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इटली की राजनीति में बार-बार सरकारें गिरने का 80 साल पुराना सिलसिला तोड़कर जॉर्जिया मेलोनी ने नया इतिहास रच दिया है. वे दूसरे विश्व युद्ध के बाद देश में सबसे लंबे समय तक लगातार प्रधानमंत्री पद संभालने वाली पहली नेता बन गई हैं. लगातार 1,413 दिन पूरे कर उन्होंने सिल्वियो बर्लुस्कोनी का रिकॉर्ड भी पीछे छोड़ दिया है. जिस देश में सरकारों की औसत उम्र महज 13 से 14 महीने रही हो और आठ दशकों में 68 सरकारें बदली हों, वहां मेलोनी का यह अटूट कार्यकाल किसी राजनीतिक चमत्कार से कम नहीं है.
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जॉर्जिया मेलोनी को बधाई देते हुए कहा कि उनका लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहना इटली की जनता के उनके नेतृत्व पर भरोसे को दर्शाता है. मेलोनी ने जवाब में पीएम मोदी को धन्यवाद दिया... उनकी दोस्ती और भारत-इटली साझेदारी को याद किया.
जॉर्जिया मेलोनी का रिकॉर्ड क्यों इटली के लिए राजनीतिक चमत्कार माना जा रहा?
जॉर्जिया मेलोनी ने 22 अक्टूबर 2022 को इटली की पहली महिला प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी. आज 4 सितंबर 2026 उनके कार्यकाल के लगातार 1 हजार 413 दिन पूरे हो गए. मेलोनी ने इटली के पूर्व प्रधानमंत्री सिल्वियो बर्लुस्कोनी के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ा है. बर्लुस्कोनी की दूसरी सरकार 2001 से 2005 के बीच लगातार 1 हजार 412 दिन तक सत्ता में रही थी.
इटली के आधुनिक राजनीतिक इतिहास में 1946 के बाद से बनी सरकारों की औसत उम्र 13 से 14 महीने रही है. इटली ने आठ दशकों में 68 से अधिक सरकारें देखी हैं. यह संख्या कितनी ज्यादा है, उसे आप इस तरह समझ सकते हैं कि भारत में 8 दशकों में सिर्फ 26 सरकारों का गठन हुआ है. इसीलिए, राजनीतिक रूप से इतने अस्थिर देश में लगातार 3 साल, 10 महीने और 13 दिन तक सरकार चलाना एक चमत्कार माना जा रहा है. जॉर्जिया मेलोनी की इस सफलता को इटली में स्थिरता का नया कीर्तिमान कहा जा रहा है.
स्थिरता केवल आंकड़ों में दर्ज कराने वाली कोई ट्रॉफी नहीं है, बल्कि यह देश के विकास, बड़े फैसले लेने और दुनिया में इटली का खोया सम्मान वापस पाने की अनिवार्य पूर्व-शर्त है. मेलोनी ने जैसा कहा वैसा उनके कार्यकाल में दिखा भी. 14 महीने में सरकार बदलने वाले देश में जब मजबूत सरकार बनी तो मेलोनी को दुनिया में सम्मान भी मिला.
विदेशों में इटली का सम्मान बढ़ाने के अलावा मेलोनी ने 2 बड़ी बातें और कहीं. आज आपको इनके बारे में भी जानना चाहिए.
मेलोनी ने कहा... सरकार सत्ता में बने रहने के लिए किसी विरोधी या दल के 'खिलाफ' नहीं खड़ी हुई, बल्कि केवल 'इटली के राष्ट्रीय हित और विकास की परियोजना' को आगे बढ़ाने के लिए एक साथ टिकी रही. यानी मेलोनी मानती हैं कि राष्ट्रवाद ने उनकी सरकार को स्थिर बनाया. इसके अलावा मेलोनी ने कहा यह सफलता किसी अकेले नेता की व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा की नहीं, बल्कि एक अनुशासित और एकजुट गठबंधन का परिणाम है.
इटली में राजनीतिक अस्थिरता क्यों है?
मेलोनी की दूसरी बड़ी बात में वो तथ्य छिपे हैं, जिससे आप समझ सकते हैं कि आखिरकार इटली राजनीतिक रूप से इतना अस्थिर क्यों है. वहां बार-बार सरकारें क्यों गिरती हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह है... इटली में गठबंधन सरकार की मजबूरी... आज आपको समझना चाहिए कि इटली में ज्यादातर गठबंधन सरकारें ही क्यों बनती हैं.
दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1946 में इटली जब गणराज्य बना, तब संविधान निर्माताओं ने किसी एक नेता को दोबारा बेनिटो मुसोलिनी जैसा तानाशाह बनने से रोकने की कोशिश शुरू की. इसीलिए जानबूझकर प्रधानमंत्री को कमजोर और संसद को अत्यधिक शक्तिशाली बनाया गया, और इस वजह से सरकारें कमजोर होती गईं. इटली में राजनीतिक अस्थिरता की सबसे बड़ी वजह है आनुपातिक प्रतिनिधित्व का नियम, जिसकी वजह से चुनावों में किसी एक दल को पूर्ण बहुमत मिलना बहुत मुश्किल हो गया.
भारत में राष्ट्रीय स्तर पर किसी पार्टी को कुल पड़े वोटों के 37% वोट भी मिलें, लेकिन वह संसद की 50 प्रतिशत सीटों से एक सीट ज्यादा जीत ले, तो उसे पूर्ण बहुमत मिल जाता है. जैसे 2019 लोकसभा चुनाव में बीजेपी को लगभग 37% राष्ट्रीय वोट शेयर मिला लेकिन सीटें 303 मिलीं, जो साधारण पूर्ण बहुमत यानी 272 से कहीं अधिक था. इसके बाद बीजेपी ने पूर्ण बहुमत की मजबूत सरकार बनाई, लेकिन इटली में ऐसा नहीं है.
इटली में दो नियम काम करते हैं. लगभग 37% यानी कुल 400 में से 147 सीटों पर भारत वाला सिस्टम काम करता है. मतलब इन सीटों पर जो प्रत्याशी अपने इलाके में सबसे आगे रहेगा, सीट उसी की होगी, चाहे उसे केवल 35% या 40% वोट ही क्यों न मिले हों. लेकिन 61% यानी 245 सीटों पर आनुपातिक सिस्टम लागू होता है. यानी जिस पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर जितने प्रतिशत वोट मिलते हैं, बाकी 245 सीटें उसी अनुपात में बांट दी जाती हैं. बाकी 2% सीटें विदेशों में रहने वाले इटली के नागरिकों के लिए होती हैं. इसीलिए 50 प्रतिशत सीटों के लिए सबसे बड़ी पार्टी को भी दूसरी पार्टी से गठबंधन करना पड़ता है. इसी का नतीजा है... इटली में 4 से 6 दलों के बेमेल गठबंधन बने, जहां 2-3 सीटों वाला छोटा दल भी सरकार गिराने की ताकत रखता था. इसी वजह से सरकारें स्थिर नहीं रहीं.
मेलोनी की सबसे बड़ी सफलता क्या है?
इटली में 8 दशकों में सिर्फ एक बार 1948 में किसी सरकार को पूर्ण बहुमत मिला था. जॉर्जिया मेलोनी की सफलता इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि उन्होंने तीन पार्टियों के अपने गठबंधन को बिखरने नहीं दिया. आज आपको समझना चाहिए... मेलोनी ने ऐसा कैसे किया.
दरअसल, मेलोनी जानती थीं कि उनकी अपनी पार्टी 'ब्रदर्स ऑफ इटली' को अकेले चुनाव में 25-26% वोट से ज्यादा नहीं मिलेंगे. इसलिए उन्होंने चुनाव लड़ने से पहले ही समान विचारधारा की दो दक्षिणपंथी पार्टियों—मातेओ साल्विनी की 'लीगा' पार्टी और बर्लुस्कोनी की 'फोर्जा इटालिया' पार्टी से हाथ मिला लिया. इस संयुक्त ताकत के दम पर उनके पूरे गठबंधन को 50% से अधिक सीटें मिल गईं और मेलोनी प्रधानमंत्री बन गईं.
26% वोट्स के साथ मेलोनी की पार्टी गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी थी. सहयोगी पार्टियों को मेलोनी ने महत्वपूर्ण पद दिए, यानी सहयोगियों को संतुष्ट रखा. इसके अलावा उनकी लोकप्रियता की वजह से दूसरी दक्षिणपंथी पार्टियों को लगा कि दोबारा चुनाव की नौबत आई, तो समान विचारधारा की वजह से मेलोनी की पार्टी उनके सारे वोट्स खा जाएगी. इसलिए मेलोनी की सरकार मजबूत बनी रही. इसके अलावा राष्ट्रवाद के मुद्दों के सहारे मेलोनी ने अपने गठबंधन और लोकप्रियता को मजबूत बनाकर रखा.
मेलोनी ने क्या बड़े काम किए?
अवैध प्रवासियों पर जीरो टॉलरेंस नीति अपनाई: अवैध प्रवासियों पर मेलोनी की नीति जीरो टॉलरेंस की थी. उन्होंने भूमध्य सागर में एनजीओ जहाजों की गतिविधियों पर नकेल कसने के लिए सेना का इस्तेमाल किया. इसके अलावा अल्बानिया में डिटेंशन सेंटर बनाने के कड़े रुख पर तीनों दल पूरी तरह एकमत रहे. सामान्य नियम यह होता है कि जब कोई विदेशी नागरिक समुद्र पार करके देश में प्रवेश करता है, तो उसे उसी देश के कैंप में रखा जाता है, लेकिन मेलोनी ने घुसपैठियों को रखने के लिए दूसरे देश अल्बानिया में डिटेंशन सेंटर बनाए. इससे अवैध रूप से इटली में घुसने वालों की संख्या 60 प्रतिशत तक कम हो गई.
इटली इस वक्त कम जन्मदर की समस्या से जूझ रहा है. यानी इटली में बुजुर्गों की संख्या बहुत ज्यादा है और बच्चे बहुत कम पैदा हो रहे हैं. इटली की लेफ्ट सरकारों ने श्रम की इस कमी को बाहर से अप्रवासियों को बुलाकर पूरा करने की नीति अपनाई, लेकिन मेलोनी ने शरणार्थियों की भीड़ लाकर नहीं, अपने देश की आबादी बढ़ाकर इस संकट को हल करने का फैसला किया. इसके लिए मेलोनी ने दूसरे और तीसरे बच्चे वाले परिवारों के लिए टैक्स का बोझ लगभग खत्म या बहुत कम कर दिया.
कामकाजी माताओं के सामाजिक सुरक्षा योगदान का भुगतान खुद सरकार ने अपने खजाने से किया, ताकि महिलाओं को करियर और मातृत्व में से किसी एक को चुनना न पड़े. इसके अलावा मेलोनी की नीति राष्ट्रीय संप्रभुता और 'इटली फर्स्ट' की रही. इसके लिए उन्होंने यूरोपीय संघ के अनुचित दबावों का विरोध किया और इटली के घरेलू और आर्थिक हितों को यूरोपीय संघ के आदेशों से ऊपर रखा.
मेलोनी ने अपराध के खिलाफ कठोर नीतियां लागू कीं और पिछली सरकारों की 'सिटिजनशिप इनकम' जैसी मुफ्त रेवड़ियों को बंद कर कामगार वर्ग को प्राथमिकता दी. लेफ्ट पार्टियों के दौर में इटली में चीन का प्रभाव बढ़ रहा था, लेकिन मेलोनी ने सामरिक सुरक्षा का हवाला देकर इटली को चीन के विवादास्पद 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' से आधिकारिक रूप से बाहर निकाल लिया, जिससे उनकी लोकप्रियता और गठबंधन दोनों मजबूत हुए और वह लंबे समय तक सरकार चलाने का रिकॉर्ड बना पाईं.
मेलोनी का इटली में मजबूत होना भारत के हित में कैसे?
मेलोनी ने सत्ता में आते ही इटली को चीन के 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' से आधिकारिक रूप से बाहर निकाल दिया और इसके विकल्प के तौर पर भारत के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट 'इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर' को पूरा समर्थन दिया है. मेलोनी के कार्यकाल में भारत और इटली ने केवल हथियार खरीदने के बजाय संयुक्त निर्माण और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का समझौता भी किया है.
2024 में जब इटली ने G7 की अध्यक्षता की, तो मेलोनी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विशेष आमंत्रित अतिथि के रूप में बुलाया. मेलोनी जहां अवैध प्रवासियों के खिलाफ बेहद सख्त हैं, वहीं उन्होंने भारत के साथ 'माइग्रेशन एंड मोबिलिटी पार्टनरशिप एग्रीमेंट' लागू किया. इसके तहत भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स, नर्सों और कुशल श्रमिकों के लिए इटली में कानूनी रूप से काम करने के आसान रास्ते खुले हैं. इसके अलावा यूरोपीय संघ में फ्रांस और जर्मनी के बाद इटली तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. मेलोनी सरकार ने भारत और यूरोपीय संघ के बीच अटके पड़े मुक्त व्यापार समझौते को तेजी से पूरा कराने में भारत का खुलकर पक्ष लिया है, जो भारत के लिए फायदेमंद है.