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DNA : भारत और जापान शांतिप्रिय और जिम्मेदार देश हैं. लेकिन, अपनी संप्रभुता, नागरिकों और सीमाओं को सुरक्षित रखने के लिए दोनों देश अपनी रक्षा तैयारियों को भी मजबूत कर रहे हैं. दूसरी तरफ दुनिया मे कुछ ताकतें ऐसी भी हैं. जो विस्तारवादी और आतंकी मानसिकता रखती हैं. कुछ ताकतें ऐसी भी हैं जिनके लिए युद्ध ज्यादा लाभदायक है. ऐसे देश अपने गोदामों में हथियारों का जखीरा इकट्ठा कर रहे हैं और दुनिया में युद्ध का उन्माद फैला रहे हैं. जिसका खामियाजा विश्व की बड़ी आबादी को भुगतना पड़ रहा है. दुनिया में इस समय रुक-रुककर ही सही लेकिन एकसाथ 5 युद्ध हो रहे हैं.
मिडिल ईस्ट का वॉर-जोन इस वक्त 45 लाख वर्ग किलोमीटर का वो विशाल बारूदी ढेर बन गया है, जहां सिर्फ मिसाइलें. ड्रोन और बम नहीं गिर रहे, बल्कि ग्लोबल इकॉनमी और तेल की लाइफ-लाइन भी दांव पर लगी है. इस इलाके में इरान के अलावा यमन सऊदी अरब, इराक, लेबनान, सीरिया और गाजा सीधे संघर्ष की चपेट में हैं. इसके साथ साथ फारस की खाड़ी, लाल सागर और अदन की खाड़ी का वो पूरा समुद्री क्षेत्र संघर्ष के दायरे में है. जहां-जहां अमेरिकी युद्धपोत तैनात हैं. आज ही यानी 21 सितंबर को ईरान ने धमकी दी है. अब मिडिल ईस्ट में अमेरिका का सहयोग करने वाली ताकतें भी ईरान के निशाने पर हैं.
इसके अलावा पूर्वी यूरोप में रूस-यूक्रेन युद्ध का दायरा बढ़ रहा है. यूक्रेन का कुल क्षेत्रफल लगभग 6 लाख वर्ग किलोमीटर है. ये पूरी तरह से हवाई हमलों और ड्रोन हमलों की रेंज में है. इसके अलावा पश्चिमी रूस का 2 से 3 लाख वर्ग किलोमीटर का इलाका जिसमें मॉस्को, कुर्स्क, बेलगोरोद और काला सागर के कुछ हिस्से शामिल हैं. वहां, रोजाना मिसाइलें और ड्रोन दागे जा रहे हैं. दक्षिण एशिया में पाकिस्तान और अफगानिस्तान सीमा पर भी युद्ध जैसी स्थिति है. ये लगभग 3 लाख वर्ग किलोमीटर का इलाका है.
अफगानिस्तान में पाकिस्तान की एयर स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा और वजीरिस्तान के पहाड़ी इलाके सीधे तौर पर हवाई हमलों, तोपखाने की गोलाबारी और टीटीपी के हमलों के निशाने पर आ गई हैं. इसके अलावा पूर्वी एशिया में कोरियाई प्रायद्वीप और जापान सागर में भी लगभग 3 से 4 लाख वर्ग किलोमीटर के इलाके में तनाव बढ़ गया है. यहां नॉर्थ कोरिया लगातार अपनी शॉर्ट-रेंज और इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलें दाग रहा है यानी जापानी इकोनॉमिक जोन का एक बड़ा हिस्सा अब मिसाइल टेस्टिंग ग्राउंड बन चुका है. इन सभी मोर्चों में जहां जहां लगातार मिसाइलें गिर रही हैं या फिर किसी भी वक्त गिर सकती हैं. इनका कुल क्षेत्र लगभग 60 लाख वर्ग किलोमीटर का है. ये इलाका कितना बड़ा है. इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि इसमें इजरायल जैसे 270 देश बन सकते हैं.
इन युद्धक्षेत्रों के अलावा नॉर्थ कोरिया ने एक साथ 2 शॉर्ट-रेंज बैलिस्टिक मिसाइलें फायर करके पूर्वी एशिया में भी तनाव बढ़ा दिया है. किम जोंग की दो मिसाइलों में से एक मिसाइल सीधे जापान के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक ज़ोन के समुद्री क्षेत्र में जाकर गिरी. किम जोंग के इस दुस्साहस के बाद जापान और साउथ कोरिया ने कड़ी नाराज़गी जताई. ये दोनों देश जानते हैं, कि नॉर्थ कोरिया के पास खोने के लिए कुछ नहीं है और इसलिए वो जानबूझकर जंग के लिए भड़काता है.
युद्ध कहां कहां चल रहा है. आपको इस सवाल का जवाब तो मिल गया. लेकिन, अब आपको समझना चाहिए, इन युद्धों का बिल आखिर कौन भरेगा तो इसका है जवाब है. ये बिल सिर्फ युद्ध लड़ने वाले देश नहीं सारी दुनिया भरेगी अगर ईरान और अमेरिका लड़ रहे हैं. रूस और यूक्रेन की वॉर चल रही है तो इसका असर प्रत्य़क्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दुनिया के 2 अरब से ज्यादा लोगों पर पड़ रहा है. जो विस्थापन, महंगाई या सीधे युद्ध क्षेत्र में जान का जोखिम उठाने को मजबूर हैं.
एक अनुमान के मुताबिक इन युद्धों की वजह से ग्लोबल इकॉनमी को सालाना लगभग 17 ट्रिलियन डॉलर का बड़ा नुकसान हो रहा है. दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी महाशक्ति चीन की कुल सालाना जीडीपी लगभग 18 ट्रिलियन डॉलर है यानी युद्ध और हिंसा से होने वाला नुकसान लगभग चीन की एक साल की कुल कमाई के बराबर है. दुनिया हर मिनट युद्ध की तैयारियों पर करीब 46 करोड़ रुपये फूंक रही है यानी दुनिया का हर इंसान सालाना 29 हजार रुपये इस युद्ध की कीमत के तौर पर चुका रहा है. दुनिया भर के देश आज सिर्फ हथियारों पर लगभग 3 ट्रिलियन डॉलर की रकम खर्च कर रहे हैं यानी जो पैसा अस्पतालों, स्कूलों, रिसर्च और क्लाइमेट चेंज से निपटने के लिए रखा गया था. आज वह देशों की सेनाओं को आधुनिक बनाने और नई मिसाइलें खरीदने में फूंका जा रहा है.
लाल सागर में हूती हमलों के कारण जहाजों को स्वेज नहर की बजाय पूरा अफ्रीका घूमकर जाना पड़ रहा है. इससे एक मालवाहक कंटेनर का भाड़ा जो पहले लगभग 1,500 डॉलर था, वो कई रूटों पर बढ़कर 5,000 डॉलर के पार पहुंच गया है. होर्मुज के रास्ते दुनिया का 20% तेल गुजरता था. लेकिन, युद्ध की वजह से रोज़ाना 125 जहाजों के बजाय इस पूरे हफ्ते सिर्फ 17 जहाज गुजरे हैं. जिसकी वजह से कई एशियाई देशों में पेट्रोल और गैस के लिए लंबी कतार लग गई हैं.
मिडिल ईस्ट के साथ साथ रूस-यूक्रेन वॉर भी दुनिया को प्रभावित कर रही है. यूरोप भी एक साथ ऊर्जा के दो वैश्विक केंद्रों पर एक साथ छिड़े युद्ध की बड़ी कीमत चुकाने को मजबूर है. रूस की रिफाइनरियों पर ड्रोन हमलों और मिडिल ईस्ट की अस्थिरता के चलते यूरोप में डीजल की कीमतें 210 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुकी हैं. डीजल महंगा होने से खेती और माल ढुलाई की लागत 25% तक बढ़ गई है. मिडिल ईस्ट से तेल की सप्लाई प्रभावित होने के कारण यूरोप में जेट फ्यूल की भारी कमी हो गई है. यूरोप में रोजाना करीब 5 लाख बैरल जेट फ्यूल की कमी हो रही है. बड़े एयरपोर्ट्स पर विमान ईंधन का स्टॉक 7 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है. अगर युद्ध नहीं रुका तो यूरोप में हवाई टिकट के दाम 30% बढ़ सकते हैं. रूस-यूक्रेन दुनिया का लगभग 30% गेहूं और 70% सूरजमुखी का तेल सप्लाई करते थे. सप्लाई चेन टूटने से अफ्रीका से लेकर एशिया तक खाद्य महंगाई में औसतन 15% से 20% का उछाल आया है. रूस दुनिया के सबसे बड़े खाद निर्यातकों में से एक है. युद्ध और प्रतिबंधों के कारण ग्लोबल मार्केट में फर्टिलाइजर की भारी कमी हो गई है. खाद न मिलने से दुनिया भर के किसानों की पैदावार घट रही है, जिसका मतलब है कि आने वाले वर्षों में अनाज और भी ज्यादा महंगा होगा.
दुनिया में चल रहे युद्धों की वजह से हर 70 में से 1 इंसान बेघर हुआ है. अब तक 11 करोड़ से ज्यादा लोग अपना घर छोड़ने को मजबूर हो चुके हैं और 3 लाख से ज्यादा लोग लापता हैं यानी इनके परिवार को पता ही नहीं. ये जिंदा हैं या फिर मर गए. दुनिया इन युद्धों की बड़ी कीमत चुका रही है. एशिया, यूरोप, अफ्रीका और खुद अमेरिका भी युद्ध की त्रासदी झेल रहा है. इसके बावजूद इन युद्धों के खत्म होने के आसार नजर नहीं आ रहे.