डिग्री हाथ में, नौकरी की तलाश जारी, भारत के युवाओं की पढ़ाई और रोजगार के बीच कितना बड़ा गैप?
भारत में उच्च शिक्षा लेने वाले छात्रों की संख्या 4.50 करोड़ तक पहुंच गई है, लेकिन बड़ी संख्या में ग्रेजुएट नौकरी के लिए जरूरी स्किल्स से पीछे हैं. जानिए डिग्री और रोजगार के बीच बढ़ते गैप की वजह और विशेषज्ञ की राय.
भारत में उच्च शिक्षा का विस्तार तेजी से हुआ है. उच्च शिक्षा लेने वाले छात्रों की संख्या बढ़कर करीब 4.50 करोड़ हो गई है और उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात यानी GER लगभग 30 प्रतिशत तक पहुंच गया है. इसका मतलब है कि पहले की तुलना में ज्यादा युवा कॉलेज और विश्वविद्यालयों तक पहुंच रहे हैं. लेकिन डिग्री हासिल करने के बाद नौकरी मिलने की चुनौती अब भी बड़ी है. शिक्षा और रोजगार के बीच मौजूद यह अंतर युवाओं की रोजगार क्षमता पर सवाल खड़ा करता है.
इंडिया स्किल्स रिपोर्ट और मर्सर-मेटल की रिपोर्ट के मुताबिक, करीब हर 10 में से 4 ग्रेजुएट नौकरी के लिए पूरी तरह तैयार नहीं माने जाते हैं. वहीं 20 से 24 वर्ष की उम्र के करीब 33 से 40 प्रतिशत डिग्रीधारक युवाओं के बेरोजगार होने का दावा किया जाता है. हालांकि ऐसे आंकड़े अलग-अलग रिपोर्ट, परिभाषा और सर्वे के आधार पर बदल सकते हैं. इसलिए बेरोजगारी और employability को एक ही चीज मानने के बजाय दोनों को अलग-अलग समझना जरूरी है.
डिग्री और नौकरी में गैप क्यों?
इस अंतर की एक प्रमुख वजह पढ़ाई और नौकरी की वास्तविक जरूरतों के बीच तालमेल की कमी मानी जाती है. कॉलेजों में छात्रों को विषय का सैद्धांतिक ज्ञान मिलता है, लेकिन कई बार उन्हें वास्तविक कार्यस्थल जैसी परिस्थितियों में काम करने के पर्याप्त अवसर नहीं मिलते. परिणामस्वरूप डिग्री पूरी करने के बाद नौकरी के लिए आवेदन करते समय युवाओं को अपने ज्ञान को व्यावहारिक क्षमता में बदलने में मुश्किल हो सकती है.
थ्योरी पर ज्यादा जोर क्यों?
शिक्षा में थ्योरी जरूरी है, लेकिन केवल किताबी ज्ञान से नौकरी की सभी जरूरतें पूरी नहीं होतीं. आज नियोक्ता उम्मीदवार में विषय की समझ के साथ समस्या समाधान, टीमवर्क, कम्युनिकेशन और निर्णय लेने जैसी क्षमताएं भी देखते हैं. अगर छात्रों को पढ़ाई के दौरान इन क्षेत्रों में अभ्यास का पर्याप्त अवसर नहीं मिलता, तो डिग्री और रोजगार के बीच दूरी बढ़ सकती है.
1. फैजा मिर्ज़ा, WACE India की मुख्य परिचालन अधिकारी (COO), बताती हैं कि ग्रेजुएट्स में नौकरी के लिए जरूरी स्किल की कमी सिर्फ तकनीकी जानकारी न होने की वजह से नहीं है. बड़ी समस्या कम्युनिकेशन, बदलती परिस्थितियों के हिसाब से खुद को ढालने और ऑफिस के माहौल के लिए तैयार न होने की है. कई छात्र अपने विषय की अच्छी जानकारी रखते हैं, लेकिन नौकरी के दौरान अपनी बात सही तरीके से रखने में परेशानी महसूस करते हैं.
2. सिद्धार्थ गुप्ता, मर्सर-मेटल (Mercer-Mettl) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO), बताते हैं कि भारतीय छात्रों में HR, डिजिटल मार्केटिंग और सेल्स जैसी नॉन-टेक्निकल नौकरियों के लिए स्किल की कमी ज्यादा देखने को मिलती है. वहीं AI और डेटा साइंस जैसे नए तकनीकी क्षेत्रों में छात्रों की तैयारी पहले से बेहतर हो रही है. असली दिक्कत यह है कि पढ़ाई में किताबी ज्ञान तो मिलता है, लेकिन उसे असल जिंदगी और नौकरी में कैसे इस्तेमाल करना है, यह कम सिखाया जाता है.
3. थॉमस थॉमस, मॉर्निंग स्टार के सह-संस्थापक और निदेशक, बताते हैं कि भारत में युवाओं की संख्या बहुत ज्यादा है, लेकिन इस युवा आबादी को सही रोजगार न मिलना चिंता की बात है. करीब 83% बेरोजगार लोग युवा हैं. इसकी एक बड़ी वजह यह है कि कॉलेजों में जो पढ़ाया जा रहा है और कंपनियों में जिस तरह का काम होता है, दोनों के बीच बड़ा अंतर है. छात्रों को पढ़ाई के साथ वास्तविक काम और इंडस्ट्री की जरूरतों से जोड़ना जरूरी है.
अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की रिपोर्ट बताती है कि भारत में कॉलेज की डिग्री लेने वाले युवाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन सिर्फ डिग्री मिलने से नौकरी पक्की नहीं होती. खासकर BA और दूसरे सामान्य ग्रेजुएट्स के सामने नौकरी मिलने और अपनी योग्यता के हिसाब से काम पाने की समस्या ज्यादा है. कई युवाओं को ऐसी नौकरी करनी पड़ती है, जो उनकी पढ़ाई और योग्यता से कम स्तर की होती है.
| क्रम | विशेषज्ञ / रिपोर्ट | मुख्य बात | क्या समस्या है |
|---|---|---|---|
| 1 | फैज़ा मिर्ज़ा WACE India की मुख्य परिचालन अधिकारी (COO) | ग्रेजुएट्स में नौकरी के लिए जरूरी स्किल की कमी सिर्फ तकनीकी जानकारी की वजह से नहीं है। | कम्युनिकेशन, बदलती परिस्थितियों के हिसाब से खुद को ढालने और वर्कप्लेस के लिए तैयार न होने की समस्या बड़ी है। |
| 2 | सिद्धार्थ गुप्ता मर्सर-मेटल (Mercer-Mettl) के CEO | HR, डिजिटल मार्केटिंग और सेल्स जैसी नॉन-टेक्निकल नौकरियों के लिए स्किल गैप ज्यादा दिखाई देता है। | छात्रों को किताबी ज्ञान तो मिलता है, लेकिन उस ज्ञान को असल नौकरी में इस्तेमाल करने का पर्याप्त व्यावहारिक अनुभव नहीं मिलता। |
| 3 | थॉमस थॉमस मॉर्निंग स्टार के सह-संस्थापक और निदेशक | भारत में बेरोजगार आबादी का बड़ा हिस्सा युवा है। | कॉलेजों में पढ़ाई और कंपनियों में होने वाले वास्तविक काम के बीच बड़ा अंतर मौजूद है। |
| 4 | अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी और ILO श्रम बाजार रिपोर्ट | भारत में डिग्री लेने वाले युवाओं की संख्या बढ़ रही है, लेकिन सिर्फ डिग्री नौकरी की गारंटी नहीं है। | खासकर BA और सामान्य ग्रेजुएट्स के सामने बेरोजगारी और अपनी योग्यता से कम स्तर की नौकरी की समस्या ज्यादा दिखाई देती है। |
इंटर्नशिप क्यों जरूरी है?
इंटर्नशिप छात्रों को पढ़ाई और वास्तविक नौकरी के बीच पुल का काम करने वाला अनुभव दे सकती है. इससे विद्यार्थियों को यह समझने का अवसर मिलता है कि किसी कंपनी या संगठन में उनके विषय से जुड़े काम किस तरह किए जाते हैं. प्रोजेक्ट और इंडस्ट्री एक्सपोजर भी छात्रों को टीम में काम करने, समयसीमा पूरी करने और वास्तविक समस्याओं पर काम करने का अनुभव दे सकते हैं.
सॉफ्ट स्किल्स कितनी जरूरी हैं?
कम्युनिकेशन, टीमवर्क, समस्या समाधान और इंटरव्यू में अपनी बात प्रभावी तरीके से रखने जैसी क्षमताएं नौकरी पाने और कार्यस्थल पर बेहतर प्रदर्शन करने में मदद करती हैं. इन्हें आमतौर पर सॉफ्ट स्किल्स कहा जाता है. तकनीकी ज्ञान के साथ इन कौशलों का विकास युवाओं की employability बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकता है.
क्या सिर्फ डिग्री काफी है?
आज के प्रतिस्पर्धी रोजगार बाजार में केवल डिग्री होना पर्याप्त नहीं माना जा सकता. डिग्री के साथ उम्मीदवार के पास अपने क्षेत्र से जुड़ी व्यावहारिक समझ, अनुभव और जरूरी कौशल भी होने चाहिए. यही वजह है कि उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए चुनौती अब सिर्फ ज्यादा छात्रों को शिक्षित करना नहीं, बल्कि उन्हें रोजगार के लिए तैयार करना भी है.
गैप कैसे कम किया जा सकता है?
शिक्षा और रोजगार के बीच दूरी कम करने के लिए कॉलेजों में इंटर्नशिप, इंडस्ट्री प्रोजेक्ट, प्रैक्टिकल ट्रेनिंग, करियर काउंसलिंग और स्किल आधारित पाठ्यक्रम को मजबूत किया जा सकता है. छात्रों को पढ़ाई के शुरुआती वर्षों से ही यह समझाने की जरूरत है कि उनके विषय का इस्तेमाल वास्तविक नौकरी में किस तरह होता है.
भारत में उच्च शिक्षा का बढ़ना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन अगली चुनौती डिग्री से रोजगार तक का सफर आसान बनाना है. युवाओं को अगर किताबी ज्ञान के साथ प्रैक्टिकल अनुभव और सॉफ्ट स्किल्स मिलें, तो उनकी रोजगार क्षमता बेहतर हो सकती है. इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं कि कितने युवा ग्रेजुएट हो रहे हैं, बल्कि यह भी है कि डिग्री मिलने के बाद वे नौकरी की वास्तविक दुनिया के लिए कितने तैयार हैं.