DNA : ब्रिक्स में जिनपिंग पर आने पर सस्पेंस क्यों है? क्या भारत-रूस ने बिगाड़ा चीन का खेल
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के दिल्ली आने की तारीख भी तय हो चुकी है. लेकिन, शी जिनपिंग के आने का समय अभी भी तय नहीं हुआ है. वो दिल्ली आएंगे या नहीं आएंगे. ये सवाल, अपने आप में एक सस्पेंस बना हुआ है.
BRICS SUMMIT 2026 : अमेरिका से जारी युद्ध के बावजूद ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान समय निकालकर ब्रिक्स सम्मेलन के लिए भारत आ रहे हैं. यहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी अलग से मीटिंग भी होनी है. जाहिर है, बात जंग रोकने पर भी होगी. सोचिए, 12 और 13 सितंबर के बीच भारत में ब्रिक्स समिट होनी है. लेकिन, अब तक चीन ये तय नहीं कर पाया है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल होंगे या नहीं.
आज से तकरीबन 10 दिन पहले किर्गिस्तान के बिश्केक में SCO की बैठक हुई थी. ये दो दिवसीय बैठक 31 अगस्त और 1 सितंबर को हुई थी. चीन ने जिनपिंग के आने की घोषणा बैठक से पांच दिन पहले यानी 26 अगस्त को कर दी थी. जिनपिंग भी एक दिन पहले यानी 30 अगस्त को बिश्केक पहुंच गए थे. दूसरी तरफ दो दिन बाद SCO से ज्यादा महत्वपूर्ण ब्रिक्स का सम्मेलन होना है. लेकिन, अब तक चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग के आने को लेकर कोई खबर या पुष्टि नहीं है.
अभी तक जिनपिंग के शामिल होने पर कोई अधिकारिक बयान नहीं
ब्रिक्स में जिनपिंग के शामिल होने पर कोई अधिकारिक बयान नहीं आया है. लेकिन, चीन की मीडिया में दिल्ली की ब्रिक्स समिट को लेकर चर्चा जारी है. सबसे पहले चीन की सरकार के माउथपीस यानी ग्लोबल टाइम्स की बात करते हैं. ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है - सदस्य देशों के बीच सहयोग के लिए ब्रिक्स एक महत्वपूर्ण मंच है. हालिया, समिट में भारत की मेजबानी भी बहुत महत्वपूर्ण है. चीन की समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने लिखा है - भारत और चीन प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि पार्टनर हैं. ब्रिक्स समिट में चीन के वरिष्ठ प्रतिनिधियों और भारतीय प्रतिनिधियों के बीच सकारात्मक संवाद होगा. भारत में चीन के राजदूत ज़ू फाईहॉन्ग ने एक संपादकीय में लिखा है- भारत के नेतृत्व की वजह से ब्रिक्स में सकारात्मक सहयोग बढ़ेगा. भारत और चीन के बीच सभी मुद्दों पर महत्वपूर्ण बातचीत भी होगी.
ब्रिक्स में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका
भारत और चीन के बीच सकारात्मक संवाद. ऐसे शब्दों का प्रयोग चीन के हर प्रमुख मीडिया हाउस ने किया है. लेकिन, जिनपिंग भारत आएंगे या नहीं. इसे लेकर किसी ने कुछ नहीं लिखा है. यहां तक कि किसी भी संपादकीय या रिपोर्ट में शी जिनपिंग का नाम तक प्रमुखता के साथ नहीं लिखा गया है. इन सभी आकलनों के बीच चीन के प्रसिद्ध अखबार CGTN का भी एक लेख सामने आया है. ये लेख जिनपिंग को लेकर कुछ संकेत जरूर देता है.
इस लेख में कहा गया है - दिल्ली में होने वाली ब्रिक्स समिट में सभी सदस्य अपने आर्थिक लेन-देन की प्रक्रिया को आसान और तेज बनाने पर जोर देंगे. ब्रिक्स सदस्य कोई नई करेंसी नहीं बनाना चाहते. भारत पहले ही साफ कर चुका है कि ब्रिक्स सदस्यों के बीच मौजूदा पेमेंट सिस्टम के जरिए ही लेन-देन होना चाहिए. इसके लिए देशों की सेंट्रल डिजिटल करेंसी का इस्तेमाल होना चाहिए. किसी नई मुद्रा को बनाने पर भारत सहमत नहीं है.
ब्रिक्स की जिस करेंसी का जिक्र चीन के अखबार ने किया है. उसे लेकर ब्रिक्स के सदस्यों से भी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं. भारत ने एक बार फिर खुलकर ब्रिक्स की साझा करेंसी का विरोध किया है. दूसरी तरफ अब रूस ने भी भारत जैसा ही मत सामने रखा है. आपको इन प्रतिक्रियाओं को गौर से देखना और सुनना चाहिए. ताकि आप जिनपिंग के दिल्ली आने से जुड़े सस्पेंस को बेहतर तरीके से समझ पाएं.
क्या है शी जिनपिंग की समस्या?
ब्रिक्स की कॉमन करेंसी के लिए सहमति ना बन पाना. यही शी जिनपिंग की सबसे बड़ी दिक्कत है. पहले भारत ने इस प्लान पर असहमति जताई थी. अब रूस भी भारत के रुख का समर्थन कर रहा है. यहां ये भी समझना जरूरी है कि ब्रिक्स की करेंसी में जिनपिंग का कौनसा फायदा छिपा है, और भारत को इस प्लान पर क्या ऐतराज है. चीन चाहता है कि ब्रिक्स के सभी सदस्य देश एक कॉमन करेंसी का इस्तेमाल करें. दूसरी तरफ भारत चाहता है कि कॉमन करेंसी ना बनाई जाए. उसकी जगह सदस्य देश अपनी करेंसी में लेन-देन करें या फिर लेन-देन की किसी और साझा प्रक्रिया पर सहमत हो जाएं. चीन का प्लान है -अगर ब्रिक्स की कॉमन करेंसी का इस्तेमाल किया गया तो ब्रिक्स सदस्यों के बीच डॉलर की डिमांड कम होगी और अमेरिकी डॉलर कमजोर होगा.
दूसरी तरफ भारत ये बखूबी जानता है कि ब्रिक्स में चीन सबसे ज्यादा व्यापार करने वाला सदस्य है. अगर कॉमन करेंसी का इस्तेमाल हुआ तो सबसे ज्यादा सबसे ज्यादा कॉमन करेंसी चीन की तिजोरी में आएगी, जो भारत के आर्थिक हितों के लिए हानिकारक साबित हो सकता है.
कॉमन करेंसी के इसी मुद्दे को जिनपिंग की यात्रा पर बने संशय की सबसे बड़ी वजह माना जा रहा है. जिनपिंग नहीं चाहते कि उनकी मौजूदगी में चीन के प्लान का विरोध हो. कूटनीति की भाषा में ऐसे कदम को फेस सेविंग कहा जाता है यानी जहां आवाज दबने का डर हो. उस मौके या आयोजन से नदारद हो जाओ. ये सिर्फ एक थ्योरी नहीं है. ब्रिक्स से जुड़ी घटनाएं और जिनपिंग के कदमों की क्रोनोलॉजी भी इस थ्योरी को प्रमाणित करते हैं.
कॉमन करेंसी का कब विरोध हुआ?
भारत ने पहली बार ब्रिक्स की कॉमन करेंसी का विरोध वर्ष 2023 में किया था. दिल्ली में भारत सरकार के प्रतिनिधियों ने एक प्रेस कांफ्रेंस के जरिए अपना ऐतराज जाहिर किया था. 2023 में ही दक्षिण अफ्रीका में ब्रिक्स समिट हुई थी. इस समिट में जिनपिंग शामिल हुए थे, लेकिन ऐन मौके पर जिनपिंग ने अपना भाषण कैंसिल कर दिया था. माना गया था कि भाषण कैंसिल करके जिनपिंग ने कॉमन करेंसी के विरोध पर अपनी नाराजगी जाहिर की थी. वर्ष 2025 में ब्राजील में ब्रिक्स समिट का आयोजन हुआ था. इस आयोजन से पहले भारत ने कहा था कि सदस्य देशों को अपनी करेंसी में व्यापार करना चाहिए यानी भारत ने दोबारा कॉमन करेंसी के कथित सिद्धांत को ठुकरा दिया था.
जिनपिंग ने वर्ष 2025 की ब्रिक्स समिट से भी दूरी बना ली थी. तथ्य, हित अहित के कारण और इतिहास आपके सामने हैं. अब आप आसानी से तय कर सकते हैं कि ब्रिक्स समिट में जिनपिंग से जुड़े सस्पेंस की असल वजह क्या है? दिल्ली की ब्रिक्स समिट से पहले कॉमन करेंसी को लेकर चीन को अपना रुख भी बदलना पड़ा है. चीन ने सदस्य देशों के बीच डिजिटल करेंसी के जरिए लेन-देन पर सहमति जता दी है. ये कदम बताता है कि जिनपिंग सरकार बैकफुट पर है. बैकफुट पर जाने के बाद ब्रिक्स में राष्ट्राध्यक्ष का आना. ये चीन के कम्युनिस्ट सिस्टम और शासन को भी कबूल नहीं होगा यानी करेंसी पर विरोध और मुद्दे पर रुख बदलना. ये दो ऐसे कारण हैं जिन्होंने जिनपिंग को दिल्ली का टिकट कैंसिल करने के लिए मजबूर कर दिया है.
करेंसी के मुद्दे पर क्यों पीछे हटा चीन?
चीन सिर्फ करेंसी के मुद्दे पर ही पीछे नहीं हटा है. बल्कि ब्रिक्स समिट से पहले चीन ने भारत के प्रति अपनी भाषा और बर्ताव को भी संयमित किया है. अब बड़े ध्यान से देखिए और समझिए. ब्रिक्स से पहले चीन से आए बयानों में भारत को लेकर क्या कहा गया है. चीन से आए बयानों में सबसे पहले ब्रिक्स में भारत के नेतृत्व की तारीफें की गई हैं. चीन ने ये भी कहा है कि भारत ने ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधि के तौर पर खुद को स्थापित किया है. सीमा विवाद जैसे मुद्दों पर चीन के प्रतिनिधियों ने चुप्पी साध रखी है. चीन के विदेश मंत्रालय ने भारत के लिए परमाणु शक्ति जैसे शब्द इस्तेमाल करके भारत की सैन्य शक्ति और सामरिक क्षमता को स्वीकार भी किया है. चीन के इस रुख को नीयत में बदलाव कतई नहीं समझना चाहिए. ये मजबूरी में उठाए गए कदम हैं.
चीन ने कूटनीतिक दांव पेच का इस्तेमाल करके एक चुनौती भरा संदेश भी दिया है, जैसा कि हमने आपको बताया कि बिश्केक में हुई SCO समिट में जिनपिंग शामिल हुए थे. लेकिन, दिल्ली से फिलहाल दूरी बना रखी है. एक कमजोर मंच पर जाकर जिनपिंग ने ये बताने की नाकाम कोशिश की है, कि वो ब्रिक्स में कॉमन करेंसी के मुद्दे पर झुके नहीं है. खुद को दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति मानने वाले शी जिनपिंग आज मजबूर होकर अपनी खिसियाहट दर्शा रहे हैं, जो जिनपिंग के साथ हुआ है. उसका एक उदाहरण प्राचीन भारत के इतिहास में भी मौजूद है. इस उदाहरण को गुप्त वंश की अद्भुत नीति भी कहा जाता है.
गुप्त वंश के शासक सम्राट विक्रमादित्य को पश्चिमी भारत के शक राजाओं से चुनौती मिलती रहती थी. शक राजाओं से सीधा युद्ध करने की बजाय विक्रमादित्य ने वाकाटक राजाओं के साथ संधि की. इस संधि के बाद शक राजा, गुप्त साम्राज्य और वाकाटक राजाओं के क्षेत्रों के बीच फंस गए. संधि की वजह से शक राजा पूरी तरह निष्क्रिय और असहाय हो गए थे. आज ब्रिक्स सदस्यों के मजबूत सहयोग की वजह से जिनपिंग भी ऐसी हालत में फंसे नजर आ रहे हैं. जिनपिंग के लिए दिल्ली की ब्रिक्स एक मुश्किल चुनौती है. लेकिन, एक सुपरपावर है जो पूरे जोश के साथ दिल्ली आ रही है. ये सुपरपावर है रूस. रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने ब्रिक्स समिट में आने की पुष्टि कर दी है. ब्रिक्स की साइडलाइंस पर पुतिन और पीएम नरेंद्र मोदी की द्विपक्षीय मुलाकात भी होने वाली है. अब हम आपको भारत-रूस के इसी महत्वपूर्ण संवाद से जुड़ी जानकारी देने जा रहे हैं.
भारत और रूस के बीच सबसे महत्वपूर्ण संवाद रक्षा क्षेत्र को लेकर होगा. रूसी मीडिया के मुताबिक रूस एक बार फिर भारत को पांचवी पीढ़ी का फाइटर जेट यानी सुखोई-57 सप्लाई करने का ऑफर देगा. ब्रिक्स की साइडलाइंस पर ब्रह्मोस मिसाइल के नए अपग्रेड्स पर भी चर्चा होगी. साथ ही रूस S-400 हवाई रक्षा प्रणाली की पूरी डिलीवरी के वक्त की भी जानकारी देगा. दरअसल यूक्रेन युद्ध की वजह से भारत की S-400 हवाई रक्षा प्रणाली की डिलीवरी में देर हो गई थी. अब रूस दोबारा सिस्टम का निर्माण कर रहा है और जल्द ही बाकी बचे सिस्टम भी भारत को सौंप दिए जाएंगे.
पुतिन और प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकात के दौरान दो और अहम मुद्दों पर बातचीत होगी. रूस के प्रतिनिधि साफ साफ कह चुके हैं कि भारत जितना चाहे उतना कच्चा तेल रूस से आयात कर सकता है. भारत को लेकर रूस सप्लाई की कोई सीमा तय नहीं करेगा, ताकि भारत और रूस के बीच तेल के क्षेत्र में मौजूदा व्यापार घाटे को कम किया जा सके. रूस का ये भी दावा है कि वक्त के साथ दोनों देशों के बीच तेल के व्यापार घाटे को पूरी तरह खत्म किया जाएगा. कच्चे तेल के साथ ही साथ रूस ने भारत को रेयर अर्थ मिनरल्स सप्लाई करने पर भी विचार किया है. इस मुद्दे पर भी राष्ट्रपति पुतिन और पीएम मोदी के बीच बातचीत होगी. जिस करेंसी को लेकर जिनपिंग के ब्रिक्स में आने पर संशय बना है. उस करेंसी पर भी भारत और रूस का सहयोग आगे बढ़ने की संभावना है.
भारत और रूस के बीच बड़ा कारोबार
भारत और रूस पहले से एक दूसरे की करेंसी में व्यापार कर रहे हैं. ब्रिक्स की साइडलाइंस पर इस सहयोग को आगे बढ़ाने पर चर्चा की जाएगी. खासकर कच्चे तेल और पेट्रोल के आयात निर्यात को पूरी तरह स्थानीय करेंसी में ही करने पर सहमति बनने की संभावना है. भारत और रूस ये तय कर चुके हैं कि वर्ष 2030 तक दोनों देश 10 लाख करोड़ रुपए का कारोबार रुपए और रुबल में करेंगे. इस लक्ष्य तक जल्द से जल्द कैसे पहुंचा जाए. ये भी राष्ट्रपति पुतिन और प्रधानमंत्री मोदी के बीच संवाद का अहम मुद्दा बनेगा. अब से ठीक दो दिन बाद अंतरराष्ट्रीय सहयोग का आयोजन यानी ब्रिक्स 2026 शुरु हो जाएगा. दो दिन तक चले मंथन के बाद पता चलेगा. ब्रिक्स से भारत और उसके सहयोगियों को क्या मिला और ब्रिक्स से दूरी बनाने वाले जिनपिंग ने क्या खोया या फिर वो किन मुद्दों पर चूक गए.