाराजगी जताई है.
हालांकि, कई लोग रामायण की आलोचना करने के लिए सटीकता शब्द का इस्तेमाल करते हैं और इसकी तुलना रामानंद सागर के मशहूर टीवी सीरियल 'रामायण' (1987) से कर रहे हैं. ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि आखिर असली रामायण कौन सी है? इसके अलावा यह मुद्दा तब खड़ा होता है जब रामायण को एक कहानी, किस्से और कुछ लोगों के दावे के अनुसार इतिहास के रूप में देखा जाता है. इससे यह साफ हो जाता है कि कोई एक रामायण नहीं है, बल्कि कई रामायण हैं.
यूं तो मलयालम सिनेमा में सीधे तौर पर 'रामायण' पर आधारित फिल्में बहुत कम ही बनी हैं. लेकिन जितनी भी बनी है, यहां के फिल्ममेकर्स ने इस महाकाव्य को अपने-अपने तरीके से पर्दे पर उतारने की कोशिश जरूर की है. ऐसे में अगर उन 'रामायण' आधारित फिल्मों को देखें तो इसमें पूरी कहानी दिखाने के बजाय उसके विचारों, दर्शन और असल भाव को समझने पर ज्यादा ध्यान दिया गया है. इस महाकाव्य पर आधारित दो शुरुआती फ़िल्मों को देखने से यह बात साफ हो जाती है.
निर्देशक-निर्माता कुंचाको और उनके 'उदया स्टूडियो' की फिल्म 'सीता' (1960) को मलयालम में रामायण का सबसे शुरुआती रूपांतरण माना जा सकता है. प्रेम नजीर और कुसलाकुमारी स्टारर यह फिल्म रावण के खिलाफ युद्ध के बाद 14 साल के वनवास से लौटने पर राम और सीता के जीवन को दिखाती है. साथ ही यह भी दिखाती है कि बाद में राम ने सीता का त्याग कर दिया था. लेकिन ज्यादा नाटकीय शैली वाली इस फिल्म में वी दक्षिणामूर्ति द्वारा रचित म्यूजिक पर भी काफी जोर दिया गया था.
दो साल बाद उदय स्टूडियो के प्रतिद्वंद्वी मैरीलैंड स्टूडियो ने 'श्रीराम पट्टाभिषेकम' (1962) रिलीज की. इसमें राम की कहानी के सभी अहम पड़ाव दिखाए गए. जैसे सीता स्वयंवर और उनका 14 साल का वनवास, रावण द्वारा सीता का अपहरण, लंका का युद्ध और अयोध्या लौटने पर राम का राज्याभिषेक.
जीके रामू के निर्देशन में बनी फिल्म 'श्रीराम पट्टाभिषेकम' को मैरीलैंड स्टूडियो के मालिक सुब्रमण्यम की देखरेख में तैयार किया गया था. इस फिल्म में रामायण की कहानी को ज्यादा विस्तार से और बिना ज्यादा नाटकीयता के दिखाया गया. इसमें प्रोडक्शन डिजाइन और कलाकारों की एक्टिंग भी इसकी खासियत थी. इसमें अहम तौर तौर पर वाल्मीकि रामायण में बताई गई प्रचलित कहानी पर्दे पर दिखाया गया. इसमें खास बात यह थी कि फिल्म में राम को भगवान के बजाय एक आदर्श और धर्म का पालन करने वाले राजा के रूप में दिखाया गया. मलयालम सिनेमा में रामायण को दिखाने के प्रयोग यहीं नहीं रुके.
प्रसिद्ध अनुवादक लोककथा विशेषज्ञ और कवि एके रामानुजन ने अपने चर्चित निबंध 'थ्री हंड्रेड रामायणाज: फाइव एग्जांपल्स एंड थ्री थॉट्स ऑन ट्रांसलेशन' में यह बताया गया है कि राम की कहानी दुनिया की कई भाषाओं में मौजूद है. इसके अनुसार रामायण अन्नामी, बाली, बंगाली, कंबोडियाई, चीनी, गुजराती, जावानी, कन्नड़, कश्मीरी, मराठी, उड़िया, संस्कृत, तमिल, तेलुगु, थाई और तिब्बती जैसी भाषाओं में हैं.
साथ ही राम की कथा काव्य, पुराण और दूसरे साहित्यिक रूपों में भी मिलती है. हालांकि, अपने इस निबंध में रामानुजन अलग-अलग 'रामायण' कहने के बजाय इसे Tellings यानी 'कथन' कहना संबोधित किया है. इसके पीछे उनकी एक खास वजह ये है कि ये रामकथा के अलग-अलग रूपों को समझने में मदद करती है.
मशहूर फिल्मकार जी अरविंदन की 1977 में आई फिल्म 'कंचना सीता' रामायण पर बनी उन चुनिंदा फिल्मों में से एक है, जिसे इस महाकाव्य की बिल्कुल अलग व्याख्या कहा जा सकता है. इस महाकाव्य पर बनी सबसे सशक्त फिल्मों में से एक 'कंचन सीता' सिनेमा और कल्पना की ताकत का बेहतरीन उदाहरण है. इस फिल्म में न तो रावण है और न ही हनुमान. दिलचस्प बात यह है कि फिल्म का नाम सीता के नाम पर होने के बावजूद वे खुद इसमें कहीं दिखाई नहीं देतीं. यह फिल्म सीएन श्रीकांतन नायर के इसी नाम के नाटक पर आधारित थी. रामायण पर बनी सबसे प्रभावशाली फिल्मों में गिनी जाने वाली 'कंचना सीता' ने दिखाया कि सिनेमा और कल्पनाशक्ति के जरिए किसी जानी-पहचानी कहानी को कितने अलग अंदाज में पेश किया जा सकता है.
फिर भी अरविंदन ने पूरी फिल्म में उनकी मौजूदगी का एहसास कराया है. दर्शक हवा और आसपास की आवाजों में सीता की मौजदगी को महसूस कर सकते हैं. 'कंचन सीता' मुख्य रूप से सीता के त्याग के बाद राम के भीतर चल रहे द्वंद्व पर केंद्रित है. फिल्म में दिखाया गया है कि यह आंतरिक संघर्ष, लंका में लड़े गए युद्ध से कहीं अधिक भारी था. फिल्म में राम कहते हैं, 'राजा का सिंहासन आग की भट्ठी के समान है. सीता का पति तो बस जनता का एक सेवक है.' यह उनके फैसले के पीछे के असली कारण को उजागर करता है.
फिल्म में उनके कार्यों को छिपाया या सुधारा नहीं गया है. लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला अप्रत्यक्ष रूप से उनकी आलोचना करती हैं. राम के छोटे भाई भरत सीता को त्यागने के लिए राम से सवाल करते हैं. भरत कहते हैं, 'जो लोग सीता जैसी स्त्री को बेवफा कहते हैं, उन्हें मेरी तलवार से जवाब मिलना चाहिए था.' वे इस बात पर जोर देते हैं कि राम को ऐसे आरोपों का डटकर सामना करना चाहिए था. तब राम जवाब देते हैं, 'मैं 'राम राज्य' की तुम्हारी व्याख्या को स्वीकार नहीं कर सकता.' और यह साफ करते हैं कि 'राम राज्य' कोई एक तय या स्थिर अवधारणा नहीं है. वे आगे कहते हैं, 'जो राम सीता का त्याग कर सकते हैं, वे किसी भी चीज का त्याग करने में सक्षम हैं.' इसी समय एक तेज हवा उन्हें घेर लेती है, जो सीता की मौजूदगी को दर्शाती है.
'द हिंदू' में आई 2014 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, राम, लक्ष्मण और अन्य पात्रों के रोल 'रामा चेंचू' समुदाय के आदिवासी लोगों ने निभाई थीं, जो खुद को भगवान राम का वंशज मानते हैं. 'कंचन सीता' की शूटिंग आंध्र प्रदेश में गोदावरी नदी के किनारे स्थित जंगलों में हुई थी. शाजी एन करुण की बेहतरीन सिनेमैटोग्राफी में बहुत ही सुंदर और खाली 'वाइड शॉट्स' देखने को मिलते हैं, जिनमें राम एक छोटे से इंसान के रूप में दूर-दूर तक फैले पथरीले इलाकों से गुजरते हुए नजर आए.
यह बात इसलिए भी बहुत दिलचस्प है, क्योंकि रामायण के हालिया रूपांतरणों (जिसमें नितेश तिवारी द्वारा निर्देशित फिल्म भी शामिल है) में फ्रेम को कभी भी खाली नहीं छोड़ा जाता. इनमें हमेशा कोई न कोई सामान, लोग या VFX भरे रहते हैं, जिनका कोई खास मकसद नहीं होता. बस भव्यता दिखाने के लिए इनका इस्तेमाल किया जाता है.
हालांकि, आज के समय में शायद ही कोई 'कंचन सीता' जैसी फिल्म बनाने की हिम्मत करेगा. इस फिल्म में गहरे रंग वाले आदिवासी लोग राम और अन्य पात्रों की भूमिका निभाते हैं, जो सवर्ण मानदंडों को चुनौती देता है. यहां उनके पास कोई तथाकथित 'दैवीय शक्तियां' नहीं हैं, वे हर समय युद्ध नहीं करते और न ही वे बहुत अधिक दार्शनिक या भारी-भरकम संवाद बोलते हैं. आज के भारतीय समाज की स्थिति और रामायण तथा राम से जुड़ी हर चीज को लेकर दक्षिणपंथी समूहों की अत्यधिक संवेदनशीलता को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि अगर 'कंचन सीता' आज बनी होती, तो इसे बैन कर दिया जाता. नहीं तो यह सेंसरशिप की ऐसी उलझनों में फंस जाती, जहां से लंबे समय तक बाहर निकलना नामुमकिन होता.
मलयालम सिनेमा में रामायण की एक और अहम प्रस्तुति है साल 1991 में आई निर्देशक सिबी मलयिल की म्यूजिकल ड्रामा 'भरथम'. इसे एके लोहितदास ने लिखा है. यह फिल्म सीधे तौर पर रामायण की कहानी को नहीं बताती. बल्कि इसके मूल विचार को लेती है, जिसमें बड़े भाई राम के चले जाने के बाद भरत को राज्य की जिम्मेदारी संभालनी पड़ती है. यह फिल्म न केवल अपने भाई की विरासत को कायम रखने के लिए भरत के संघर्ष पर ध्यान केंद्रित करती है, बल्कि अपने भाई की जगह लेने के कारण उसे जो इमोशनल बोझ उठाना पड़ता है और उसे भी गहराई से दिखाती है.
यहां भरत का किरदार कल्लोर गोपीनाथन (मोहनलाल) ने निभाया. जबकि राम के किरदार में कल्लोर रामनाथन (नेदुमुदी वेणु) नजर आए थे . ये दोनों ही कर्नाटक म्यूजिक सिंगर हैं. हालांकि, रामायण से अलग इस कहानी में गोपीनाथन को अपने बड़े भाई की जगह जिम्मेदारी संभालनी पड़ती है. इसकी वजह है रामनाथन की शराब की लत, जिसके चलते वह अपने वादे पूरे नहीं कर पाते. दिलचस्प बात यह है कि इस फिल्म को मोहनलाल ने खुद प्रोड्यूस किया था और इसमें अपनी शानदार एक्टिंग के लिए उन्हें पहला नेशनल फिल्म अवॉर्ड भी मिला था.
लोहितदास ने अपनी निर्देशित फिल्म 'चक्रम' (2003) में एक बार फिर रामायण को खंगाला, जिसमें पृथ्वीराज सुकुमारन और मीरा जैस्मीन मुख्य भूमिकाओं में थे. इसमें भी उन्होंने रामायण की कहानी को नहीं बल्कि उसके मूल सार को आधार बनाया. फिल्म में दिखाया गया है कि एक इंसान अपने प्यार को बचाने के लिए किस हद तक जा सकता है, चाहे उसे कितनी ही बुरी ताकतों से क्यों न लड़ना पड़े.
एक तरह से मलयालम सिनेमा ने हमेशा यह दिखाया है कि रामायण की असली ताकत और अहमियत उसकी आत्मा में है, न कि उसके बाहरी ढांचे में. इसके बावजूद इस इंडस्ट्री ने कभी भी रामायण को सीता या रावण के नजरिए से नए सिरे से पेश नहीं किया. यहां तक कि मणिरत्नम की फिल्म 'रावण/रावणन' (2010) के लेवल पर भी नहीं.