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भारतीय सिनेमा में नेशनल फिल्म अवॉर्ड को एक्टिंग के फिल्ड में सबसे बड़े सम्मानों में गिना जाता है. खासतौर पर जब बेस्ट एक्टर या एक्ट्रेस का पुरस्कार किसी कलाकार के लिए बड़ी उपलब्धि माना जाता है. लेकिन पिछले लगभग एक दशक में हिंदी सिनेमा को लेकर एक दिलचस्प ट्रेंड देखने को मिला है. इन ट्रेंड्स को देखकर ऐसा लगता है कि मानो अगर कोई बॉलीवुड स्टार नेशनल अवॉर्ड की रेस में मजबूत दावेदारी पेश करना चाहता है, तो असली जिंदगी से जुड़े किरदार उसके लिए ज्यादा कारगर साबित हो रहे हैं. शायद यही वजह है कि बॉलीवुड में बायोपिक और रियल लाइफ से प्रेरित कहानियां लगातार चर्चा में हैं. पर्दे पर किसी मशहूर या शख्सियत को निभाना एक्टर के लिए चुनौतीपूर्ण जरूर होता है, लेकिन ऐसे किरदारों में एक्टिंग के कई अलग-अलग रंग दिखाने की गुंजाइश भी रहती है. हालांकि, इसे नेशनल अवॉर्ड जीतने का तय फॉर्मूला कहना सही नहीं होगा. क्योंकि पुरस्कार का फैसला पूरी फिल्म और कलाकार की परफॉर्मेंस को ध्यान में रखकर किया जाता है.
यूं तो बॉलीवुड में बायोपिक का दौर कोई नया नहीं है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में रियल-लाइफ कहानियों और असली शख्सियतों पर फिल्में बनाने का चलन जरूर ज्यादा दिखाई देने लगा है. गौर करने वाली बात ये है कि नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स के इतिहास में ऐसी कई फिल्में और परफॉर्मेंस रही हैं, जिनमें कलाकारों ने वास्तविक शख्सियतों को पर्दे पर उतारा. हालिया उदाहरण कार्तिक आर्यन की 'चंदू चैंपियन' है. साल 2024 में रिलीज हुई इस फिल्म में उन्होंने पैरालंपिक स्वर्ण पदक विजेता मुरलीकांत पेटकर का किरदार निभाया. वहीं, 72वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स में बेस्ट एक्टर का सम्मान हासिल किया. यह अवार्ड उन्होंने मलयालम फिल्म 'ब्रह्मयुगम' के लिए ममूटी के साथ शेयर किया.
लेकिन, इसके साथ ये भी सवाल उठता है कि क्या बायोपिक का किरदार निभाना सच में नेशनल अवॉर्ड की रेस में किसी स्टार को बढ़त देता है? या बायोपिक अब एक्टर्स के लिए एक 'सेफ बेट' बन चुका है? या ये बस एक ट्रेंड है, जिसमें कई बेहतरीन फिल्में और परफॉर्मेंस संयोग से अवॉर्ड तक जा पहुंची हैं?
बायोपिक और अवॉर्ड का कनेक्शन
दरअसल, बायोपिक में कहानी पहले से ही होती है. हालांकि, पर्दे पर उसे विश्वसनीय बनाना फिल्ममेकर और एक्टर दोनों के लिए आसान काम नहीं होता. इसके उदहारण के लिए हम समझ सकते हैं जैसे-पान सिंह तोमर. इस फिल्म में इरफान खान ने भारतीय एथलीट पान सिंह तोमर का रोल निभाया था. 60वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स में फिल्म को बेस्ट फीचर फिल्म का सम्मान मिला. साथ ही इसी फिल्म के लिए इरफान खान को बेस्ट एक्टर के पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
हालांकि, फिल्म में सिर्फ किरदार की पहचान ही अहम नहीं थी. फिल्म की कहानी एक ऐसे व्यक्ति की थी, जो एथलेटिक्स में देश का प्रतिनिधित्व करने से लेकर परिस्थितियों के चलते बागी बनने तक का सफर तय करता है. ऐसे में इस एक फिल्म में ही एक्टर के एक ही किरदार के कई अलग-अलग पड़ाव थे. इसमें किसी भी व्यक्ति की जिंदगी में मौजूद संघर्ष, सफलता, असफलता और बदलाव एक्टर को कई तरह के इमोशनल रंग दिखाने का मौका देते हैं. इस साल भी यही कनेक्शन एक बार फिर देखने को मिला है. 72वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स में 'चंदू चैंपियन' के लिए कार्तिक आर्यन को बेस्ट एक्टर का पुरस्कार मिला. फिल्म में उन्होंने मुरलीकांत पेटकर का किरदार निभाया था. जबकि 'स्वातंत्र्य वीर सावरकर' के लिए रणदीप हुड्डा को सर्वश्रेष्ठ डेब्यू डायरेक्टर का सम्मान मिला.
लेकिन, इसके साथ ही यह भी समझना बेहद जरूरी है कि नेशनल अवॉर्ड सिर्फ बायोपिक के लिए नहीं दिए जाते. 72वें पुरस्कारों में 'आर्टिकल 370', 'अमरन', 'कल्कि 2898 एडी', 'पुष्पा: द रूल पार्ट-2' और 'स्त्री 2' जैसी अलग-अलग तरह की फिल्मों को भी सम्मान मिला. ऐसे में पुरस्कारों का दायरा किसी एक जॉनर या फॉर्मूले तक सीमित नहीं है.
नेशनल अवॉर्ड में बायोपिक का ट्रेंड

अगर पिछले कुछ वर्षों के उदाहरणों पर नजर डालें तो रियल-लाइफ कहानियों का एक पैटर्न जरूर दिखाई देता है. 2016 के बाद से अब तक हिंदी सिनेमा के 8 एक्टर्स ने बेस्ट एक्टर का नेशनल अवॉर्ड जीता है. इनमें से 5 स्टार्स को यह सम्मान ऐसी फिल्मों के लिए मिला, जो किसी असल शख्सियत या वास्तविक घटना या उससे प्रेरित कहानी पर बेस्ड थीं. इस लिस्ट में अक्षय कुमार की 'रुस्तम', विक्की कौशल की 'उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक' अजय देवगन की 'तान्हाजी: द अनसंग वॉरियर', विक्रांत मैसी की '12th फेल' और हाल में कार्तिक आर्यन की 'चंदू चैंपियन' शामिल हैं. इनमें कुछ फिल्मों में वास्तविक घटनाओं के साथ कहानी को सिनेमाई रूप देने के लिए काल्पनिक हिस्से भी जोड़े गए थे.
लेकिन बायोपिक का दायरा सिर्फ स्टार के पुरस्कार तक सीमित नहीं रहता. कभी किसी फिल्म को उसकी कहानी, डायरेक्शन, स्क्रीनप्ले, सिनेमैटोग्राफी और पूरी प्रजेंटेशन के लिए भी सम्मान मिल सकता है. इसके लिए फिल्म 'चंदू चैंपियन' इस बात का उदाहरण है. फिल्म को नेशनल लेवल पर पहचान सिर्फ इसलिए नहीं मिली कि यह एक वास्तविक व्यक्ति की कहानी थी. 72वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स में बेस्ट एक्टर का सम्मान कार्तिक आर्यन को उनकी परफॉर्मेंस के लिए मिला. जबकि दूसरी ओर 'स्वातंत्र्य वीर सावरकर' के लिए रणदीप हुड्डा को बेस्ट डेब्यू फिल्म ऑफ ए डायरेक्टर का सम्मान दिया गया. इसका मतलब यह है कि रियल-लाइफ कहानी अलग-अलग सिनेमाई विभागों में कलाकारों और फिल्ममेकर्स को काम करने का मौका देती है.
'रियल कैरेक्टर’ एक्टर्स को क्यों आकर्षित करते हैं?
किसी एक्टर-एक्ट्रेस के लिए रियल-लाइफ किरदार निभाना एक तरह से दोहरी जिम्मेदारी जैसा होता है. एक तरफ उसे कहानी के हिसाब से एक्टिंग करनी होती है. वहीं, दूसरी ओर ऑडियंस की उस व्यक्ति के बारे में पहले से बनी धारणा को भी ध्यान में रखना पड़ता है. ऐसे में समझ लीजिए, कोई स्टार अभिनेता किसी ऐसे खिलाड़ी का किरदार निभा रहा है, जिसे देश पहले से जानता है. ऑडियंस जिसकी तस्वीरें देख चुके हैं. उसका इंटरव्यू सुन चुके हैं. ऐसे में एक्टर की छोटी-सी गलती भी दर्शक को नजर आ सकती है. ऐसे में रियल कैरेक्टर की तैयारी सिर्फ डायलॉग तक सीमित नहीं रहती. एक्टर को उस व्यक्ति के बोलने के तरीके, बॉडी लैंग्वेज, हावभाव और व्यवहार को भी समझना पड़ता है.
इतना ही नहीं, कई बार तो शारीरिक बदलाव भी जरूरी हो जाते हैं. इसके लिए कलाकार का वजन बढ़ाना या घटाना, हेयरस्टाइल बदलना, मेकअप और कॉस्ट्यूम के जरिए लुक तैयार करना. साथ ही इमोशनल लेवल पर भी उतना ही काम करना पड़ता है. असल व्यक्ति की जिंदगी में कौन-सा मोड़ उसके लिए सबसे अहम् था, वह किन परिस्थितियों से गुजरा और उसके फैसलों के पीछे क्या कहानी थी. इन सब चीजों को समझना एक्टर के प्रदर्शन को प्रभावित करता है.
बायोपिक का 'अवॉर्ड अपील' फैक्टर

बायोपिक की सबसे बड़ी खासियत उसका मजबूत बैकग्राउंड हो सकता है. किसी व्यक्ति की जिंदगी में अगर संघर्ष, सफलता या कोई ऐतिहासिक घटना जुड़ी है तो फिल्म के पास पहले से एक मजबूत नैरेटिव होता है. एक बायोपिक में अभिनेता को अक्सर किरदार के कई पड़ाव दिखाने पड़ते हैं. शुरुआत में वही व्यक्ति अलग हो सकता है और जीवन के किसी बड़े मोड़ के बाद उसका व्यक्तित्व पूरी तरह बदल सकता है. यह बदलाव अभिनेता के लिए अपनी रेंज दिखाने का अवसर बनता है.
'पान सिंह तोमर' में भी इरफान खान के किरदार के कई अलग-अलग पहलू सामने आते हैं. एक एथलीट से लेकर जीवन की परिस्थितियों से प्रभावित व्यक्ति तक का सफर फिल्म को सिर्फ एक स्पोर्ट्स स्टोरी नहीं रहने देता. इसी फिल्म के लिए इरफान खान को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. इसी तरह 'चंदू चैंपियन' में मुरलीकांत पेटकर की जिंदगी को पर्दे पर उतारने के लिए कार्तिक आर्यन ने अपने किरदार के शारीरिक और भावनात्मक पक्ष पर काम किया. 72वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स में उन्हें इसी फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का सम्मान मिला. ऐसी भूमिकाओं में ट्रांसफॉर्मेशन दिखाई देता है, लेकिन अवॉर्ड का आधार सिर्फ ट्रांसफॉर्मेशन नहीं हो सकता. किसी अभिनेता का वजन बदलना या किसी प्रसिद्ध व्यक्ति जैसा दिखना चर्चा पैदा कर सकता है, लेकिन अंत में सवाल यह रहता है कि वह किरदार पर्दे पर कितना विश्वसनीय और प्रभावशाली बना.
सिर्फ बायोपिक नहीं, परफॉर्मेंस भी अहम
अगर सिर्फ रियल-लाइफ किरदार निभाना ही नेशनल अवॉर्ड जीतने का फॉर्मूला होता, तो हर बायोपिक को पुरस्कार मिलता. ऐसा नहीं है. नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स अलग-अलग भाषाओं और तरह की फिल्मों को सम्मान देते हैं. 72वें पुरस्कारों में भी सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म 'आर्टिकल 370' रही, जबकि बेस्ट निर्देशन का पुरस्कार तमिल फिल्म 'अमरन' के लिए राजकुमार पेरियासामी को मिला. बेस्ट एक्टर का सम्मान 'ब्रह्मयुगम' के लिए ममूटी और 'चंदू चैंपियन' के लिए कार्तिक आर्यन को शेयर रूप से दिया गया. एक्टर के सामने असली चुनौती यह है कि वह वास्तविक व्यक्ति को केवल कॉपी न करे, बल्कि उसके व्यक्तित्व को समझकर पर्दे पर जीवंत करे. आवाज की नकल और अभिनय में फर्क है. चेहरे की समानता और किरदार की आत्मा पकड़ने में भी फर्क है.
ऐसे में किसी बायोपिक की चर्चा करते समय केवल यह देखना काफी नहीं कि एक्टर ने किसका किरदार निभाया. यह देखना भी जरूरी है कि कहानी को किस तरह लिखा गया, निर्देशक ने उसे किस नजरिए से पेश किया और एक्टर ने उस भूमिका को किस लेवल तक निभाया.
बॉलीवुड के कुछ बड़े उदाहरण

बॉलीवुड की बायोपिक फिल्मों की सूची लंबी है और इनमें पुरस्कारों से जुड़े कई उल्लेखनीय उदाहरण मिलते हैं.
'पान सिंह तोमर' में इरफान खान ने वास्तविक एथलीट पान सिंह तोमर का किरदार निभाया और फिल्म ने सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का सम्मान हासिल किया. इरफान खान को इसी फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता चुना गया.
'चंदू चैंपियन' में कार्तिक आर्यन ने मुरलीकांत पेटकर की भूमिका निभाई और 72वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार जीता.
'गंगूबाई काठियावाड़ी' में आलिया भट्ट ने गंगूबाई का किरदार निभाया और 69वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का सम्मान हासिल किया. इस श्रेणी में वह कृति सेनन के साथ संयुक्त विजेता थीं.
'श्रीकांत' में राजकुमार राव ने दृष्टिबाधित उद्योगपति श्रीकांत बोल्ला की जिंदगी से प्रेरित किरदार निभाया. फिल्म को 72वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स में सर्वश्रेष्ठ हिंदी फीचर फिल्म चुना गया.
'स्वातंत्र्य वीर सावरकर' में रणदीप हुड्डा ने विनायक दामोदर सावरकर का किरदार निभाया. इसी फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ डेब्यू फिल्म ऑफ ए डायरेक्टर का सम्मान मिला.
इन्हें एक साथ देखने पर यह लगता है कि असल कहानियां और किरदार नेशनल अवॉर्ड्स की चर्चा में कई बार दिखाई देते हैं. लेकिन इससे यह नतीजा नहीं निकलता कि बायोपिक अपने आप पुरस्कार जीतने की गारंटी बन गई है.
बायोपिक बनाम फिक्शनल किरदार
बायोपिक और फिक्शनल किरदारों के बीच सबसे बड़ा अंतर यही है कि एक में अभिनेता के पास वास्तविक संदर्भ मौजूद होता है और दूसरे में उसे काफी कुछ खुद गढ़ना पड़ता है. बायोपिक में अभिनेता के सामने वास्तविक व्यक्ति की तस्वीर, वीडियो, इंटरव्यू या सार्वजनिक छवि हो सकती है. वह व्यक्ति परिवार, दोस्तों और प्रशंसकों की यादों में भी मौजूद हो सकता है. इसलिए अभिनेता के प्रदर्शन की तुलना किसी न किसी स्तर पर वास्तविक व्यक्ति से होना स्वाभाविक है.
फिक्शनल किरदार में यह दबाव अलग तरह का होता है. वहां अभिनेता के सामने कोई वास्तविक व्यक्ति नहीं होता, जिसकी चाल या आवाज से उसकी तुलना की जाए. किरदार का व्यक्तित्व, व्यवहार, रिश्ते और उसकी दुनिया अभिनेता और निर्देशक मिलकर तैयार करते हैं.
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि फिक्शनल किरदार आसान होते हैं. कई काल्पनिक किरदार भी बेहद जटिल हो सकते हैं. अभिनेता को बिना किसी वास्तविक मॉडल के एक ऐसा व्यक्तित्व तैयार करना पड़ता है, जिसे दर्शक पहली बार देखकर स्वीकार कर सके. इसलिए बायोपिक को अवॉर्ड का आसान रास्ता मानना सही नहीं होगा. दोनों तरह के किरदारों की चुनौती अलग है.
आज के दौर में बायोपिक क्यों बढ़ रही हैं?
बायोपिक फिल्मों के बढ़ने के पीछे सिर्फ अवॉर्ड की दौड़ को वजह मानना बहुत सरल निष्कर्ष होगा. इसके पीछे दर्शकों की बदलती दिलचस्पी और फिल्म इंडस्ट्री की व्यावसायिक सोच भी काम करती है. किसी मशहूर व्यक्ति की जिंदगी पर फिल्म बनने की खबर अपने आप जिज्ञासा पैदा करती है. दर्शक जानना चाहता है कि फिल्म में उस व्यक्ति की जिंदगी का कौन-सा हिस्सा दिखाया जाएगा और फिल्ममेकर उसे किस नजरिए से पेश करेगा. मसलन, किसी खिलाड़ी पर फिल्म बनती है तो उसके प्रशंसकों का एक आधार पहले से मौजूद होता है. किसी ऐतिहासिक शख्सियत पर फिल्म बनती है तो उससे जुड़ी जानकारी और बहस पहले से लोगों के बीच मौजूद हो सकती है.
इसका फायदा मार्केटिंग में भी मिलता है. फिल्म के पास प्रचार के लिए एक पहचान योग्य चेहरा या कहानी होती है. हालांकि यह दर्शकों को सिनेमाघर तक लाने की गारंटी नहीं है. फिल्ममेकर्स के लिए भी वास्तविक जीवन की कहानी एक शुरुआती ढांचा देती है. लेकिन उसे पटकथा में बदलना उतना ही मुश्किल काम है. वास्तविक जिंदगी रैखिक नहीं होती. उसमें कई ऐसे हिस्से होते हैं जिन्हें फिल्म की अवधि और कहानी के हिसाब से हटाना या बदलना पड़ सकता है.
यहीं से बायोपिक पर एक और सवाल खड़ा होता है. वास्तविक कहानी को सिनेमाई कहानी बनाते समय कितनी रचनात्मक स्वतंत्रता ली जाए? यह सवाल सिर्फ मनोरंजन का नहीं, जिम्मेदारी का भी है. जब किसी वास्तविक व्यक्ति की जिंदगी पर्दे पर दिखाई जाती है तो फिल्ममेकर के सामने तथ्य और सिनेमाई प्रस्तुति के बीच संतुलन बनाने की चुनौती होती है.
क्या ट्रांसफॉर्मेशन ही अवॉर्ड की चाबी है?
बायोपिक की चर्चा में अक्सर अभिनेता के ट्रांसफॉर्मेशन को सबसे ज्यादा जगह मिलती है. वजन बदलना, लुक बदलना, हेयरस्टाइल बदलना या किसी वास्तविक व्यक्ति जैसा दिखना निश्चित रूप से चर्चा पैदा कर सकता है. लेकिन अभिनय सिर्फ बाहरी बदलाव का नाम नहीं है.
किसी अभिनेता ने वास्तविक व्यक्ति का लुक कितनी अच्छी तरह पकड़ा, यह एक पहलू है. उससे बड़ा सवाल यह है कि उसने उस व्यक्ति के डर, संघर्ष, महत्वाकांक्षा, कमजोरी और रिश्तों को कितनी विश्वसनीयता से निभाया. कभी-कभी मामूली दिखने वाला बदलाव भी अभिनय में बड़ा फर्क पैदा कर देता है. आवाज का उतार-चढ़ाव, किसी खास परिस्थिति में प्रतिक्रिया, आंखों का इस्तेमाल या चुप्पी का सही समय किरदार को अलग पहचान दे सकता है. यही वह जगह है जहां बायोपिक अभिनेता को चुनौती देती है. वह व्यक्ति जिसे अभिनेता पर्दे पर निभा रहा है, पहले से मौजूद है. लेकिन दर्शक को यह महसूस कराना कि वही व्यक्ति उनके सामने दोबारा जीवित हो गया है, अभिनेता की असली परीक्षा है.
'सेफ बेट' या सिर्फ एक ट्रेंड?
अगर 'सेफ बेट' से मतलब ऐसी भूमिका से है जिसमें अभिनेता को अपनी अभिनय क्षमता दिखाने के लिए बड़ा स्पेस मिलता है, तो बायोपिक निश्चित रूप से एक मजबूत अवसर देती है. वास्तविक व्यक्ति की जिंदगी में मौजूद संघर्ष, बदलाव और भावनात्मक परतें कलाकार को कई स्तरों पर काम करने का मौका देती हैं.
लेकिन अगर इसका मतलब यह है कि किसी असली व्यक्ति का किरदार निभाने से नेशनल अवॉर्ड की संभावना अपने आप बढ़ जाती है, तो ऐसा निष्कर्ष सही नहीं होगा. नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स के उदाहरण बताते हैं कि सम्मान अलग-अलग तरह की फिल्मों और परफॉर्मेंस को मिलता है. 72वें पुरस्कारों में जहां ‘चंदू चैंपियन’ के लिए कार्तिक आर्यन को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का सम्मान मिला, वहीं ‘ब्रह्मयुगम’ के लिए ममूटी भी उसी श्रेणी में विजेता रहे. सर्वश्रेष्ठ फिल्म ‘आर्टिकल 370’ रही और निर्देशन का पुरस्कार ‘अमरन’ को मिला. यानी एक ही समारोह में अलग-अलग तरह की सिनेमाई कोशिशों को पहचान मिली.
इसलिए बायोपिक को एक फॉर्मूला कहना शायद जल्दबाजी होगी. हां, यह जरूर कहा जा सकता है कि रियल-लाइफ किरदार एक्टर्स को ऐसी भूमिकाएं देते हैं, जिनमें अभिनय का दायरा बड़ा होता है. असली शख्सियत को पर्दे पर उतारना अपने आप में चुनौती है. लेकिन उस चुनौती को यादगार प्रदर्शन में बदलना अभिनेता का काम है. कहानी को प्रभावशाली सिनेमा में बदलना निर्देशक और पूरी टीम की जिम्मेदारी है. और शायद यही वजह है कि बायोपिक का असली आकर्षण सिर्फ इस बात में नहीं है कि कहानी किसी वास्तविक व्यक्ति की है. असली सवाल यह है कि उस जिंदगी को पर्दे पर किस तरह दोबारा जिया गया. नेशनल अवॉर्ड की कहानी भी यहीं से शुरू होती है. नाम जाना-पहचाना हो सकता है, कहानी पहले से मौजूद हो सकती है और किरदार वास्तविक हो सकता है, लेकिन आखिर में पर्दे पर दिखाई देने वाली परफॉर्मेंस और फिल्म की पूरी प्रस्तुति ही तय करती है कि वह कहानी दर्शकों और जूरी पर कितना असर छोड़ती है.
पिछले 10 साल में नेशनल अवॉर्ड जीतने वाले दूसरे हिंदी कलाकारों में आयुष्मान खुराना की ‘अंधाधुन’, मनोज बाजपेयी की ‘भोंसले’ और शाहरुख खान की ‘जवान’ शामिल हैं. इन फिल्मों के किरदार किसी वास्तविक व्यक्ति की सीधी कहानी पर आधारित नहीं थे. अगर नेशनल अवॉर्ड के पिछले कुछ दशकों के विजेताओं पर नजर डालें, तो एक बदलाव साफ दिखाई देता है. पहले ऐसे कई कलाकारों को सम्मान मिला, जिन्होंने पूरी तरह काल्पनिक किरदारों को अपनी दमदार अदाकारी से यादगार बनाया. वहीं हाल के वर्षों में असली शख्सियतों, वास्तविक घटनाओं या उनसे प्रेरित कहानियों पर बनी फिल्मों का हिस्सा बढ़ता नजर आया है. इन भूमिकाओं में एक्टर्स को किरदार के लुक, बोलचाल, बॉडी लैंग्वेज और व्यक्तित्व में भी काफी बदलाव करना पड़ा. यही ट्रांसफॉर्मेशन उन्हें एक अलग तरह की अभिनय चुनौती देता है.
हालांकि अजय देवगन, इरफ़ान खान और राजकुमार राव (कुछ नाम लें तो) जैसे एक्टर्स ने पहले 'द लेजेंड ऑफ़ भगत सिंह', 'पान सिंह तोमर' और 'शाहिद' जैसी फ़िल्मों के लिए अवॉर्ड जीते हैं, लेकिन उस समय हिंदी फ़िल्मों के विजेताओं की फ़िल्में अलग-अलग जॉनर की होती थीं. अमिताभ बच्चन जैसे एक्टर्स ने 'अग्निपथ', 'ब्लैक', 'पा' और 'पीकू' के लिए अवॉर्ड जीते हैं. शशि कपूर ने 'न्यू दिल्ली टाइम्स' के लिए, अनिल कपूर ने 'पुकार' के लिए और सैफ अली खान ने 'हम तुम' के लिए अवॉर्ड जीता.
वहीं, 2016 के बाद से ऐसे परफॉर्मेंस की तरफ झुकाव साफ देखा जा सकता है जिनमें एक्टर का लुक या अंदाज़ पूरी तरह बदल जाता है. वज़न घटाने और बोली-भाषा की ट्रेनिंग से लेकर प्रोस्थेटिक्स के भारी इस्तेमाल तक, बायोपिक और असल ज़िंदगी के ऐतिहासिक किरदारों पर आधारित फ़िल्में बॉलीवुड के लिए 'रजत कमल' (नेशनल अवॉर्ड) पाने का सबसे भरोसेमंद शॉर्टकट बन गई हैं.
'असली' की तरफ यह बदलाव क्यों?
शायद जब कोई एक्टर किसी काल्पनिक किरदार को निभाता है, तो 30 से ज़्यादा भाषाओं को परखने वाली जूरी के लिए अच्छी एक्टिंग का पैमाना अलग-अलग हो सकता है. लेकिन, जब कोई एक्टर किसी असली इंसान का किरदार निभाता है-जैसे कार्तिक आर्यन ने मुरलीकांत पेटकर का या विक्रांत मैसी ने IPS मनोज शर्मा का किरदार निभाया, तो जूरी के पास तुलना करने के लिए पहले से ही एक आधार होता है.
परफ़ॉर्मेंस को असल ज़िंदगी की आवाज़ की रिकॉर्डिंग, ऐतिहासिक तस्वीरों और ज़िंदगी की दर्ज घटनाओं के आधार पर परखा जा सकता है. फ़ेस्टिवल स्क्रीनिंग और जूरी की चर्चाओं के दौरान, फ़िज़िकल ट्रांसफ़ॉर्मेशन (रूप-रंग में बदलाव) से फ़िल्म के प्रमोशन के लिए भी एक आसान कहानी मिल जाती है.
एक और वजह यह हो सकती है कि बॉलीवुड की बड़ी फ़िल्मों को अक्सर बहुत ज़्यादा कमर्शियल या बहुत ज़्यादा ग्लैमरस माना जाता है, जब तक कि उस प्रोजेक्ट में कोई ऐतिहासिक या प्रेरणादायक पहलू न जुड़ा हो. बायोपिक करने से एक्टर को बॉलीवुड के चकाचौंध से दूर हटने का मौका मिलता है. भले ही फ़िल्म बड़े बजट की हो और वे अपनी शारीरिक कमज़ोरी या सादगी को भी दिखा पाते हैं.
हिंदी बनाम क्षेत्रीय सिनेमा

दिलचस्प बात यह है कि असल ज़िंदगी पर आधारित फ़िल्मों (बायोपिक्स) पर यह निर्भरता हिंदी सिनेमा और क्षेत्रीय फ़िल्म इंडस्ट्री के बीच एक बुनियादी फ़र्क को दिखाती है. क्षेत्रीय सिनेमा के बड़े कलाकार अक्सर पूरी तरह से काल्पनिक किरदारों के लिए 'बेस्ट एक्टर' का अवॉर्ड जीतते हैं.
उदाहरण के लिए, 2016 के बाद से ममूटी ने 'ब्रमायुगम' में काल्पनिक किरदार के लिए, अल्लू अर्जुन ने 'पुष्पा: द राइज़' में मजदूर से स्मगलर बने व्यक्ति के किरदार के लिए और धनुष ने 'असुरन' में मजदूर वर्ग के एक काल्पनिक मुख्य किरदार के लिए अवॉर्ड जीता है.
पिछले 10 सालों में यह बदलाव साफ दिखता है. जब तक कमर्शियल हिंदी फ़िल्मों की स्क्रिप्ट्स में बड़े स्टार्स को ही ज़्यादा अहमियत दी जाती रहेगी. तब तक असल ज़िंदगी के हीरो की कहानी ही बॉलीवुड के लिए तारीफ पाने का सबसे भरोसेमंद जरिया बनी रहेगी.