चीतों की सुरक्षा पर करोड़ों खर्च, 24 घंटे निगरानी और 5 लेयर का पहरा, फिर भी KNG-22 को किसने मारी गोली?
कूनो नेशनल पार्क में 19 महीने के चीते KNG-22 को गोली मार दी गई, जिससे इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई. करोड़ों के प्रोजेक्ट और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठे हैं.
आज हम आजाद भारत के पहले चीते की हत्या का DNA टेस्ट करेंगे. 4 साल पहले सरकार ने भारत में विलुप्त हो चुके चीतों को बसाने और संरक्षित करने के लिए 'प्रोजेक्ट चीता' शुरू किया था. नामीबिया, दक्षिण अफ्रीका और बोत्सवाना से चीते भारत लाए गए. मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में उन्हें विशेष देख-रेख में रखा गया. चीतों का परिवार बढ़े, महफूज हो, इसके लिए अभेद्द सुरक्षा दीवार बनाई गई. 24 घंटे निगरानी के लिए सैटेलाइट और जीपीएस ट्रैकिंग टीम तैयार की गई.
इसके बावजूद 25 अक्टूबर को सिर्फ 19 महीने के एक चीते को गोली मार दी गई. जिसकी कल इलाज के दौरान मौत हो गई. प्रोजेक्ट चीता शुरू होने के बाद ये पहली घटना है, जब चीते को गोली मारी गई. यह आजाद भारत में किसी चीते की पहली हत्या है. इस चीते का कोड नेम KNG-22 था.
केंद्र सरकार ने भी दिए जांच के आदेश
इस मामले में केंद्र सरकार ने बेहद गंभीर रुख अपनाया है. चीते की हत्या की जांच के लिए हाई लेवल सेंट्रल टीम को मध्य प्रदेश भेजा गया है. ये टीम मध्य प्रदेश वन विभाग और STF के साथ मिलकर जांच कर रही है. टीम में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के वन महानिरीक्षक, वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो के अतिरिक्त निदेशक और वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो के क्षेत्रीय उपनिदेशक को शामिल किया गया है.
ये टीम जांच करेगी कि चीते की हत्या किन हालात में हुई. हत्या से जुड़े सारे सबूतों की पड़ताल की जाएगी. केंद्र सरकार की टीम मध्य प्रदेश वन विभाग के साथ चीतों की सुरक्षा से जुड़े कोऑर्डिनेशन, सिक्योरिटी प्रोटोकॉल और मॉनिटरिंग सिस्टम की समीक्षा करेगी ताकि भविष्य में ऐसी घटना ना हो.
जांच के बाद हाई लेवल सेंट्रल टीम अपनी फाइंडिंग और सिफारिशें केंद्र सरकार को सौंपेगी. रिपोर्ट के आधार पर मध्य प्रदेश सरकार, फील्ड अथॉरिटी और प्रोजेक्ट चीता से जुड़ी दूसरी एजेंसियों को आगे का प्रोटोकॉल तय करने का निर्देश दिया जाएगा. जांच के साथ ही श्योपुर और मुरैना बॉर्डर पर चीते को गोली मारने वालों की तलाश के लिए सर्चिंग भी हो रही है. हमारे संवाददाता प्रमोद शर्मा आज श्योपुर के नितिनवास जंगल पहुंचे. यहीं सर्चिंग हो रही है. ग्राउंड से प्रमोद शर्मा की वीडियो रिपोर्ट आज आपको जरूर देखनी चाहिए.
आपको आश्चर्य हो रहा होगा कि एक चीते की हत्या को लेकर केंद्र सरकार इतनी गंभीर क्यों हैं. सिर्फ सरकार को नहीं हम सभी को गंभीर होना चाहिए. क्योंकि ये सिर्फ एक चीते की हत्या नहीं है. एक विलुप्त हो चुके वन्यजीव को संरक्षित करने के प्रयास पर प्रतिघात है. ये चीतों के लिए सुरक्षित माहौल तैयार करने की योजना को डिरेल करने की साजिश है. ये भारत में वन्यजीव विविधता को बढ़ाने के प्रोजेक्ट पर दुस्साहसिक हमला है. इस साजिश को समझने के लिए पहले समझना होगा कि 19 महीने के शावक KNG-22 के साथ हुआ क्या था.
25 अक्टूबर को श्योपुर टेरिटोरियल फॉरेस्ट डिवीजन के कंपार्टमेंट नंबर 748 के पास शावक KNG-22 घायल मिला. ये इलाका चीतों के लिए संरक्षित कूनो प्रोटेक्टेड एरिया से बाहर है. आमतौर पर चीते घूमते हुए संरक्षित एरिया से बाहर निकल जाते हैं. घायल शावक को जबलपुर वेटनरी फैसिलिटी ले जाया गया. सर्जरी की गई. सर्जरी में शरीर से 5 फायरआर्म पैलेट यानी बंदूक के छर्रे निकाले गए. इससे पुष्टि हुई कि चीते को गोली मारी गई थी. तमाम कोशिश के बाद भी 27 अक्टूबर को उसकी मौत हो गई. बड़ा सवाल ये है, पांच-पांच लेयर की सुरक्षा और सैटेलाइट सिक्योरिटी के बाद भी, चीते तक हमलावर पहुंचा कैसे?
महात्मा गांधी का विचार है कि किसी राष्ट्र की महानता और उसके नैतिक विकास का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि वहां जानवरों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है.
1947 में देश चीता विहीन हो गया था
वन्यजीवों से निर्मम और हिंसक व्यवहार के कारण 1947 में देश चीता विहीन हो गया था. छत्तीसगढ़ के कोरिया रियासत के महाराजा रामानुज प्रताप सिंह देव ने आखिरी तीन नर चीतों का शिकार किया था. 1952 में चीतों को विलुप्त घोषित किया गया. 70 साल बाद 2022 में चीतों को भारत लाया गया. उन्हें आबाद किया गया. लेकिन शावक KNG-22 के साथ जो हुआ उससे संरक्षित प्रजाति की सुरक्षा पर गंभीर प्रश्नचिह्न है. क्यों, क्योंकि कूनो नेशनल पार्क में हर चीते के लिए एक मॉनिटरिंग टीम है. ये टीम लगातार रेडियो कॉलर के सिग्नल के जरिए चीते पर नजर रखती है. सवाल ये है कि रेडियो कॉलर के सिग्नल को ट्रैक करने में कहां और कैसे चूक हुई. जानते हैं चीतों को गोली मारनेवाले ने कितने मजबूत सुरक्षा तंत्र को तोड़ा है. बहुत गौर से समझिएगा.
- कूनो में 100 से अधिक ट्रैकर्स और सुरक्षाकर्मियों की टीम है, जो 24 घंटे चीतों की रियल-टाइम निगरानी करती है.
- जब कोई चीता खुले जंगल में घूमता है, तो उसके पीछे सुरक्षाकर्मियों और वन रक्षकों की 9 सदस्यों की टीम होती है.
- एक डेडिकेटेड दल लगातार सैटेलाइट कॉलर और जीपीएस के जरिए मॉनिटरिंग करता है. यानी 24 घंटे चीते पर डिजिटल नजर रखी जाती है.
- कूनो के आसपास के इलाके के 400 से ज्यादा चीता मित्र हैं जो सुरक्षा तंत्र में मदद करते हैं.
- कूनो में 24 घंटे काम करने वाले सीसीटीवी कैमरे, नाइट-विजन और साइलेंट ड्रोन का एक बड़ा आधुनिक नेटवर्क है.
यानी आसमान से जमीन तक हर चीते की रक्षा के लिए बेहद हाईटेक 5 लेयर का सुरक्षा तंत्र है. ये बहुत गंभीर खतरा है कि है कि 5 लेयर के मजबूत सुरक्षा घेरे को भेदकर एक चीते को गोली मार दी गई.
इसलिए ये बहुत गंभीर मुद्दा है. बड़ी लापरवाही है. सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर शिकारियों को शावक चीते की लोकेशन मिली कैसे और कूनो नेशनल पार्क और आसपास के जंगलों में शिकारियों का नेटवर्क कितना एक्टिव है. कई बार जब जानवर भटक कर रिहायशी इलाकों में चले जाते हैं, तो लोग पटाखा फोड़कर उन्हें आबादी से दूर करते हैं, लेकिन यहां पटाखा नहीं फोड़ा गया. सीधे गोली मारी गई. इसलिए ये माना जा रहा है चीते को शिकार की नियत से ही गोली मारी गई थी. कूनो, श्योपुर और मुरैना के आसपास के जंगल पहले भी शिकार से जुड़ी जांच के केंद्र में रहे हैं.
- जुलाई से अगस्त 2026 यानी दो महीने पहले कूनो बेल्ट में तेंदुए के शिकार के आरोप में 15 संदिग्धों की गिरफ्तारी हुई थी.
- संदिग्धों ने 10 तेंदुओं के शिकार का जुर्म कबूल किया था. कूनो से 6, श्योपुर से 2 और चंबल-मुरैना से 2 तेंदुओं का शिकार किया गया था.
- आरोपियों से तेंदुओं की खाल और अवशेष बरामद किए गए थे.
- इन शिकारियों का नेटवर्क मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और दिल्ली तक फैला था.
तेंदुओं की हत्या में सबसे डराने वाले बात यह थी कि शिकार, कूनो श्योपुर और मुरैना के उस इलाके से किया गया था, जो 'चीता लैंडस्केप' में आता है. यानी इस इलाके को चीतों के लिए संरक्षित किया गया है. इसी सुरक्षित इलाके में पहले तेंदुओं का शिकार हुआ अब एक चीते को गोली मारी गई है. जब तक हम यह नहीं समझेंगे कि हमारे इस छोटे से ग्रह पर जीवन का हर रूप एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है, तब तक हम पर्यावरण को नहीं बचा सकते.
पर्यावरण को संरक्षित रखने के लिए बैलेंस बहुत जरूरी है. पर्यावरण संतुलन को मजबूत करने के लिए ही 7 दशक बाद चीतों को भारत लाया गया. मजबूत सुरक्षा तंत्र बनाया गया. आपके मन में जिज्ञासा होगी कि आखिर शिकारियों ने इतना बड़ा खतरा क्यों उठाया. इसकी वजह है लालच और पैसा जानते हैं.
कितना बड़ा ही वन्यजीवों की तस्करी का सिंडिकेट
इंटरपोल की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में जानवरों के अंगों की तस्करी का सिंडिकेट सालाना करीब 3 लाख करोड़ रुपए का है. ये रकम कितनी बड़ी है, इसे ऐसे समझिए कि दुनिया के 55 छोटे देश एक साल में मिलकर जितना पैसा बनाते हैं. यानी उनकी GDP जितनी है, उससे ज्यादा कमाई वन्यजीव तस्कर एक साल में करते हैं. वन्यजीवों की तस्करी दुनिया का चौथा सबसे बड़ा संगठित अंतरराष्ट्रीय अपराध सिंडिकेट है.
म्यांमार, लाओस और थाईलैंड के कुछ इलाके दुनिया में अवैध वन्यजीवों का सबसे बड़ा सुपरमार्केट है. अब अगला सवाल ये है कि जानवरों का शिकार क्यों होता है. उन्हें क्यों मारा जाता है. जानवर की हत्या के बाद उनके हर अंग और अवशेष को इंटरनेशनल मार्केट में महंगे दाम पर बेचा जाता है.
चीते अंगों के क्या-क्या प्रयोग हैं और किन देशों में हैं
- चीते की खाल से कोट और फर्नीचर कवर बनाए जाते हैं. यूरोप, अमेरिका में महंगी कीमत पर इन्हें बेचा जाता है.
- चीते की हड्डियों और कंकाल का इस्तेमाल कई देशों में औषधि, दर्द निवारक लेप बनाने में किया जाता है. चीन, वियतनाम, लाओस इसका बड़ा बाजार है.
- दांत, नाखून और पंजों का प्रयोग महंगे पेंडेंट और ताबीज बनाने में होता है.
- बाल से चाबुक और सिर का मुकुट बनाया जाता है. अफ्रीकी देशों में खासतौर पर इसकी डिमांड होती है.
- मांस से पारंपरिक सूप और दवाएं बनाई जाती हैं. चीन, वियतनाम और अफ्रीकी देशों में इसकी बहुत मांग होती है.
बाघ/तेंदुए के कंकाल की कीमत 50 लाख डॉलर
चीन के ब्लैक मार्केट में एक वयस्क बाघ या तेंदुए के कंकाल की कीमत 50 हजार डॉलर यानी करीब 48 लाख रुपए से ज्यादा हो सकती है. बाकी अंगों की कीमत इससे अलग है. पैसों के इसी लालच में शिकारी वन्यजीवों का संहार करते हैं. लोभ से ग्रस्त शिकारियों से चीतों को बचाने और उन्हें सुरक्षित करने के लिए 2022 में प्रोजेक्ट चीता की शुरुआत हुई थी. राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण और भारतीय वन्यजीव संस्थान को प्रोजेक्ट के लिए नोडल एजेंसी बनाया गया. जिस शावक को गोली मारी गई वो भी प्रोजेक्ट चीता का हिस्सा था. आज आपको प्रोजेक्ट चीता के बारे में भी जानना चाहिए.
किस देश से कितने चीते लाए गए भारत?
देश में जैव विविधता को बढ़ावा देने के लिए प्रोजेक्ट चीता के तहत सबसे पहले 17 सितंबर 2022 को नामीबिया से 8, 18 फरवरी 2023 को दक्षिण अफ्रीका से 12 और 28 फरवरी 2026 को बोत्सवाना से 9 चीते भारत लाए गए. देश में अभी कुल 58 चीते हैं, इनमें से 41 चीते भारत में जन्मे हैं. इनमें से कुछ चीतों की अलग अलग कारणों से मौतें हुई है. फिलहाल कूनो नेशनल पार्क में 52, मंदसौर-नीमच के गांधी सागर अभ्यारण्य में 4 और नौरादेही क्षेत्र में 2 चीते हैं.
प्रोजेक्ट चीता पर कितना खर्च होता है?
अब प्रोजेक्ट चीता पर हुए खर्च को भी समझते है. नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी के ऑफिशियल रिकॉर्ड के मुताबिक प्रोजेक्ट चीता पर अब तक 112 करोड़ से ज्यादा की रकम खर्च हो चुकी है.
- पहले चरण में 5 साल के लिए केंद्र सरकार ने करीब 92 करोड़ के बजट का अनुमान लगाया था.
- इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन ने कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत 50 करोड़ का योगदान किया.
- इस पैसे में से 112 करोड़ रुपए का निवेश चीतों के लिए बुनियादी ढांचा, बाड़ा बनाने और सुरक्षा उपकरणों पर किया गया.
देश में अभी 58 चीते हैं. यानी एक चीते के लिए बुनियादी सुविधाएं जुटाने के लिए करीब 1 करोड़ 90 लाख रुपए खर्च किया गया है. ये तो एकमुश्त खर्च है. अब रोज होने वाले खर्च को भी समझिए. मध्य प्रदेश सरकार ने विधानसभा में बताया है कि कूनो में रह रहे चीते के लिए प्रतिदिन लगभग 35000 के बकरे का मांस खरीदा जाता है. यानी सालभर में एक चीते की डाइट पर ही करीब 1 करोड़ 27 लाख रुपए खर्च होता है.