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देश के लिए जवान अपनी जान कुर्बान कर देता है... लेकिन क्या उसकी शहादत के बाद उसके परिवार को अपने हक के लिए 22 साल तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ें? लखनऊ में 80 साल की एक मां आज भी अपने शहीद बेटे के अधिकारों के लिए सिस्टम से लड़ रही हैं. बेटा देश की सुरक्षा करते हुए आतंकियों से लड़ते-लड़ते शहीद हो गया. देश ने उसके शौर्य को सलाम किया, उसे सम्मान दिया, मेडल दिया, लेकिन उसी शहीद की मां को कभी कागजों के नाम पर, कभी जमीन के नाम पर और कभी सरकारी नियमों के नाम पर भटकाया गया.
सवाल ये है कि जिस जवान ने देश के लिए अपना आज कुर्बान कर दिया, क्या उसके परिवार को अपना हक पाने के लिए पूरी जिंदगी कुर्बान करनी पड़ेगी? आज हम शहीद के परिवार को इंसाफ देने में नाकाम उस संवेदनहीन सिस्टम का DNA टेस्ट करेंगे.
BSF के जवान विवेक सक्सेना वर्ष 2003 में देश के लिए शहीद हो गए थे. पूरा देश उनकी शहादत पर रोया था, लेकिन सिस्टम उनकी उस शहादत का किस्तों में अपमान कर रहा है. उनके बलिदान की घोर उपेक्षा की जा रही है. शहीद विवेक सक्सेना का परिवार दर-दर भटक रहा है और लखनऊ के अधिकारी उन्हें अपमानित कर रहे हैं. 80 साल की बूढ़ी मां..अपने शहीद बेटे के अधिकारों के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रही हैं. वो थक गई हैं, लेकिन सिस्टम इन्हें परेशान करते करते नहीं थका है.
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— Zee News (@ZeeNews) September 7, 2026
मित्रो, DNA के 3 अगस्त के एडिशन में हमने आपको बताया था कि कैसे कर्नाटक में कारगिल का युद्ध लड़ चुके योद्धा को इसी सिस्टम ने जहर खाने के लिए मजबूर कर दिया था. वहीं लखनऊ में 80 साल की मां अपने शहीद बेटे के हक के लिए सिस्टम से लड़ रही है. सोचिए... इससे ज्यादा शर्मनाक क्या हो सकता है कि देश का जो सपूत आतंकियों से लड़ते लड़ते शहीद हो गया था, उनकी मां सिस्टम से लड़कर थक गई हैं.
डॉक्टर एपीजेअब्दुल कलाम का मानना था,'हमारे वीर जवान सरहद पर अपने आज का बलिदान दे देते हैं ताकि देश के आम नागरिक एक सुरक्षित और खुशहाल कल में जी सकें.' लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि विवेक सक्सेना ने जिनके लिए बलिदान दिया, वही उनकी बूढ़ी मां का अपमान कर रहे हैं. लखनऊ की रहने वाली 80 साल की सावित्री सक्सेना पिछले 22 सालों से ऐसा ही अपमान सह रही हैं. कभी डीएम, कभी एडीएम तो कभी तहसीलदार के दफ्तर में उन्हें अपमानित किया जा रहा है और वो अपने बलिदानी बेटे के अधिकार के लिए ये अपमान सह रही हैं.
लखनऊ के सरोजनीनगर के रहने वाले विवेक सक्सेना बीएसएफ में सहायक कमांडेंट थे. 8 जनवरी 2003 को मणिपुर में आतंकवादियों से मुठभेड़ के दौरान शहीद हो गए थे. विवेक सक्सेना की वीरता के लिए उन्हें शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया था. उससे पहले डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम उन्हें राष्ट्रपति पुलिस पदक से सम्मानित कर चुके थे. मतलब, देश ने शहीद विवेक सक्सेना के शौर्य और साहस को सलाम किया था. देश ने माना था कि विवेक एक वीर योद्धा थे, जिन्होंने देश की सुरक्षा में बलिदान दिया, लेकिन एसी रूम में बैठकर काम करने वाले भ्रष्ट अधिकारियों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा.
सरकार ने शहीद विवेक सक्सेना की मां को नौकरी, सम्मान राशि, शहीद स्मारक और कृषि भूमि आवंटित करने का आदेश दिया था. शहीद विवेक सक्सेना की मां की उम्र नौकरी करने की नहीं थी, ऐसे में नौकरी का फायदा नहीं मिला. शहीद स्मारक बना दिया गया. शौर्य चक्र के लिए सम्मान राशि दी गई लेकिन उसके लिए भी 21 साल तक दफ्तर दफ्तर भटकना पड़ा, लेकिन मित्रो वीरता पदक के लिए जो सम्मान राशि मिलनी थी, वो अब तक नहीं मिली है, जो जमीन मिलनी थी, वो भी नहीं मिली. इसके बदले में हर दफ्तर में उन्हें तिरस्कार मिला.
80 साल की सावित्री सक्सेना... जिनका बेटा देश के लिए शहीद हो गया, उनसे कभी लखनऊ की निवासी होने का सबूत मांगा गया. कभी कहा गया कि जमीन ही नहीं है. जिस मणिपुर में विवेक शहीद हुए थे वहां की सरकार ने यहां तक कह दिया कि उसके पास पैसा ही नहीं है. सोचिए..एक सूबे के पास शहीद के लिए पैसा नहीं है. एक के पास जमीन नहीं है. अधिकारियों के पास समय नहीं है. मित्रो ये हमारे तंत्र की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है.
अब शहीद विवेक का परिवार मेडल वापस करने के लिए तैयार है. बताइए, इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है? हम आपको सुनाते हैं कि शहीद विवेक सक्सेना की मां और भाई कितने आहत हैं. अब बताइए कि क्या सावित्री सक्सेना ने इन्हीं तहसीलदार और डीएम जैसे अधिकारियों की सुरक्षा के लिए अपने बेटे को दुश्मनों से लड़ने भेजा था? क्या अपनी मां की ऐसी स्थिति को देखने के लिए विवेक सक्सेना शहीद हुए थे? सोचिए, जो परिवार 1967 से लखनऊ में रह रहा है... सेना और सरकार के पास उस पते का पूरा विवरण होगा... उससे मूल निवासी होने का प्रमाण पत्र मांगा जा रहा है.
करीब 27 साल की उम्र में विवेक सक्सेना शहीद हो गए थे और उनकी मां 22 सालों से दफ्तरों के चक्कर काट रही हैं. एक मां के लिए इससे दर्दनाक और क्या हो सकता है कि पहले बेटा गया और अब तिरस्कार भी सहना पड़ रहा है.
मित्रो, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन का कहना था,'हम उन वीरों के कर्जदार हैं जो कभी घर नहीं लौटे, क्योंकि उनकी शहादत की वजह से ही आज हमारे घर सुरक्षित और आबाद हैं,'लेकिन बेशर्मी देखिए कि जिन्हें शहीदों का कर्जदार होना चाहिए था, वो शहीद के परिवार को दुत्कार रहे हैं.
उत्तर प्रदेश में शहीद के परिवार को 5 एकड़ जमीन देने का प्रावधान है. राजस्व संहिता 2006 की धारा 126(1) कहती है कि शहीद की विधवा और उनके माता-पिता को सबसे पहले जमीन मिलनी चाहिए. प्रस्ताव मिलने के 2 हफ्ते के अंदर ही जमीन की स्वीकृति देकर कब्जा दिलवाना अनिवार्य है. लेकिन शहीद विवेक सक्सेना की मां को 22 सालों से जमीन के बदले सिर्फ तिरस्कार मिल रहा है.
सोचिए, पिछले 22 साल में कितने डीएम और कितने ही तहसीलदार बदल गए होंगे, लेकिन किसी ने भी शहीद विवेक सक्सेना के परिवार को अधिकार दिलाना अपना कर्तव्य नहीं समझा. उल्टा तहसीलदार कह रहा है कि मेडल को छोड़ना है तो छोड़ दीजिए. मित्रों, ऐसे तहसीलदार को किसी सरकारी दफ्तर की कुर्सी पर बैठने का कोई हक नहीं होना चाहिए..जो शहीद के मेडल को मेडल नहीं समझता. कितनी आसानी से शहीद के परिवार को कह दिया- मेडल छोड़ना है तो छोड़ दीजिए. तहसीलदार की इस शर्मनाक हरकत के बाद ज़ी न्यूज़ की टीम..शहीद विवेक सक्सेना के परिवार को लेकर एसडीएम के दफ्तर गई। एसडीएम ने क्या भरोसा दिया... वो हम आपको सुनाते हैं.
उत्तर प्रदेश में शहीद विवेक सक्सेना का परिवार अकेला नहीं है, जो इस सड़े हुए सिस्टम का शिकार है. शहीदों की एक लंबी फेहरिस्त है, जिनके परिवार को अधिकारी अपमानित कर रहे हैं. गाजीपुर जिले की रहने वाली सुदामा के पति रामध्यान सिंह 1971 के युद्ध में शहीद हो गए थे. उन्हें सरकार ने 5 एकड़ जमीन देने का वादा किया. 1974 में ढाई एकड़ जमीन दे दी गई और बाकी ढाई एकड़ जमीन आज तक नहीं मिली है. ये मामला अदालत तक पहुंचा, फिर भी एक शहीद की विधवा को जमीन अब तक नहीं मिली है.
मेरठ में तो 25 ऐसे मामले हैं, जिनमें शहीद के परिवारों को तय की गई जमीन नहीं मिली. सबसे दुर्भाग्य की बात ये है कि सरकार और अधिकारियों के पास ऐसा कोई कलेक्टिव आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, जो बताए कि समूचे प्रदेश में कितने शहीदों के परिवार हैं, जो अपने अधिकार का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन ये कोई यूपी या कर्नाटक की समस्या नहीं है. ये राष्ट्रीय स्तर की समस्या है और जब तक इस समस्या को गंभीरता से नहीं सुलझाया जाएगा, तब तक एसी रूम में बैठने वाला कोई भी तहसीलदार..इसी तरह शहीद के परिवार को अपमानित करता रहेगा. ये भी हमारे देश का एक सिस्टम है.