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DNA: पंजाब में 'खेला' होगा या AAP बचा लेगी किला? समझिए बीजेपी की आक्रामक घेराबंदी और कांग्रेस की अंदरूनी कलह का पूरा गणित

पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर बीजेपी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (AAP) के बीच सियासी घमासान तेज हो गया है. आइए जानते हैं पंजाब में कैसे मुकाबला त्रिकोणीय दिख रहा है और बीजेपी को क्यों चमत्कार की उम्मीद है?

DNA:  पंजाब में  'खेला' होगा या AAP बचा लेगी किला?  समझिए बीजेपी की आक्रामक घेराबंदी और कांग्रेस की अंदरूनी कलह का पूरा गणित
Image Credit: क्या बंगाल की तरह पंजाब में भी करिश्मा कर पाएगी बीजेपी, या कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाजी फिर बिगाड़ेगी उसका बना-बनाया खेल?

अगले साल यानी 2027 की शुरुआत में यूपी का चुनाव सबसे महत्वपूर्ण है, लेकिन पंजाब का चुनाव भी उससे कम अहम नहीं है. यूपी में दो पार्टियों की सीधी टक्कर है. वहीं पंजाब में मुकाबला मुख्य रूप से त्रिकोणीय है. आज आपको जानना चाहिए, बीजेपी को पंजाब में इस बार उम्मीद क्यों दिख रही है? कांग्रेस को क्यों लग रहा है कि उसके पास सरकार बनाने का मौका है? और आम आदमी पार्टी के लिए तो ये चुनाव करो या मरो की स्थिति है.

4 नवंबर वो दिन है, जब राहुल गांधी पंजाब में 2027 चुनाव के लिए कांग्रेस के अभियान की शुरुआत करने जा रहे हैं. वो मुख्यमंत्री भगवंत मान के गढ़ संगरूर में इंसाफ रैली करेंगे. कांग्रेस का दावा है कि इस रैली में पंजाब के एक लाख से ज्यादा लोग शामिल होंगे, लेकिन अब उसी दिन बीजेपी ने सिख कॉन्क्लेव के जरिए कांग्रेस को घेरने का प्लान बनाया है. दिन भर चलने वाला ये कॉन्क्लेव 1984 के दंगा पीड़ितों, उनके परिवारों और न्याय की लड़ाई को समर्पित किया जाएगा. सूत्रों के मुताबिक़, कॉन्क्लेव में दंगे के पीड़ित परिवार और उनका केस लड़ने वाले वकील शामिल होंगे. साथ ही सिख दंगों से जुड़े मामलों में फैसला देने वाले जजों को भी आमंत्रित किया गया है.

चाणक्य नीति कहती है कि विरोधी पर प्रहार के लिए सही समय की प्रतीक्षा करना आवश्यक है. सही समय पर निश्चय के साथ कदम उठाना विजय दिलाता है.

84 के दंगों के ज़रिए कांग्रेस की घेराबंदी

84 का दंगा सिखों के लिए पिछले चार दशक से एक भावनात्मक मुद्दा है. बीजेपी दंगों की याद दिलाकर सिख समुदाय को ये संदेश देना चाहती है कि कांग्रेस उनके ख़िलाफ़ रही है. बीजेपी का मक़सद इस संवेदनशील मुद्दे को उठाकर सिखों के बीच कांग्रेस को घेरना है. जब सिख कॉन्क्लेव होगा तो बीजेपी पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बयान का ज़िक्र भी ज़रूर करेगी, जिस बयान में उन्होंने दंगों के बाद कहा था- जब एक बड़ा पेड़ गिरता है, तो धरती थोड़ी हिलती है.

सिख दंगों को लेकर ही बीजेपी 1 नवंबर को दिल्ली में इंडिया गठबंधन की रैली का भी विरोध कर रही है. 1 नवंबर का दिन चुने जाने को लेकर उसने ये कहकर आपत्ति जताई है कि उसी दिन 1984 में दंगों की शुरुआत हुई थी. बीजेपी का आरोप है कि 1 नवंबर को रैली करके कांग्रेस सिख समुदाय के ज़ख़्मों पर नमक छिड़क रही है. इस रैली के ख़िलाफ़ बीजेपी ने दिल्ली में मार्च निकालने की तैयारी भी की है. इस मार्च में भी सिख दंगों के पीड़ित परिवार शामिल होंगे.

पंजाब में बीजेपी को क्यों दिख रही उम्मीद?

पंजाब को लेकर बीजेपी की इस रणनीति का सबसे बड़ा कारण ये है कि उसे इस बार जीत की उम्मीद दिख रही है. पहली बार, बीजेपी पंजाब की सभी 117 विधानसभा सीटों पर स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है. बंगाल में सरकार बनाने में मिली कामयाबी के बाद, उसे भरोसा हो गया है कि जिन राज्यों में पारंपरिक रूप से उसका मजबूत आधार नहीं है, वहां भी वो जीत सकती है.

2016 में बीजेपी को बंगाल में सिर्फ़ 3 सीटें मिली थीं..लेकिन 2021 के विधानसभा चुनाव में उसने 77 सीटों पर जीत हासिल की और 2026 आते-आते वो सत्ता में आ गई. पंजाब में 2 विधायकों वाली बीजेपी को लगता है कि जिस तरह पश्चिम बंगाल में 10 साल के दौरान उसने पूरी राजनीति बदल दी, ठीक वैसा ही कमाल वो पंजाब में भी कर सकती है.

पंजाब में पिछले 4 चुनावों का रिपोर्ट कार्ड

  • 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने शिरोमणि अकाली दल के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था. उस चुनाव में पंजाब की 117 में से 23 सीटों पर लड़कर बीजेपी को 3 सीटें मिलीं. जबकि उसका वोट शेयर 5% के करीब था.
  • 2019 का लोकसभा चुनाव भी बीजेपी ने अकाली दल के साथ मिलकर लड़ा. 13 में से 3 सीटों पर लड़ने वाली बीजेपी को 2 पर जीत मिली. उसका वोट शेयर 10% रहा.
  • वहीं 2022 का विधानसभा चुनाव बीजेपी ने पंजाब की 2 छोटी पार्टियों के साथ मिलकर लड़ा. 73 सीटों पर लड़ने वाली बीजेपी को सिर्फ 2 सीटों पर जीत मिली और उसका वोट शेयर 7% के आसपास था.
  • लेकिन बीजेपी के लिए असली टर्निंग प्वाइंट 2024 के लोकसभा चुनाव में आया. बीजेपी अकेले दम पर सभी 13 सीटों पर लड़ी. उसे एक भी सीट पर जीत नहीं मिली लेकिन वोट शेयर बढ़कर 19% हो गया. यानी 2024 में बीजेपी को 2019 के मुकाबले लगभग दोगुना वोट मिला.
  • लंबे समय तक पंजाब में अकाली दल की जूनियर पार्टनर रही बीजेपी 2024 के चुनाव में वोट शेयर के मामले में उससे आगे निकल गई. 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी ने 23 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल की. यानी गठबंधन से अलग होने के बाद सीटों के मामले में बीजेपी को भले ही नुकसान हुआ लेकिन इससे वो पंजाब में मजबूत बनकर उभरी.

अकाली दल के साथ गठबंधन पर क्या है पेंच?

2024 के ही नतीजे हैं कि बीजेपी इस बार अकेले चुनाव लड़ने के लिए तैयार है. कयास लग रहे हैं कि अकाली दल के साथ उसका गठबंधन हो सकता है. अकाली दल अध्यक्ष सुखबीर बादल ने इसके संकेत भी दिए हैं, लेकिन बीजेपी अभी इस पर ख़ामोश है. जानकारों के मुताबिक़, अगर गठबंधन होता भी है तो इस बार बीजेपी पंजाब में बड़े भाई की भूमिका में रहेगी यानी वो अकाली दल की तुलना में ज्यादा सीट चाहेगी.

सूत्रों का कहना है कि बीजेपी गठबंधन इसी शर्त पर करेगी जब उसे कम से कम 60 सीटें लड़ने के लिए मिलेंगी. जबकि 2017 के चुनाव में बीजेपी सिर्फ़ 23 सीटों पर लड़ी थी और अकाली दल ने बाकी 94 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. हालांकि मुख्यमंत्री भगवंत मान ने आज बीजेपी-अकाली दल के बीच प्रस्तावित गठबंधन का मज़ाक उड़ाया.

भगवंत मान भले ही बीजेपी को पंजाब में कमजोर बता रहे हों लेकिन बीजेपी को पूरा यकीन है कि इस वक्त पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार के ख़िलाफ एंटी इनकम्बेंसी है. बीजेपी के मुताबिक़ ड्रग्स और क़ानून-व्यवस्था के मुद्दे पर भगवंत मान की सरकार ने लोगों को निराश किया है. यही वजह है कि बीजेपी नशे के मुद्दे को ज़ोर-शोर से उठा रही है. 20 अक्टूबर को अपने पंजाब दौरे में गृह मंत्री अमित शाह ने नशे का शिकार बनने वाले 3 परिवारों से मुलाक़ात की और 2029 तक पंजाब को नशा मुक्त बनाने का वादा किया. पिछले महीने बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन ने नशा मुक्त पंजाब यात्रा की शुरुआत की जो पंजाब की सभी विधानसभा सीटों से गुज़रेगी.

पंजाब का धार्मिक और जातीय समीकरण

बीजेपी ने पंजाब को लेकर ज़मीनी तैयारियों की शुरुआत कई महीने पहले कर दी थी. पड़ोसी राज्य हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी को पंजाब में चुनाव का ज़िम्मा सौंपा गया था. उस वक्त से वो लगातार पंजाब का दौरा कर रहे हैं. नायब सिंह सैनी अक्सर भगवा पगड़ी पहने धाराप्रवाह पंजाबी में बोलते दिखते हैं. इसका मक़सद ये बताना है कि वो कोई बाहरी नेता नहीं हैं. मित्रों, आज आपको पंजाब का धार्मिक और जातीय समीकरण भी समझना चाहिए.

पंजाब में सिख आबादी लगभग 58% है जबकि हिंदू वोटर 39% के करीब हैं. वहीं पंजाब में दलित आबादी देश में सबसे ज्यादा है. ये लगभग 32% हैं और हिंदू और सिख दोनों धर्मों में हैं. हिंदू मतदाताओं पर बीजेपी की पहले से अच्छी पकड़ है. सिख मतदाताओं को लुभाने के लिए बीजेपी ने पंजाब में सिख नेताओं को आगे बढ़ाया है. केवल सिंह ढिल्लों को पंजाब बीजेपी का अध्यक्ष बनाया गया है. वे पंजाब में बीजेपी के पहले जाट सिख प्रदेश अध्यक्ष हैं. इसके अलावा पूर्व केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को भी चुनाव में अहम ज़िम्मेदारी सौंपी गई है. अगर अकाली दल के साथ बीजेपी का गठबंधन होता है तो गठबंधन को सिख वोट का फ़ायदा होगा.

कांग्रेस के हौसले बुलंद, लेकिन गुटबाजी से चुनौती

बीजेपी को पंजाब में चमत्कार की उम्मीद है. दूसरी तरफ़ कांग्रेस पंजाब में अपनी जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त है. उसे पूरा भरोसा है कि 2027 में एक बार फिर 2017 की तरह कांग्रेस की वापसी होगी. लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने जिस तरह का प्रदर्शन किया, उसके बाद वो खुद को वहां की स्वाभाविक दावेदार समझ रही है. लेकिन कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती ये है कि वो खुद को एक रख पाएगी या नहीं. कांग्रेस की आंतरिक गुटबाज़ी से पहले आपको वो फैक्टर समझना चाहिए जिससे पता चलता है कि वो पंजाब में वापसी कर सकती है.

2022 के विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस ने 2024 के लोकसभा चुनाव में वापसी की. पंजाब की 13 में से 7 लोकसभा सीटों पर जीत के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी. कांग्रेस को उस चुनाव में 26% वोट मिले. लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस ने भगवंत मान सरकार के खिलाफ आक्रामक अभियान चलाया. ड्रग्स, क़ानून-व्यवस्था और बेअदबी जैसे मुद्दों पर उसने राज्य सरकार को घेरा. लग रहा था कि कांग्रेस अपने मिशन पंजाब में कामयाब होगी. लेकिन हाल के महीनों में कांग्रेस की आंतरिक गुटबाज़ी से पार्टी के भीतर ही लड़ाई शुरू हो गई. पंजाब कांग्रेस के प्रभारी भूपेश बघेल और पूर्व अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग के ख़िलाफ़ पूर्व सीएम चरणजीत सिंह चन्नी की अगुवाई में मोर्चा खोल दिया गया.

धीरे-धीरे ये नाराज़गी पार्टी के सार्वजनिक कार्यक्रमों तक पहुंच गई. कई जगहों पर भूपेश बघेल के ख़िलाफ़ पोस्टर लगाए गए. यहां तक कि अलग-अलग गुटों के समर्थकों के बीच धक्का-मुक्की की नौबत तक आ गई. इस हंगामे के बीच भूपेश बघेल की जगह सचिन पायलट को पंजाब का प्रभारी बनाया गया. साथ ही वडिंग की जगह परगट सिंह अब पंजाब कांग्रेस के नए अध्यक्ष बनाए गए हैं. चुनाव से कुछ महीने पहले इस बदलाव से पार्टी को भीतरघात का ख़तरा है. पार्टी के भीतर फिलहाल एक गुट चरणजीत सिंह चन्नी का है तो दूसरा गुट विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा का. साथ ही एक गुट पूर्व अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग का भी है.

क्या गुटबाजी खत्म कर पाएंगे राहुल?

चाणक्य नीति के मुताबिक़ आंतरिक मतभेद एक बड़ा दोष है जिसका विरोधी आसानी से लाभ उठा सकते हैं. चुनाव से कुछ महीने पहले परगट सिंह के सामने सबसे बड़ी चुनौती है भीतरी गुटबाज़ी खत्म करना. अगर वो इस पर काबू पा लेते हैं तो पंजाब में कांग्रेस की उम्मीदें बढ़ेंगी. 4 नवंबर को होने वाली अपनी रैली से राहुल गांधी अलग-अलग गुटों में बंटी पार्टी को एकजुटता का संदेश देने की कोशिश करेंगे.

आम आदमी पार्टी की पहली लिस्ट की तैयारी

बीजेपी और कांग्रेस जहां रैलियों के ज़रिए पंजाब में तैयारी कर रही हैं, वहीं आम आदमी पार्टी चुनावी तैयारी के मामले में उनसे एक कदम आगे है. आम आदमी पार्टी पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए कल यानी 31 अक्टूबर को अपने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी करेगी.

पंजाब चुनाव को लेकर आज दिल्ली में पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल के आवास पर अहम बैठक हुई. केजरीवाल, भगवंत मान और पंजाब के प्रभारी मनीष सिसोदिया की मौजूदगी में संभावित उम्मीदवारों के नाम पर चर्चा हुई और कुछ नामों को अंतिम रूप देकर पार्टी की राजनीतिक मामलों की समिति यानी पीएसी के पास भेजा गया. अब पीएसी की अगली बैठक कल 11 बजे होगी. इस बैठक में पहली लिस्ट के उम्मीदवारों के नामों पर मुहर लगाई जाएगी.

इस बार पार्टी चुनाव की आधिकारिक घोषणा से काफी पहले सभी उम्मीदवारों के नाम का एलान करेगी. इसका मक़सद उम्मीदवारों को विधानसभा में जनता के बीच जाने और तैयारी करने का पर्याप्त समय देना है. पंजाब विधानसभा में आम आदमी पार्टी के फिलहाल 117 में से 92 विधायक हैं. अब देखना होगा कि चुनाव में किस पार्टी की रणनीति काम आती है. आने वाले दिनों में भी पंजाब चुनाव को लेकर डीएनए की ये विशेष कवरेज जारी रहेगी.

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About the Author

Bhoopendra Rai

Bhoopendra Rai

पत्रकारिता में 9 साल से सक्रिय भूपेंद्र कुमार राय Zee News में सीनियर सब एडिटर के तौर पर न्यूज टीम का हिस्सा हैं, देश विदेशी की खबरें कवर करते हैं. 2017 में ETV Bharat (हैदराबाद) से करियर की शुरुआत करने के बाद वे 2020 में Zee News पहुंचे, जहां 2022 तक काम किया. 2023 में News24 की स्पोर्ट्स टीम को लीड करने का मौका मिला. इसके बाद India Daily Live में बतौर चीफ सब एडिटर स्पोर्ट्स टीम के साथ जुड़े. 2024 में दोबारा News24 लौटे और नई स्पोर्ट्स वेबसाइट लॉन्चिंग का अहम हिस्सा रहे. अक्टूबर 2025 में News24 से अलविदा लेकर एक बार फिर Zee News पहुंचे हैं. खेलों में गहरी रुचि रखते हैं और क्रिकेट वर्ल्ड कप, एशियन गेम्स, ओलंपिक गेम्स, हॉकी वर्ल्ड कप समेत बड़े खेल इवेंट को कवर करने का अनुभव है. ब्रेकिंग न्यूज, क्रिकेट एनालिसिस और किस्से-कहानियों पर अच्छी पकड़ है. जी न्यूज में खेल से जुड़ी खबरों के बाद अब न्यूज टीम के साथ रियलटाइम न्यूज पर काम कर रहे हैं. एक्सप्लेनर और किसी भी मुद्दे पर रिसर्च के साथ उसे आसान भाषा में पाठकों तक पहुंचा रहे हैं. आप Bhoopendra.Rai@zeemedia.com पर सीधे ईमेल या फिर नीचे X और Facebook से जुड़ सकते हैं.
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