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झुग्गी से पहाड़ तक, बिना सरकारी मदद बच्चों को पढ़ा रहे ‘अनाम नायक’, इनकी छोटी-सी पहल बदल रही कई जिंदगियां

देश के कई हिस्सों में ऐसे लोग हैं जो बिना किसी सरकारी सहायता के गरीब और वंचित बच्चों को पढ़ा रहे हैं. जानिए इन अनाम शिक्षकों की पहल, शिक्षा की जमीनी चुनौतियां और आंकड़े क्या बताते हैं.

Written By Shivam Tiwari
Published: Sep 04, 2026, 07:57 PM IST | Updated: Sep 04, 2026, 08:00 PM IST
Image Credit: क्या हर बच्चे तक स्कूल की पहुंच बनी है?
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भारत में स्कूलों में बच्चों का नामांकन काफी बढ़ा है, लेकिन हर बच्चे को समान सीखने का अवसर मिलना अभी भी बड़ी चुनौती है. इसी खाली जगह को कई जगह स्थानीय लोग, युवा, सेवानिवृत्त शिक्षक और सामाजिक कार्यकर्ता अपनी छोटी-छोटी पहलों से भरने की कोशिश कर रहे हैं. कोई झुग्गी बस्ती में शाम को बच्चों को पढ़ाता है तो कोई दूर-दराज के गांव में अपने घर या सामुदायिक स्थान पर कक्षा लगाता है.

इनमें से कई लोगों का नाम किसी बड़े पुरस्कार या सरकारी सूची में नहीं मिलता. फिर भी उनके लिए बच्चों को पढ़ाना रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है.

आंकड़े शिक्षा की क्या तस्वीर दिखाते हैं?

प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन के एएसईआर 2024 सर्वे में ग्रामीण भारत के 605 जिलों के 17,997 गांवों के करीब 6.49 लाख बच्चों को शामिल किया गया. सर्वे में बच्चों के नामांकन के साथ पढ़ने और गणित की बुनियादी क्षमता को भी देखा गया.

रिपोर्ट के मुताबिक सरकारी स्कूलों में कक्षा 3 के उन बच्चों की हिस्सेदारी, जो कक्षा 2 के स्तर का पाठ पढ़ सकते थे, 2022 के 16.3 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 23.4 प्रतिशत हुई. कक्षा 5 में भी यह आंकड़ा 2024 में 48.8 प्रतिशत पहुंचा. यानी सुधार हुआ है, लेकिन बुनियादी सीखने की चुनौती अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है.

इन ‘अनाम नायकों’ की जरूरत क्यों पड़ती है?

किसी गरीब परिवार के बच्चे के लिए स्कूल जाना और घर पर पढ़ाई के लिए समय, जगह या मदद मिलना दो अलग बातें हो सकती हैं. कई बच्चों के घर में पढ़ाने वाला कोई नहीं होता. कुछ परिवारों में माता-पिता खुद पढ़े-लिखे नहीं होते, जबकि कुछ बच्चों को घर के काम या दूसरे कारणों से पढ़ाई के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता.

यहीं स्थानीय स्तर पर चलने वाली छोटी कक्षाएं महत्वपूर्ण बन सकती हैं. शिक्षक या स्वयंसेवक बच्चे के सीखने के स्तर के हिसाब से उसे दोबारा पढ़ाते हैं और कई बार स्कूल की पढ़ाई के साथ अतिरिक्त अभ्यास भी कराते हैं.

क्या गांवों में स्वयंसेवक बड़ी भूमिका निभा सकते हैं?

ग्रामीण शिक्षा में स्थानीय समुदाय की भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बाहर से आने वाली मदद हर जगह नियमित रूप से पहुंच पाना आसान नहीं होता. एएसईआर की प्रक्रिया में भी स्थानीय संस्थाओं, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों और स्वयंसेवकों की भागीदारी होती है. 2024 में करीब 215 जिलों में जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों के विद्यार्थियों ने भी सर्वे में भाग लिया.

यह दिखाता है कि शिक्षा से जुड़े काम में स्थानीय लोगों की भागीदारी केवल सहायता तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीनी स्थिति को समझने में भी उनकी भूमिका हो सकती है.

क्या सिर्फ बच्चों को पढ़ाना काफी है?

इन पहलों की असली ताकत केवल किताब पढ़ाने में नहीं है. कई जगह ऐसे स्वयंसेवक बच्चों को नियमित पढ़ाई की आदत, सवाल पूछने का आत्मविश्वास और आगे पढ़ने की प्रेरणा देने का काम भी करते हैं.

लेकिन विशेषज्ञ दृष्टि से यह भी जरूरी है कि ऐसी सामुदायिक पहल सरकारी स्कूल और औपचारिक शिक्षा व्यवस्था की जगह न लें. इनका उद्देश्य उन बच्चों तक अतिरिक्त सहयोग पहुंचाना होना चाहिए, जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है.

सरकार की व्यवस्था में क्या बदलाव आया है?

केंद्र सरकार की यूडीआईएसई प्लस 2024-25 रिपोर्ट के अनुसार देश में पहली बार शिक्षकों की कुल संख्या एक करोड़ के पार पहुंची. रिपोर्ट में 2024-25 में कुल 1,01,22,420 शिक्षकों की जानकारी दी गई है. साथ ही विभिन्न स्तरों पर विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात में भी सुधार दर्ज किया गया.

नई शिक्षा नीति भी सिर्फ बच्चों के नामांकन पर नहीं, बल्कि उनकी उपस्थिति, सीखने के स्तर और स्कूल से बाहर होने के बाद दोबारा शिक्षा से जोड़ने की व्यवस्था पर जोर देती है.

क्या असली बदलाव स्थानीय स्तर से आ सकता है?

झुग्गी बस्ती की छोटी-सी कक्षा हो या पहाड़ के किसी गांव में घर के बाहर चलने वाला पढ़ाई केंद्र, ऐसी पहलें बताती हैं कि शिक्षा केवल स्कूल की चारदीवारी तक सीमित नहीं है. लेकिन इन कहानियों को सामने लाते समय यह देखना जरूरी है कि बच्चों को वास्तव में क्या फायदा मिला, कितने बच्चे नियमित पढ़ने लगे और उनके सीखने के स्तर में कितना बदलाव आया.

यही वजह है कि इस स्टोरी के लिए स्थानीय रिपोर्टर ऐसे वास्तविक लोगों की पहचान कर सकते हैं, जो लंबे समय से बिना नियमित सरकारी सहायता के गरीब बच्चों को पढ़ा रहे हैं. उनकी कहानी के साथ बच्चों की संख्या, पढ़ाई की जगह, कितने साल से पहल चल रही है और बच्चों के सीखने में आया बदलाव जैसे प्रमाण जुटाए जा सकते हैं.

क्या इन अनाम शिक्षकों की कहानी सामने आनी चाहिए?

भारत की शिक्षा व्यवस्था के बड़े आंकड़ों के पीछे ऐसी हजारों छोटी कहानियां छिपी हो सकती हैं. एएसईआर 2024 जैसे सर्वे बताते हैं कि ग्रामीण भारत में नामांकन और सीखने के स्तर दोनों पर लगातार काम की जरूरत है.

ऐसे में बिना प्रचार के बच्चों को पढ़ाने वाले स्थानीय शिक्षक और स्वयंसेवक केवल “मददगार” नहीं, बल्कि शिक्षा की जमीनी तस्वीर समझने के महत्वपूर्ण पात्र भी हैं. उनकी कहानियां यह सवाल सामने लाती हैं कि अगर एक व्यक्ति अपने स्तर पर कुछ बच्चों की पढ़ाई बदल सकता है, तो सही संसाधन और व्यवस्था मिलने पर यही प्रयास कितने बड़े स्तर पर असर डाल सकता है?

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About the Author

शिवम तिवारी, जी न्यूज में डिजिटल कंटेंट राइटर हैं और पत्रकारिता में करीब 2 साल से अधिक का अनुभव रखते हैं. यूपी के प्रयागराज के रहने वाले शिवम ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन किया है. खबरों की नब्ज पकड़कर उन्हें आसान और साफ भाषा में पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं. शिवम शिक्षा और रोजगार से जुड़े विषयों पर खास फोकस रखते हैं. इनमें स्कूल-कॉलेज एडमिशन, बोर्ड परीक्षाएं, प्रवेश परीक्षाएं, सरकारी नौकरियां, रिजल्ट, कॉम्पिटिटिव एग्जाम, करियर टिप्स, करेंट अफेयर्स और जनरल नॉलेज जैसे टॉपिक्स शामिल हैं.इसके अलावा शिवम, टीचर्स, प्रोफेसर्स, एक्सपर्ट्स और करियर काउंसलर्स की सलाह के आधार पर कंटेंट तैयार करते हैं. ये IIT-JEE, NEET, GATE, CLAT और CUET जैसे नेशनल लेवल एंट्रेंस एग्जाम से जुड़े विषयों पर गहराई से काम करते हैं और छात्रों के लिए उपयोगी जानकारी उपलब्ध कराते हैं. शिवम तिवारीर से संपर्क करने के लिए आप उन्हें shivam.tiwari@india.com पर ईमेल कर सकते हैं.
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