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पिता मजदूर, मां संभालती हैं घर; NEET पास कर 5 बच्चों ने देखा डॉक्टर बनने का सपना

ओडिशा के कंधमाल के एक आदिवासी परिवार के पांच बच्चे NEET पास कर MBBS की पढ़ाई कर रहे हैं. परिवार की गरीबी और संघर्ष के बीच बच्चों ने डॉक्टर बनने का सपना पूरा किया.

Written By Shivam Tiwari
Published: Sep 15, 2026, 01:43 PM IST | Updated: Sep 15, 2026, 01:50 PM IST
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ओडिशा के कंधमाल जिले के एक बेहद साधारण परिवार की कहानी इन दिनों चर्चा में है. परिवार के पांच बच्चे मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं. इनमें दो बहनें और उनका एक चचेरा भाई भी शामिल है, जिन्होंने NEET परीक्षा पास कर राज्य के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में दाखिला हासिल किया है.

आर्थिक तंगी के बावजूद परिवार ने बच्चों की पढ़ाई को हमेशा प्राथमिकता दी. खेती और मजदूरी से परिवार चलाने वाले माता-पिता ने बच्चों की शिक्षा के लिए अपनी पूरी क्षमता लगा दी.

परिवार में डॉक्टर बनने की शुरुआत कैसे हुई?

देरिंगबाड़ी इलाके के सिकाबाड़ी गांव निवासी 25 वर्षीय बिभीषण नायक परिवार में NEET पास करने वाले पहले बच्चे थे. उनके पिता ब्रुशी नायक की उम्र 76 वर्ष है, जबकि मां अनुसया 62 वर्ष की हैं. बिभीषण ने NEET में सफलता हासिल करने के बाद कोरापुट स्थित शहीद लक्ष्मण नायक मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया. फिलहाल वह इसी संस्थान में इंटर्नशिप कर रहे हैं.

अब कितने बच्चे MBBS कर रहे हैं?

बिभीषण की सफलता के बाद उनकी बहन मोनालिसा प्रधान ने भी NEET पास किया. 23 वर्षीय मोनालिसा इसी मेडिकल कॉलेज में MBBS के दूसरे वर्ष की छात्रा हैं. इसके बाद परिवार की सुनेमी, अश्रिया और मीनाक्षी ने भी मेडिकल प्रवेश परीक्षा पास कर ली. सुनेमी, 20 वर्ष, अश्रिया, 18 वर्ष और मीनाक्षी, 19 वर्ष, ओडिशा के पुरी, बोलांगीर और भवानीपटना स्थित सरकारी मेडिकल कॉलेजों में MBBS की पढ़ाई कर रही हैं.

मीनाक्षी इस परिवार से कैसे जुड़ी हैं?

मीनाक्षी ब्रुशी नायक के छोटे भाई जिशिया प्रधान की बेटी हैं. हालांकि बचपन से ही ब्रुशी और अनुसया ने मीनाक्षी की परवरिश अपने बच्चों की तरह की. अनुसया कहती हैं कि उनके लिए परिवार के सभी बच्चे बराबर हैं. उनके परिवार में कुल नौ सदस्य हैं और उनके दो छोटे बेटे अभी स्कूल में पढ़ रहे हैं.

बच्चों ने पढ़ाई कहां से की?

परिवार के सभी बच्चों ने अपनी शुरुआती पढ़ाई देरिंगबाड़ी में की. इसके बाद उन्होंने नयागढ़ में इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी की. सीमित आर्थिक संसाधनों के बावजूद बच्चों ने पढ़ाई जारी रखी और मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी की. परिवार के लिए यह आसान सफर नहीं था, लेकिन बच्चों ने अपनी परिस्थितियों को पढ़ाई के रास्ते में बाधा नहीं बनने दिया.

NEET की तैयारी में किसने मदद की?

बिभीषण ने अपनी छोटी बहन मोनालिसा की NEET तैयारी में मदद की. उनके मुताबिक, बहन की सफलता ने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया. इसके बाद उन्होंने परिवार के बाकी तीन बच्चों को भी कुछ समय के लिए कोचिंग के लिए बरहामपुर ले जाने की व्यवस्था की. उन्होंने खुद भी स्थानीय बच्चों को पढ़ाकर अपनी पढ़ाई और परिवार की मदद करने की कोशिश की.

पढ़ाई का खर्च कैसे जुटाया?

परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है. बिभीषण के अनुसार, पिता जितना संभव हो सके उतना पैसा देते थे और बाकी जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्होंने बच्चों को पढ़ाया. बच्चों की शिक्षा के लिए करीब 6 लाख रुपये का कर्ज भी लिया गया है. मेडिकल शिक्षा में फीस के अलावा किताबों, रहने और अन्य जरूरी सामान का खर्च भी परिवार पर अतिरिक्त बोझ डाल रहा है.

माता-पिता का संघर्ष बच्चों की प्रेरणा कैसे बना?

मीनाक्षी के मुताबिक, उन्होंने अपने माता-पिता को लगातार संघर्ष करते देखा है. कई बार परिवार को खाने तक की परेशानी का सामना करना पड़ा, लेकिन बच्चों ने पढ़ाई से समझौता नहीं किया. उनके लिए माता-पिता का संघर्ष सबसे बड़ी प्रेरणा रहा. बच्चों ने कम साधनों में रहकर पढ़ाई जारी रखी और बेहतर प्रदर्शन करने की कोशिश की.

पिता खेती और मजदूरी से घर चलाते हैं?

ब्रुशी नायक ने खुद केवल दूसरी कक्षा तक पढ़ाई की है. इसके बावजूद उन्होंने शिक्षा की अहमियत को समझा और बच्चों की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने देने की कोशिश की. परिवार की छोटी-सी जमीन पर वह धान, अदरक और हल्दी की खेती करते हैं. जरूरत पड़ने पर वह दूसरे राज्यों में मजदूरी करने भी जाते हैं, ताकि बच्चों की पढ़ाई का खर्च जुटाया जा सके.

अब परिवार को किस मदद की जरूरत है?

परिवार गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों के लिए उपलब्ध सरकारी योजनाओं का लाभार्थी भी है. लेकिन पांच बच्चों की मेडिकल शिक्षा का खर्च लगातार बढ़ रहा है. ब्रुशी के मुताबिक, बच्चों की किताबों और पढ़ाई से जुड़ी दूसरी जरूरतों के लिए और पैसों की आवश्यकता है. उन्होंने कहा कि मेडिकल शिक्षा महंगी है और बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाना उनके लिए लगातार मुश्किल होता जा रहा है.

मां की भूमिका क्या रही?

अनुसया खुद औपचारिक शिक्षा हासिल नहीं कर सकीं. वह बच्चों के मेडिकल विषयों को भले ही न समझ पाती हों, लेकिन वह जानती हैं कि शिक्षा उनके परिवार की जिंदगी बदल सकती है. उनका कहना है कि परिवार के लिए खाना बनाना और बच्चों को अनुशासन में रखना उनकी जिम्मेदारी है. बच्चों की सफलता में परिवार का यह सहयोग भी महत्वपूर्ण रहा है.

बच्चे अपनी गरीबी को कैसे देखते हैं?

सुनेमी बताती हैं कि भाई-बहनों को बचपन में ही परिवार की आर्थिक स्थिति का अंदाजा हो गया था. इसलिए वे अपनी जरूरतों को सीमित रखने की कोशिश करते रहे. अश्रिया के मुताबिक, उन्होंने अपने पिता को आर्थिक परेशानियों को लेकर चिंतित देखा है. इसी वजह से बच्चे पढ़ाई में बेहतर प्रदर्शन कर परिवार की स्थिति बदलने की कोशिश करते हैं.

परिवार को सरकार से क्या उम्मीद है?

ब्रुशी के भाई जिशिया प्रधान ने राज्य सरकार से परिवार की आर्थिक मदद करने की अपील की है. उनका कहना है कि परिवार के बच्चे भविष्य में अपने क्षेत्र के लोगों की सेवा डॉक्टर के रूप में करना चाहते हैं. गांव के लोगों को भी बच्चों की उपलब्धि पर गर्व है. फिलहाल ये पांचों बच्चे अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए अपने गांव और परिवार से जुड़े हुए हैं. वे समय मिलने पर खेती और परिवार के मवेशियों की देखभाल में भी मदद करते हैं.

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शिवम तिवारी, जी न्यूज में डिजिटल कंटेंट राइटर हैं और पत्रकारिता में करीब 2 साल से अधिक का अनुभव रखते हैं. यूपी के प्रयागराज के रहने वाले शिवम ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन किया है. खबरों की नब्ज पकड़कर उन्हें आसान और साफ भाषा में पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं. शिवम शिक्षा और रोजगार से जुड़े विषयों पर खास फोकस रखते हैं. इनमें स्कूल-कॉलेज एडमिशन, बोर्ड परीक्षाएं, प्रवेश परीक्षाएं, सरकारी नौकरियां, रिजल्ट, कॉम्पिटिटिव एग्जाम, करियर टिप्स, करेंट अफेयर्स और जनरल नॉलेज जैसे टॉपिक्स शामिल हैं.इसके अलावा शिवम, टीचर्स, प्रोफेसर्स, एक्सपर्ट्स और करियर काउंसलर्स की सलाह के आधार पर कंटेंट तैयार करते हैं. ये IIT-JEE, NEET, GATE, CLAT और CUET जैसे नेशनल लेवल एंट्रेंस एग्जाम से जुड़े विषयों पर गहराई से काम करते हैं और छात्रों के लिए उपयोगी जानकारी उपलब्ध कराते हैं. शिवम तिवारीर से संपर्क करने के लिए आप उन्हें shivam.tiwari@india.com पर ईमेल कर सकते हैं.
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