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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल के अध्यक्ष मौलाना तौकीर रजा खान को जमानत देने से इनकार कर दिया है. 26 सितंबर 2025 को बरेली में हुई हिंसा के केस में कोर्ट ने तौकीर रजा को जमानत देने से इनकार करते हुए गंभीर टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा है कि तौकीर रजा ने जो रैली बुलाई थी, उसमें सर तन से जुदा जैसे नारा लगाकर भारत की संप्रभुता और अखंडता को चुनौती दी गई. आज आपको विस्तार से समझना चाहिए कि कोर्ट की इस टिप्पणी का महत्व क्या है. क्या अब भारत में सर-तन से जुदा का नारा लगाने वाले देशद्रोही कहलाएंगे.
स्वामी विवेकानंद का कहना है,'अपने देश की संप्रभुता और अखंडता की रक्षा करना ही सबसे बड़ा धर्म है. यदि कोई विचार या भाषण देश के लोगों को आपस में लड़ाए या देश को कमजोर करे, तो वह विचार त्यागने योग्य है.' लेकिन देश के एक वर्ग को ऐसे विचार अतिप्रिय हैं. ऐसे ही लोगों की पहली पंक्ति में अपना नाम लिखवानेवाले मौलाना तौकीर रजा खान को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जमानत देने से इनकार कर दिया.
आई लव मोहम्मद वाले प्रदर्शन के दौरान 26 सितंबर 2025 को बरेली में हिंसा हुई थी. इस केस में पुलिस ने तौकीर रजा को मुख्य अभियुक्त बनाया है. वो 3 अक्टूबर 2025 से जेल में है. जमानत के लिए तौकीर रजा हाईकोर्ट पहुंचे था. कोर्ट ने जमानत नहीं दी और अपनी टिप्पणी में जमानत नहीं देने का जो आधार बताया है उसे आज आपको बहुत ध्यान से सुनना और समझना चाहिए.
सामान्य भाषा में देश की संप्रुभता और अखंडता को चुनौती देना और लोगों को सशस्त्र विद्रोह के लिए भड़काना देशद्रोह कहलाता है. हालांकि कोर्ट ने इस शब्द का प्रयोग नहीं किया है. सुनिए कोर्ट के आदेश पर सरकारी वकील क्या कह रहे हैं
आचार्य चाणक्य ने कहा है कि,'जो व्यक्ति राष्ट्र की संप्रभुता को चुनौती देता है, विदेशी ताकतों से हाथ मिलाता है या समाज में विद्रोह भड़काता है, वह राष्ट्र का सबसे बड़ा शत्रु है.
तौकीर रजा खान ने यही अपराध किया है. कट्टरपंथियों की जमात सर तन से जुदा जैसे नारे को धर्म से जोड़ने का बौद्धिक अपराध भी करती है. कोर्ट ने अपने आदेश में ये भी साफ किया है कि सर तन से जुदा जैसे नारे की तुलना नारा-ए-तकबीर, जो बोले सो निहाल-सत श्री अकाल, जय श्री राम या हर-हर महादेव जैसे नारों से नहीं की जा सकती. क्योंकि ये नारे ईश्वर या गुरु के प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं. लेकिन सर तन से जुदा का नारा देश की संप्रभुता और अखंडता को चुनौती देता है. हिंसा के लिए उकसाता है.
कट्टरपंथियों की ये खास आदत है. वो अपराध को, देशविरोधी सोच को धर्म के आवरण में छिपाने की साजिश करते हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी ने इसी सोच से पर्दा हटाया है. लेकिन अपनी आदत से मजबूर कट्टरपंथी कोर्ट की इस टिप्पणी में भी किंतु-परंतु तलाश रहे हैं. हां जो धर्म के मूल तत्व को समझते है. वो जरूर कह रहे हैं कि सर-तन से जुदा का नारा हिंसा को उकसावा देता है. यानी हिंसा के लिए भड़काता है.
भारत की भूमि पर जब-जब सर तन से जुदा का नारा लगा अनर्थ हुआ. किसी न किसी निर्दोष की जान गई. सिर्फ जान नहीं गई, सर तन से जुदा का नारा लगानेवालों ने बर्बर तरीके से निर्दोष लोगों की हत्या कर दी. आप सभी इस तथ्य से परिचित हैं. लेकिन यहां हम आपको एक बार फिर याद दिलाना चाहते हैं.
भारत में ये नारा हिंसा और हत्या का पर्याय है. जब भी कट्टरपंथी भीड़ की शक्ल में सड़क पर उतरते हैं, यही नारा लगाकर लगाकर आम नागरिकों को आतंकित करते हैं. पुलिस और कानून को ललकारते हैं. हाथों में लाठी, पत्थर लिए ये अतिवादी देश की संप्रुभता को चुनौती देते हैं. कई शहरों में ऐसे उन्मादी प्रदर्शन हो चुके हैं, लेकिन ये पहली बार हुआ है जब कोर्ट ने कहा है कि सर तन से जुदा का नारा लगाना देश की संप्रुभता को चुनौती देना है.
लोकतांत्रिक देश में सबको विरोध का अधिकार है...सबको अपनी बात रखने का अधिकार भी है, लेकिन हिंसक प्रदर्शन, सर तन से जुदा जैसे नारे लगाने का अधिकार नहीं है. जानते हैं सर तन से जुदा का नारा भारत के उन्मादी सोच वालों का उद्घोष क्यों बन गया है. क्योंकि इस नारे का कनेक्शन कट्टरपंथी हिंसा के एपी सेंटर पाकिस्तान से है. पहली बार ये नारा एक उदारवादी व्यक्ति और उदारवादी विचार की हत्या के लिए पाकिस्तान में ही लगाया गया था.
सर तन से जुदा का नारा 2011 में पाकिस्तान में गढ़ा गया था. तब पाकिस्तानी पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर ने ईशनिंदा कानून की आलोचना की थी. तासीर ने आसिया बीबी नाम की ईसाई महिला का समर्थन किया था. आसिया पर ईशनिंदा का आरोप था. सलमान तासीर से नाराज कट्टरपंथियों के नेता खादिम हुसैन रिजवी ने सर तन से जुदा का नारा गढ़ा और कट्टरपंथियों को सलमान तासीर की हत्या के लिए उकसाया. कट्टरपंथी उन्माद के प्रभाव में आकर सलमान तासीर के अंगरक्षक मुमताज कादरी ने उनकी हत्या कर दी थी.
सोचिए जिस जहरीले नारे का जन्म ही हत्या और हत्या की धमकी देने के लिए हुआ, क्या ऐसा नारा भारत की जमीन पर लगाया जाना चाहिए. बिल्कुल नहीं लगाया जाना चाहिए. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी यही कहा है. यहां एक कानूनी पक्ष को समझना भी हमारे लिए जरूरी है.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 'सर तन से जुदा' के नारे पर जो टिप्पणी की है, वह सिर्फ तौकीर रजा के केस के संदर्भ में है. इस टिप्पणी को किसी दूसरे केस में सीधे आधार नहीं बनाया जा सकता. यानी, ये टिप्पणी किसी दूसरे केस में बाध्यकारी नहीं है. हालांकि, इस केस में जब ट्रायल कोर्ट तौकीर रजा पर दर्ज मामलों की सुनवाई करेगा, तो सरकारी पक्ष हाईकोर्ट की इस टिप्पणी को रेखांकित कर सकता है.
न्यायालय की अपनी प्रक्रिया होती है. इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी किसी दूसरे केस में बाध्यकारी नहीं है, ये सही है. लेकिन इस टिप्पणी से ये साफ हो गया कि न्यायिक प्रक्रिया की नजर में 'सर तन से जुदा' हिंसक और देश की संप्रभुता को चुनौती देने वाला नारा है. तौकीर रजा को जमानत नहीं मिलना..कट्टरपंथियों के लिए सीधा संदेश है. संदेश ये, कि देश की संप्रभुता को चुनौती देने वाले कानून से बच नहीं पाएंगे. आज तौकीर रजा को जमानत नहीं मिली. कल सड़क पर उतरकर 'सर तन से जुदा' जैसे हिंसक नारे लगाने वाले किसी दूसरे कट्टरपंथी को इससे भी कड़ी सजा मिल सकती है.े