चुनाव आयोग के हलफनामे में 'सब एक हैं' सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया हलफनामा...क्या कांग्रेस को कबूल?
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर कहा कि SIR से जुड़े सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से हुए. इसके बावजूद कांग्रेस और विपक्ष ने आंदोलन जारी रखने का फैसला किया है.
जिस मुद्दे को लेकर विपक्ष लगातार आंदोलन कर रहा है. नई रणनीति बना रहा है, राहुल गांधी स्ट्रीट पॉलिटिक्स को आगे बढ़ा रहे हैं. शिव बारात निकालने की घोषणा कर रहे हैं. आज उसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. चुनाव आयुक्तों के बीच विवाद, SIR और मतदाता सूची में गड़बड़ी को लेकर चल रहे विवाद में आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. एक दिन पहले ही इस मामले में चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में एफिडेविट दाखिल किया था. इस हलफनामे से चुनाव आयुक्तों के बीच विवाद वाले विपक्ष के आरोपों पर प्रश्नचिन्ह लग गया. चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में कहा है कि SIR पर हर फैसला सर्व-सहमति से लिया गया.
विपक्ष मुद्दा बना रहा था कि SIR पर जो फैसले हुए वो एकतरफा थे. अब सवाल ये है कि चुनाव आयोग ने जो तथ्य कोर्ट में रखा है, वो इतनी ही मजबूती से पहले क्यों नहीं बताया? क्या कांग्रेस समेत विपक्ष ने चुनाव आयोग पर सवाल उठाने में जल्दबाजी की. सवाल ये भी है चुनाव आयोग के एफिडेविट के बाद SIR और वोट चोरी को नैरेटिव बनाने वाला विपक्ष अब आगे क्या करेगा. ये वो सवाल हैं, जिन्हें आज हम डिकोड करने वाले हैं.
संविधान सभा में बहस के दौरान डॉ. बीआर आंबेडकर ने कहा था कि पूरे भारत के लिए एक ही चुनाव आयोग होना चाहिए जो पूरी तरह से स्वतंत्र हो और कार्यपालिका के नियंत्रण से मुक्त हो.
पिछले 34 दिन से विपक्ष ये आरोप लगा रहा है कि SIR और वोटर लिस्ट शुद्धिकरण को लेकर चुनाव आयोग की स्वतंत्रता संदिग्ध हो गई है. आज इसी मुद्दे पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दायर 13 विपक्षी नेताओं की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ में सुनवाई शुरू होते ही याचिकाकर्ता राकेश सिंह की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने कोर्ट से चुनाव आयोग के हलफनामे पर जवाब दाखिल करने के लिए 10 दिन का समय मांगा.
याचिकाकर्ता की तरफ से कहा गया कि चुनाव आयोग ने अपना हलफनामा एक दिन पहले दाखिल किया है. ऐसे में याचिकाकर्ता को इसे पढ़ने और जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए. कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को 10 दिन का समय दिया. वहीं सांसद डोला सेना की याचिका पर चुनाव आयोग को अतिरिक्त हलफनामा दाखिल करने के लिए भी 10 दिन का समय दिया गया है. मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को होने की संभावना है. पहले सुनिए आज सुनवाई के बाद याचिकाकर्ता के वकील ने चुनाव आयोग के एफिडेविट पर क्या कहा.
ये याचिकाकर्ताओं का पक्ष है. हलफनामे के कानूनी पक्ष पर बहस अगली सुनवाई में होगी. चुनाव आयोग के कामकाज और SIR को लेकर विपक्षी नेताओं की तरफ से दायर की गई याचिकाओं पर चुनाव आयोग ने जो हलफनामा दाखिल किया है वो 248 पेज का है. इसमें विपक्ष के हर आरोप का बिंदुवार जवाब दिया गया है.
समझिए चुनाव आयोग ने मुख्य चुनाव आयुक्त और दो अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद को खारिज किया है. साफ किया है कि हर फैसला तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिया गया. हलफनामा भी तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से दाखिल किया गया. अब हम चुनाव आयोग के हलफनामे के कुछ और महत्वपूर्ण प्वाइंट्स को विस्तार से समझते हैं.
चुनाव आयोग पर विपक्षी नेताओं ने सबसे गंभीर आरोप यही लगाया कि SIR पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने मनमानी की, मनमाने फैसले लिए. हलफनामे में चुनाव आयोग ने इसका जवाब दिया है. आयोग ने बताया है कि
- 24 जून 2025, 27 अक्टूबर और 14 मई 2026 को SIR पर बैठक हुई. बैठक में जो फैसले हुए उसे तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी मिली थी.
- 24 जून 2025 की बैठक में देशभर में चरणबद्ध SIR कराने का आदेश दिया गया था. इसपर तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति थी.
- 27 अक्टूबर 2025 की बैठक में SIR फेस 2 के कार्यक्रम को तीनों चुनाव आयुक्तों ने मंजूरी दी.
- 14 मई 2026 को SIR फेस 3 के कार्यक्रम को तीनों चुनाव आयुक्तों ने मंजूरी दी.
दावा किया गया था कि दो चुनाव आयुक्तों ने 10 महीने में 14 बार कामकाज पर लिखित आपत्ति दर्ज कराई. एफिडेविट में चुनाव आयोग ने कहा है कि किसी आयुक्त की तरफ से फाइल पर दर्ज सवाल, आपत्ति, सुझाव या टिप्पणी आयोग का फैसला नहीं होता. आयोग का फैसला सभी विचारों पर चर्चा के बाद होता है. फैसले की फाइल पर तीनों चुनाव आयुक्तों के हस्ताक्षर रहते हैं.
हलफनामे में चुनाव आयोग ने साफ किया है कि Form-6 वैधानिक फॉर्म है. इसे केंद्र सरकार ही नियमों में संशोधन करके बदल सकती है. SIR घोषणापत्र अलग दस्तावेज था, वो Form-6 का हिस्सा नहीं था. इसी फॉर्म 6 को लेकर विपक्ष सबसे ज्यादा सवाल उठा रहा है. आयोग ने बताया है कि जिन लोगों के नाम पुरानी वोटर लिस्ट से नहीं जुड़ पाए हैं, उनके जरूरी दस्तावेज BLO घर जाकर जुटाएंगे और ऑनलाइन अपलोड करेंगे.
ECINet पर उठ रहे सवालों को लेकर आयोग ने कहा है कि जांच के लिए IIT मद्रास और IISc बेंगलुरु के विशेषज्ञों की एक समिति बनाई गई है. आयोग ने हलफनामे में विपक्षी नेताओं की याचिकाओं को लेकर एक और महत्वपूर्ण बात कही है. कहा है कि याचिकाएं तथ्यों पर नहीं अखबारी रिपोर्ट पर आधारित हैं. कानून की नजर में अखबार की रिपोर्ट प्रमाण नहीं होती. यानी विपक्षी नेताओं की याचिकाओं को गलत तथ्यों पर आधारित बताया गया है
करीब 34 दिन पहले 23 सितंबर को एक अखबार ने SIR पर चुनाव आयोग में मतभेद और वोटर लिस्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त की मनमानी को लेकर रिपोर्ट छापी थी. अखबार में रिपोर्ट छपने के बाद से ही विपक्ष इसे बड़ा मुद्दा बना रहा है. विपक्ष ने पिछले 34 दिनों में क्या-क्या किया, हम आपको विस्तार से बताएंगे, लेकिन पहले आपको बताते हैं कि अखबार की रिपोर्ट के बाद 26 सितंबर को दोपहर 3 बजे चुनाव आयोग की पूर्ण बैठक हुई. यानी बैठक में मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्त उपस्थित थे. इस बैठक के बाद कथित विवाद पर एक प्रेस नोट भी जारी किया गया था. अब जब चुनाव आयोग ने कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया है, तब 31 दिन पहले जारी किए गए प्रेस नोट को भी ध्यान से समझने की जरूरत है.
26 सितंबर के प्रेस नोट में भी चुनाव आयोग ने बताया था कि SIR पर फैसला सर्वसम्मत है. 26 अक्टूबर को कोर्ट में दिए गए हलफनामे में भी यही कहा गया है. Form-6 को लेकर प्रेस नोट में कहा गया था कि फॉर्म-6 के साथ जोड़े गए घोषणापत्र को सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया और हलफनामे में कहा गया कि Form-6 में बदलाव नहीं किया गया. Declaration यानी घोषणापत्र अलग दस्तावेज है. इस तरह से फॉर्म-6 पर उठ रहे सवालों पर चुनाव आयोग ने अपनी बात और साफ तौर पर कही है. यानी फॉर्म 6 में बदलाव नहीं किया गया और जो घोषणापत्र था वो अलग दस्तावेज था.
चुनाव आयोग में आंतरिक मतभेद पर प्रेस नोट में कहा गया था कि कैबिनेट सचिव को लिखा गया पत्र एक अधिकारी के कामकाज से जुड़ा था. पूरे आयोग के कामकाज से नहीं. हलफनामे में कहा गया है कि आयुक्तों की टिप्पणी अंतिम फैसला नहीं. आदेश सर्वसम्मत है. यानी हलफनामे में फैसले लेने की पूरी प्रकिया का बचाव किया गया है.
प्रेस नोट में कहा गया था कि BLO मतदाता के घर जाएगा. हलफनामे में भी वही बात दोहराई गई है. एक और बड़ी बात 26 सितंबर को जारी प्रेस नोट के बारे में कहा गया था कि प्रेस नोट पूरे आयोग की सहमति से जारी किया गया है. हलफनामे में भी यही कहा गया है कि इसे तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से दाखिल किया गया है.
यानी चुनाव आयोग ने जो बात 26 सितंबर को बैठक के बाद प्रेस रिलीज में कही थी, वही बात 26 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एफिडेविट में कही है. हां हलफनामे की भाषा कानूनी तौर पर ज्यादा मजबूत है, लेकिन प्रेस नोट और एफिडेविट की मूल भावना में रत्ती भर का फर्क नहीं है.
जहां तक कांग्रेस का सवाल है, तो चुनाव आयोग के हलफनामे के बाद भी कांग्रेस इस मुद्दे को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है. 1 नवंबर को विपक्षी इंडिया गठबंधन ने रामलीला मैदान में रैली का ऐलान किया है. दावा किया जा रहा है देशभर से 10 लाख लोग रामलीला मैदान पहुंचेंगे.
पहले 26 सितंबर का चुनाव आयोग का प्रेस नोट और अब सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा, इसके बाद भी विपक्षी नेता नहीं मान रहे हैं कि सबकुछ ठीक है. आज राहुल गांधी दिल्ली के त्रिलोकपुरी में SIR की जनसुनवाई में पहंचे और दोहराया की जब तक ज्ञानेश कुमार को नहीं हटाया जाता विरोध जारी रहेगा
राहुल गांधी ने आज एक पोस्ट भी लिखी. 1 नवंबर को होने वाले आंदोलन को हर भारतीय का आंदोलन बताया. कहा आंदोलन शिव की बारात की तरह है. बिना किसी भेदभाव सबका स्वागत है. राहुल गांधी का लक्ष्य साफ है. भले ही चुनाव आयोग ने एफिडेविट दाखिल कर दिया है, लेकिन जमीन पर आंदोलन जारी रहेगा.
कांग्रेस के दूसरे नेता भी राहुल की लाइन को ही आगे बढ़ा रहे हैं. कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने पोस्ट लिखकर चुनाव आयोग के हलफनामे को भ्रामक, छलपूर्ण और दोहरी नीयत से भरा बताया. जयराम रमेश ने गोलपोस्ट भी बदलने की कोशिश की है. पोस्ट में उन्होंने लिखा की मुद्दा Form-6 में गैरकानूनी संशोधन का है. यानी CEC ज्ञानेश कुमार की मनमानी का मुद्दा अब पीछे हो गया है. सुनिए कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के नेता क्या कह रहे हैं.
यानी तयशुदा कार्यक्रम के तहत 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में प्रदर्शन होगा. प्रदर्शन से दो दिन पहले 30 अक्टूबर को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सार्वजनिक महाभियोग कार्यक्रम होगा.
त्योहार का सीजन है और हर प्रदर्शन व्यापार पर असर डालता है. 23 सितंबर के बाद जंतर-मंतर और दिल्ली में जो प्रदर्शन हुए व्यापारियों की शिकायत है कि इससे उन्हें भारी नुकसान हुआ है. रिपोर्ट्स के मुताबिक
10 अक्टूबर को दिल्ली में लगी पाबंदियों से व्यापारियों को करीब 100 करोड़ का नुकसान हुआ था. ये सिर्फ एक दिन का नुकसान है. Chamber of Trade and Industry के मुताबिक 17 अक्टूबर तक आंदोलन और प्रदर्शन के कारण दिल्ली के व्यापारियों को करीब 3000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है.
दीवाली में दो हफ्ते से भी कम समय बचा है. व्यापारी कह रहे हैं रामलीला मैदान में आंदोलन हुआ और भारी भीड़ जुटी तो उनका कारोबार ठप हो जाएगा. त्योहार के सीजन में ज्यादा कमाई होती है, इसलिए नुकसान भी ज्यादा होगा. कांग्रेस नेता वैकल्पिक अर्थशास्त्र समझा रहे हैं. कह रहे हैं कि लाखों लोग आएंगे तो व्यापारियों को फायदा भी होगा.
चुनाव आयोग के हलफनामे को विपक्ष कानूनी दावंपेच बता रहा है. विपक्ष ने मन बना लिया है कि कोर्ट और सड़क दोनों मोर्चे पर लड़ाई लड़ी जाएगी. चुनाव आयोग के हलफनामे के बाद ये लड़ाई कितनी असरदार होगी, लोग विपक्ष के नैरेटिव से कितना सहमत होंगे, इसकी परीक्षा 1 नवंबर और आगे उसके बाद होने वाले आंदोलन से होगी.