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देश कोई भी हो...राजनीति में कोई भी कदम यूं ही नहीं उठाया जाता. न टाइमिंग इत्तेफाक होती है और न ही लंच की टेबल पर सजी थाली, पिछले तीन दिनों से देश की राजधानी दिल्ली में एक नया पॉलिटिकल फॉर्मूला चर्चा में है. 'पहले भोजन, फिर आंदोलन'. दोपहर के ठीक 3 बजे जब सरकारी दफ्तरों से लेकर सोशल मीडिया तक की रफ्तार बदलने लगती है, ठीक उसी वक्त इंडिया गठबंधन के नेता सड़क पर उतरते हैं. अब सवाल ये है कि यह प्लान सिर्फ चुनाव आयुक्त के खिलाफ एक सामान्य विरोध है, या फिर कोई सोची-समझी रणनीति? आइए डिटेल से समझते हैं...
संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर का मानना था कि "शब्दों और विचारों की लड़ाई ही सबसे बड़ी लड़ाई है, जो समाज या दल विमर्श की धुरी पर कब्जा कर लेता है, वह अंततः जनता के मन पर भी कब्जा कर लेता है." पिछले 3 दिन यानी 72 घंटे से विमर्श के केंद्र में रहने का संघर्ष हो रहा है. कांग्रेस के नेतृत्व में पहले लंच और उसके बाद प्रदर्शन हो रहा है. मेनस्ट्रीम मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक पूरा स्पेस कांग्रेस के प्रदर्शन की चर्चा से भरा हुआ है. कल की तरह आज भी कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने इंडिया गठबंधन के सांसदों को कनॉट प्लेस के एक रेस्टोरेंट में लंच दिया. उसके बाद प्रदर्शन हुआ.
विपक्षी नेता राजघाट पहुंचे. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि दी. बापू की समाधि के सामने बैठकर विरोध जताया. फिर सभी विपक्षी नेता अपने-अपने घर चले गए. आज का प्रदर्शन कुल मिलाकर शांतिपूर्ण रहा. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन का यह लगातार तीसरा दिन है.
कांग्रेस के इस प्रदर्शन में लगातार एक खास पैटर्न देखने को मिल रहा है. यह पैटर्न है 'पहले भोजन, फिर आंदोलन', यानी दोपहर में एक साथ विपक्ष के बड़े नेता लंच करते हैं, उसके बाद प्रदर्शन के लिए सड़क पर उतरते हैं. इसे आप आंदोलन का मैटिनी शो भी कह सकते हैं. आज आपको हम बताएंगे कि कांग्रेस का प्रदर्शन लंच के बाद ही क्यों हो रहा है और इसके पीछे की असली स्ट्रैटेजी क्या है?
कल के लंच और प्रदर्शन में समाजवादी पार्टी शामिल नहीं थी. इसके बाद इंडिया गठबंधन की एकजुटता पर सवाल उठे. आज लंच में समाजवादी पार्टी के राजीव राय की मौजूदगी से इन सवालों पर पूर्णविराम लग गया. लंच करीब साढ़े तीन बजे तक चला. उसके बाद राजघाट पर प्रदर्शन का ऐलान हुआ.
विश्लेषण के अगले हिस्से को समझने के लिए आज के लंच और प्रदर्शन की टाइमलाइन को समझ लेते हैं.
एक दिन पहले जो प्रदर्शन हुआ था, उसकी प्लानिंग भी ऐसी ही थी. करीब 1 बजकर 30 मिनट पर लंच शुरू हुआ और 3 बजे के करीब प्रदर्शन शुरू हुआ. यानी 3 बजे का समय कांग्रेस के प्रदर्शन का स्ट्रैटेजिक कॉमन टाइम हो गया है. यह महज संयोग नहीं, बल्कि सोची-समझी प्लानिंग का हिस्सा है. 3 बजे प्रदर्शन शुरू करना कांग्रेस की नई रणनीति है. पहले जो प्रदर्शन होते थे, वे सुबह 10 बजे या दोपहर 12 बजे शुरू होते थे. दोपहर 2 बजे या ज्यादा से ज्यादा शाम 5 बजे तक प्रदर्शन का समापन हो जाता था. लेकिन अब कांग्रेस का प्रदर्शन शुरू ही होता है दोपहर 3 बजे, जिसकी चर्चा देर रात तक रहती है. यह एक बड़ा स्ट्रैटेजिक शिफ्ट है.
इटली के प्रसिद्ध राजनीतिक विचारक निकोलो मैकियावेली का मत है कि राजनीतिक शक्ति का असली स्रोत केवल बल या पद नहीं है, बल्कि वह क्षमता है जिसके जरिए आप तय करते हैं कि लोग किस बारे में बात करें.
कांग्रेस यही कर रही है. वह प्रदर्शन का समय इस तरह तय कर रही है कि उसका प्रोटेस्ट ही लगातार चर्चा में बना रहे. कांग्रेस के रणनीतिकारों ने पिछले तीन दिनों में 3 बजे से प्रदर्शन की रणनीति इसी नैरेटिव को ध्यान में रखकर तय की है. आपके मन में जिज्ञासा होगी कि आखिर 3 बजे की टाइमिंग में क्या खास है और इससे कांग्रेस व विपक्षी दलों को क्या हासिल हो रहा है?
दोपहर 3 बजे जब कांग्रेस के नेता प्रदर्शन के लिए निकलते हैं, तो उस वक्त दफ्तरों का समय खत्म होने वाला होता है. 3 बजे शुरू हुआ प्रदर्शन शाम 5 बजे के बाद तक चलता है. यानी जब ऑफिस से लोग बाहर निकलते हैं और सोशल मीडिया खोलते हैं, तो उनकी फीड में कांग्रेस का प्रदर्शन टॉप पर ट्रेंड कर रहा होता है.
शाम 5 बजे ऑफिस से निकलने के बाद अगर कोई राहगीर जाम में फंस जाए या कहीं भारी भीड़ दिखे, तो स्वाभाविक सवाल उठता है कि ऐसा क्यों है? जवाब मिलता है कि कांग्रेस का प्रदर्शन चल रहा है. जाम से भले ही कोई परेशान हो, लेकिन उस तक प्रदर्शन की खबर पहुंच जाती है. लोग चाहे-अनचाहे तरीके से इस विरोध की चर्चा में शामिल हो जाते हैं. रेलवे का दावा है कि आज ही करीब 5 हजार लोगों की ट्रेन कांग्रेस के प्रदर्शन के कारण लगे जाम की वजह से छूट गई.
अब इसका मीडिया मैनेजमेंट समझिए. शाम 5 बजे के बाद टीवी और डिजिटल मीडिया को सबसे ज्यादा दर्शक मिलते हैं. ठीक इसी वक्त कांग्रेस का प्रदर्शन ऑन-ग्राउंड चल रहा होता है, जिससे मीडिया में इसे ज्यादा से ज्यादा स्पेस मिलता है.
सुबह 10 बजे शुरू हुआ आंदोलन शाम 5 बजे तक मीडिया साइकल से बाहर हो जाता है. लेकिन दोपहर 3 बजे शुरू होने वाला प्रदर्शन सीधे टीवी के प्राइम टाइम तक पहुंचता है, डिबेट का मुद्दा बनता है और अगले दिन सुबह अखबारों की मुख्य सुर्खियां बनता है. यानी 3 बजे के बाद वाले प्रदर्शन का इम्पैक्ट लगातार दो दिनों तक बना रहता है.
दोपहर 3 बजे के बाद: अचानक प्रदर्शन की घोषणा होती है, जिसे टीवी और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर ब्रेकिंग न्यूज़ के तौर पर जगह मिलती है.
शाम 4 से 5 बजे तक: ऑन-ग्राउंड प्रदर्शन और पुलिस बंदोबस्त की लाइव कवरेज चलती है.
शाम 5 से 6 बजे तक: बैरिकेडिंग, नारेबाजी और सड़क पर धरने की विजुअल्स सोशल मीडिया और चैनलों पर छा जाते हैं.
शाम 6 से 7 बजे तक: हिरासत, नेताओं के तीखे बयान और आरोप-प्रत्यारोप को प्रमुखता मिलती है.
शाम 7 बजे के बाद: यह पूरा घटनाक्रम प्राइम टाइम डिबेट और विश्लेषण का मुख्य विषय बन जाता है. विमर्श के केंद्र में केवल कांग्रेस और उसका प्रदर्शन रहता है.
कांग्रेस के प्रदर्शन में सिर्फ टाइमिंग का रणनीतिक बदलाव नहीं हुआ है, बल्कि विजुअल नैरेटिव पर भी पूरा जोर है. 6 अक्टूबर को राहुल गांधी का पुलिस बैरिकेड पर चढ़कर तिरंगा लहराना और फिर आकाशवाणी भवन में धरने पर बैठना ऐसी तस्वीरें थीं, जिन्हें मेनस्ट्रीम और डिजिटल मीडिया ने बार-बार दिखाया. वहीं 7 अक्टूबर को प्रियंका गांधी का सड़क पर बैठकर विरोध जताना दिन की सबसे चर्चित तस्वीर बन गई.
आज भी इसी रणनीति के तहत विपक्ष का प्रदर्शन दोपहर 3 बजकर 30 मिनट पर शुरू हुआ. कनॉट प्लेस से विपक्षी नेता राजघाट के लिए रवाना हुए. जैसे ही मोएट्स रेस्तरां में लंच खत्म हुआ, विरोध मार्च शुरू हो गया.
आज राजघाट पर प्रदर्शन होना था और बसों का इंतजाम पहले से था. बस की अगली सीट पर मल्लिकार्जुन खरगे के साथ राहुल गांधी बैठे, जबकि प्रियंका गांधी दूसरी सीट पर के. सी. वेणुगोपाल के साथ बैठीं. बस में सवार होने से पहले खरगे और राहुल गांधी ने सरकार पर तीखा हमला बोला और कहा कि विपक्ष को शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लोकतांत्रिक अधिकार से रोका जा रहा है.
कनॉट प्लेस से राजघाट तक सुरक्षा के कड़े इंतजाम थे. विपक्षी नेताओं के पहुंचने से पहले ही कार्यकर्ता वहां जुटने लगे थे. राजघाट पहुंचने पर पुलिस ने खरगे, राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं को कुछ देर रोका, लेकिन करीब एक घंटे बाद उन्हें अंदर जाने की अनुमति मिल गई.
कांग्रेस की रणनीति में सिर्फ समय और आक्रामक तेवर ही नहीं, बल्कि रेस्तरां और प्रदर्शन स्थल का चुनाव भी पूरी प्लानिंग के साथ हो रहा है.
7 अक्टूबर को एक दक्षिण भारतीय रेस्तरां को लंच के लिए चुना गया, जो जंतर-मंतर से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर था. लंच के बाद नेता आसानी से पैदल ही जंतर-मंतर की ओर बढ़ गए. वहीं आज कनॉट प्लेस का एक अन्य रेस्तरां चुना गया, जहां से राजघाट की दूरी लगभग 10 किलोमीटर थी.
लंच और प्रदर्शन के लिए ऐसी जगहें चुनी गईं जो कनेक्टिविटी के लिहाज से मुफीद हों, ताकि कार्यकर्ता बिना किसी परेशानी के पहुंच सकें. जंतर-मंतर और राजघाट दोनों ही मेट्रो नेटवर्क से अच्छी तरह जुड़े हैं. यानी हर एक कदम जमीनी पहुंच को ध्यान में रखकर उठाया गया.
वोट चोरी के नैरेटिव और दोपहर 3 बजे वाले इस प्रदर्शन मॉडल पर बीजेपी की भी पैनी नजर है. बीजेपी का आरोप है कि कांग्रेस विरोध प्रदर्शन के बहाने राजधानी में अव्यवस्था और अराजकता फैला रही है.
पहले दिन दक्षिण भारतीय रेस्तरां और दूसरे दिन उत्तर भारतीय रेस्तरां...कांग्रेस ने खानपान के जरिए दक्षिण से उत्तर भारत तक का प्रतीकात्मक सफर तय किया. आज रेस्तरां के खाने के साथ-साथ मेजबान मल्लिकार्जुन खरगे का एक खास 'पॉलिटिकल मेन्यू' भी था:
स्टार्टर (विपक्षी एकजुटता): खरगे ने दोनों सदनों के सभी विपक्षी सांसदों को न्योता दिया था. कल गैरहाजिर रही समाजवादी पार्टी के नेता आज पहुंचे. संदेश साफ था कि यह आंदोलन सिर्फ कांग्रेस का नहीं, बल्कि पूरे विपक्ष का साझा मोर्चा है.
सूप (वोट चोरी और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल): इस मुद्दे पर सभी विपक्षी दलों की सहमति रही. अब बात सिर्फ सीईसी के इस्तीफे तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं.
मेन कोर्स (सीईसी ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा): यह विपक्ष की राजनीतिक थाली का मुख्य एजेंडा है. रणनीति यह है कि एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की जवाबदेही तय कर सरकार पर सीधा दबाव बनाया जाए.
साइड डिश (पुलिस बनाम विपक्ष की तकरार): नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ पुलिस के टकराव को 'लोकतंत्र के हनन' से जोड़ा जा रहा है, ताकि यह संदेश जाए कि सरकार विपक्ष की आवाज दबा रही है.
डेजर्ट (राष्ट्रपति से मुलाकात): 10 विपक्षी सांसदों के प्रतिनिधिमंडल को राष्ट्रपति से मिलने का समय मिला है, जिसमें राहुल गांधी, खरगे, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव और ममता बनर्जी जैसे प्रमुख चेहरे शामिल हो सकते हैं.
दक्षिण से उत्तर भारतीय रेस्तरां का यह चयन केवल स्वाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक राजनीतिक सिंबल है. कांग्रेस ने विपक्ष की एक 'साझा थाली' पेश की है, जिसमें यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि अलग-अलग राज्यों और विचारों के दल एक ही राजनीतिक मेज पर एकजुट हैं.
कनॉट प्लेस में रेस्तरां के बाहर जब कांग्रेस कार्यकर्ता जमा थे, उसी दौरान एक युवक के साथ हाथापाई की घटना सामने आई. युवक की पहचान फहीम नजीर के रूप में हुई, जो मूल रूप से श्रीनगर (कश्मीर) का रहने वाला है. फहीम ने मौके पर पहुंचकर पीएम मोदी के समर्थन में नारे लगाए और ईवीएम पर विपक्ष के रुख पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब विपक्ष चुनाव जीतता है तब ईवीएम पर सवाल नहीं उठते. उनके इस विरोध के बाद वहां मौजूद कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ तीखी बहस हुई, जो देखते ही देखते मारपीट में तब्दील हो गई.