SOCIAL MEDIA

Newsletter

PARTNER SITES
Select language

ब्लॉग: दुनिया भर के 'जंतर-मंतर' हमें क्या सिखाते हैं?

दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने पर रोक लगा दी गई है लेकिन दुनिया भर में ऐसे कई प्रमुख स्थान हैं जो शहरों के मध्य में हैं और जहां लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत अपनी बात रखने और प्रदर्शन करने की अनुमति है.

Written By Amit Singh
Published: Oct 13, 2026, 04:35 PM IST | Updated: Oct 13, 2026, 04:49 PM IST
Image Credit: दुनिया के कई शहरों में विरोध प्रदर्शन सार्वजनिक जीवन का हिस्सा हैं
Join

गत सोमवार को दिल्ली पुलिस द्वारा जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शनों के आधिकारिक स्थलों की सूची से बाहर करने का निर्णय लिया गया है. इस प्रशासनिक फैसले ने न केवल राजधानी में लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के भूगोल को बदल दिया है बल्कि एक गंभीर नागरिक बहस को भी जन्म दिया है.

मंगलवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शनों पर पाबंदियां लगाये जाने और सार्वजनिक प्रदर्शनों के लिए वैकल्पिक जगह तय किये जाने को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है.

इस याचिका में दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन के लिए तय जगहों की उपलब्धता और उपयुक्तता को लेकर चिंता जताई गई है.

इसमें कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन के लिए तय जगह के तौर पर मंजूरी दी थी और रामलीला मैदान को इसके लिए सही विकल्प नहीं माना था.

याचिका में इन पाबंदियों और प्रदर्शनों के लिए दूसरी जगहों को चुनने के पीछे की वजह पर सवाल उठाए गए हैं.

याचिका में विरोध-प्रदर्शन के लिए प्रस्तावित वैकल्पिक जगहों को लेकर भी चिंता जताई गई है. इसमें आरोप लगाया गया है कि इनमें से कुछ जगहें दिल्ली के ‘लैंडफिल’ (विशाल कूड़ास्थल) इलाकों के पास हैं और सार्वजनिक सभाओं के लिए उपयुक्त नहीं हैं.

इतना ही नहीं मंगलवार को कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेताओं सौरभ दास और आशुतोष रांका ने भारी बैरिकेडिंग और कड़ी सुरक्षा के बावजूद जंतर-मंतर पहुंच कर प्रदर्शन का प्रयास किया. इस पर पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया.

सीजेपी नेता सौरभ दास ने प्रदर्शन स्थल तक पहुंच पर गृह मंत्रालय के प्रतिबंधों पर सवाल उठाते हुए कहा, ‘हमारा जंतर-मंतर छीनने वाला गृह मंत्रालय कौन होता है? यह निर्धारित विरोध प्रदर्शन स्थल है, और हम जंतर-मंतर से ही ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा लेकर रहेंगे.’

दुनिया से क्या सीख सकते हैं?

दुनिया के कई शहरों में विरोध प्रदर्शन सार्वजनिक जीवन का हिस्सा हैं. हालांकि दिल्ली के विपरीत ये स्थल सभी शहर के प्रमुख हिस्सों में स्थित हैं.

लंदन का पार्लियामेंट स्क्वायर, वाशिंगटन का लाफायेट स्क्वायर और न्यूयॉर्क का यूनियन स्क्वायर अलग-अलग ऐतिहासिक संदर्भों में सार्वजनिक असहमति के लिए पहचाने जाते हैं. सिंगापुर का हांग लिम पार्क भी निर्धारित सार्वजनिक अभिव्यक्ति स्थल है.

इन उदाहरणों की तुलना करते समय एक सावधानी जरूरी है. हर देश के कानून, सुरक्षा संबंधी जरूरतें और प्रदर्शन की अनुमति देने की प्रक्रिया अलग हैं. किसी दूसरे शहर का मॉडल दिल्ली पर हूबहू लागू नहीं किया जा सकता.

फिर भी एक साझा सीख मिलती है. प्रदर्शन के लिए जगह तय करना केवल प्रशासनिक नक्शे का मामला नहीं होना चाहिए. यह भी देखना चाहिए कि उस जगह का सार्वजनिक जीवन में क्या महत्व है और नागरिक वहां अपनी बात कितनी प्रभावी ढंग से रख सकते हैं.

फिलहाल वैश्विक राजधानियों का ढांचा इस बात की गवाही देता है कि लोकतंत्र में विरोध केवल एक 'अधिकार' नहीं बल्कि शहर के सार्वजनिक जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा है.

रामलीला मैदान का किस्सा भी मजेदार

दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन के लिए तय किए गए तीन नए स्थानों में से एक रामलीला मैदान की उपलब्धता भी एक बड़ी समस्या है. राजनीतिक रैलियों, धार्मिक उत्सवों (जैसे दशहरा, रामलीला) और बड़े सरकारी या निजी आयोजनों के कारण यह मैदान महीनों पहले से बुक रहता है.

उदाहरण के लिए त्योहारों के सीजन के चलते आगामी ढाई महीनों तक यहां एक भी दिन खाली नहीं है. अब इस साल सिर्फ 29, 30 और 31 दिसंबर के लिए ही बुक किया जा सकता है.

रामलीला मैदान की बुकिंग का खर्च बहुत ज्यादा है. वर्तमान नियमों के अनुसार, यहां सिर्फ एक दिन के कार्यक्रम के लिए 50,000 रुपये का किराया और 55,000 रुपये की सुरक्षा राशि देनी होती है.

टैक्स मिलाकर एक दिन का कुल खर्च लगभग 1.21 लाख रुपये  तक पहुंच जाता है. किसी भी छोटे संगठन या आम जनता के लिए विरोध प्रदर्शन या रैली करने के लिए इतनी बड़ी रकम चुकाना नामुमकिन जैसा है.

नागरिक अधिकारों का संकट

सुरक्षा व्यवस्था, कानून-व्यवस्था बनाए रखने और यातायात प्रबंधन के नाम पर जंतर- मंतर पर प्रदर्शन से रोक का कदम पहली नजर में व्यावहारिक लग सकता है लेकिन लोकतंत्र की मूल आत्मा के चश्मे से देखने पर यह नागरिकों की आवाज को सत्ता के गलियारों से दूर करने का एक प्रयास प्रतीत होता है.

दिल्ली पुलिस का यह हालिया फैसला इस बुनियादी लोकतांत्रिक मान्यता पर चोट करता है कि नागरिक का असंतोष सत्ता की दहलीज के जितना करीब होगा, लोकतंत्र उतना ही जीवंत और उत्तरदायी रहेगा.

प्रदर्शनकारियों को सत्ता के केंद्र से दूर किसी एकांत कोने में धकेल देना किसी भी परिपक्व लोकतंत्र के लिए एक स्वस्थ संकेत नहीं माना जा सकता.

दुनिया भर के प्रमुख लोकतांत्रिक और प्रगतिशील देशों में विरोध प्रदर्शनों के लिए शहर के सबसे व्यस्त और केंद्रीय हिस्सों को न केवल आरक्षित रखा गया है बल्कि उन्हें अभिव्यक्ति की आजादी के प्रतीक के रूप में मान्यता भी दी गई है.

दुनिया के किसी भी प्रगतिशील कोने में जनता की आवाज को 'कहीं दूर, एकांत में' दबाने की कोशिश नहीं की जाती बल्कि वह शासन तंत्र के ठीक सामने अपनी मौजूदगी दर्ज कराती है.

ऐसे में दिल्ली पुलिस द्वारा जंतर-मंतर पर पाबंदी लगाना वैश्विक लोकतांत्रिक मूल्यों की धारा के विपरीत बहने जैसा है.

जंतर-मंतर पर बहस का सार यही है. लोकतंत्र में हर विरोध को सही मानना जरूरी नहीं, हर मांग स्वीकार करना भी जरूरी नहीं लेकिन शांतिपूर्ण विरोध को लोकतांत्रिक जीवन का वैध हिस्सा मानना जरूरी है.

राजधानी की सड़कों पर व्यवस्था बनी रहनी चाहिए. नागरिकों की आवाज भी बनी रहनी चाहिए. इन दोनों में से किसी एक को चुनना लोकतंत्र की मजबूरी नहीं बल्कि नीति और प्रशासन की विफलता होगी.

इसे भी पढ़ें- 
Analysis: जंतर-मंतर की आवाज पर लगा विराम! जिस सड़क पर गूंजता था लोकतंत्र, अब वहां क्या होगा?

Add Zee News as a Preferred Source

About the Author

अमित सिंह देश के वरिष्ठ पत्रकारों और डिजिटल मीडिया संपादकों में शामिल हैं. राजनीति, अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक नीति और सामाजिक मुद्दों पर लेखन का उन्हें 18 वर्षों से अधिक का अनुभव है. अपने लंबे पत्रकारिता करियर में उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय विषयों की रिपोर्टिंग, विश्लेषण और संपादकीय नेतृत्व किया है. उनकी पहचान तथ्यों पर आधारित, संतुलित और गहन विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. वर्तमान में अमित सिंह Zee News की हिंदी वेबसाइट के संपादक हैं. इस भूमिका में वे संपादकीय दिशा तय करने, विशेष कवरेज की रणनीति बनाने और डिजिटल न्यूज़रूम के संचालन का नेतृत्व करते हैं.पत्रकारिता में उत्कृष्ट योगदान के लिए अमित को देश के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में से एक Ramnath Goenka Excellence in Journalism Awards से सम्मानित किया जा चुका है. यह सम्मान उनकी पेशेवर विश्वसनीयता, खोजी दृष्टि और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों पर प्रभावशाली पत्रकारिता का प्रमाण है.अमित ने अपने करियर के दौरान भारत के अग्रणी मीडिया संस्थानों The Wire, Tehelka, Dainik Jagran, Hindustan और Aaj Tak में महत्वपूर्ण भूमिकाओं में कार्य किया है. उन्हें प्रिंट, टेलीविजन और डिजिटल तीनों माध्यमों में काम करने का अनुभव है. आप अमित सिंह से सीधे amit.singh@india.com पर ईमेल के जरिए संपर्क कर सकते हैं.
Read More

ZEENEWS TRENDING STORIES