छठ से पहले यमुना में फिर झाग: नदी गंदी, सियासत तेज, समाधान कहां?
छठ पूजा से पहले दिल्ली के कालिंदी कुंज में यमुना पर फिर जहरीले झाग की मोटी परत दिखाई दी है. सफाई के सरकारी दावों और सियासी आरोपों के बीच सवाल ये है कि यमुना को स्थायी राहत कब मिलेगी?
छठ पूजा से ठीक पहले दिल्ली में यमुना की तस्वीर एक बार फिर चिंता बढ़ाने वाली है. 24 अक्टूबर को कालिंदी कुंज में नदी की सतह पर सफेद झाग की मोटी परत दिखाई दी.
नदी किनारे आस्था से जुड़ी तैयारियों के बीच यमुना की यह हालत कई सवाल खड़े करती है. जिस नदी में श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाने और सूर्य को अर्घ्य देने की तैयारी कर रहे हैं, उसके पानी की स्थिति मन में संदेह पैदा कर रही है.
इसी बीच यमुना की सफाई के नाम पर झाग हटाने के लिए इस्तेमाल होने वाले रसायनों और दिल्ली जल बोर्ड की टेंडर प्रक्रिया को लेकर आम आदमी पार्टी ने भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं.
दूसरी ओर दिल्ली सरकार के अधिकारियों का कहना है कि झाग हटाने का अभियान पहले भी चलाया जाता रहा है और इस बार भी उसकी तैयारियां की गई हैं.
यानी नदी में झाग है. उसे हटाने की कवायद है. और उसके साथ ढेर सारी राजनीति है.
लेकिन इस पूरे विवाद में सबसे अहम सवाल यह नहीं है कि झाग हटाने का ठेका किसे मिला या नदी की सतह पर कितनी देर तक सफेदी दिखाई दी.
असली सवाल यह है कि दिल्ली की सत्ता बदलने, योजनाएं बनने और करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद यमुना हर साल उसी हालत में क्यों पहुंच जाती है?
उल्लेखनीय है कि इस सवाल का जवाब दिल्ली सरकार के ही पर्यावरण विभाग के सहयोग से द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट यानी टेरी की तैयार की गई रिपोर्ट में मिलता है.
यह रिपोर्ट नदी में झाग बनने की वैज्ञानिक वजहों को समझने के साथ-साथ उस व्यवस्था की कमजोरियों को भी सामने रखती है जो यमुना को प्रदूषण से बचाने के लिए जिम्मेदार है.
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साबुन से कहीं बड़ी है कहानी
यमुना के झाग को देखकर पहली नजर में लगता है कि नदी में किसी ने साबुन या डिटर्जेंट उड़ेल दिया है. टेरी की रिपोर्ट बताती है कि झाग बनने के पीछे घरेलू सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट, डिटर्जेंट में मौजूद सर्फैक्टेंट, अमोनिया, फॉस्फेट और प्राकृतिक जैविक पदार्थों का मिला-जुला असर है.
इसे आसान भाषा में समझिए. सर्फैक्टेंट ऐसे रासायनिक पदार्थ हैं जो पानी की सतह के गुण बदलते हैं और बुलबुलों को जल्दी टूटने नहीं देते हैं. साबुन और डिटर्जेंट में इनका इस्तेमाल इसी वजह से होता है.
जब कपड़े धोने, घरों की सफाई और दूसरी गतिविधियों से निकला ऐसा पानी बिना पर्याप्त उपचार के नदी तक पहुंचता है तो उसमें मौजूद सर्फैक्टेंट झाग बनने की जमीन तैयार कर देते हैं.
अब इसमें सीवेज और औद्योगिक कचरा जुड़ता है. अमोनिया और फॉस्फेट जैसे प्रदूषक पानी की गुणवत्ता बिगाड़ते हैं. कार्बनिक पदार्थों की अधिकता भी समस्या को बढ़ाती है.
जलकुंभी, शैवाल, पत्तियों और दूसरे जैविक पदार्थों के विघटन से निकलने वाले तत्व इस प्रक्रिया में योगदान करते हैं. यानी नदी में दिखाई देने वाला सफेद झाग केवल गंदगी का निशान नहीं, पानी में मौजूद प्रदूषकों और उनके व्यवहार का संकेत भी है.
फिर सवाल उठता है कि झाग कालिंदी कुंज और ओखला बैराज के आसपास इतना ज्यादा क्यों दिखता है?
इसका जवाब पानी के बहाव में छिपा है. जब प्रदूषित पानी बैराज के गेट से तेजी से नीचे गिरता है तो उसमें हवा मिलती है और पानी में हलचल पैदा होती है.
सर्फैक्टेंट की मौजूदगी में यही हलचल बुलबुलों को झाग की मोटी परत में बदल देती है. ओखला बैराज के नीचे झाग की अधिक तीव्रता दर्ज किए जाने की वजहों में यह प्रक्रिया भी शामिल है.
रिपोर्ट में और क्या है खास?
इस रिपोर्ट की खासियत यह है कि यह केवल नदी के किनारे खड़े होकर झाग देखने तक सीमित नहीं है. अध्ययन के दौरान मई-जून 2024 और नवंबर 2024 से जनवरी 2025 के बीच दो चरणों में नमूने लिए गए.
कुल 52 स्थानों पर नदी, नालों, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) , कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी) और धोबी घाटों से जुड़े 33 जल गुणवत्ता मानकों की जांच की गई.
रिपोर्ट में कई ऐसे स्रोत सामने आए, जिन पर नियंत्रण के बिना यमुना की हालत बदलना मुश्किल है. अक्षरधाम, खिचड़ीपुर और रेलवे कॉलोनी के कुछ धोबी घाटों से निकलने वाले दूषित पानी को समस्या से जोड़ा गया.
लॉरेंस रोड, ओखला और मायापुरी के औद्योगिक अपशिष्ट उपचार संयंत्रों में भी प्रदूषकों को हटाने की क्षमता से जुड़ी कमियां सामने आईं.
रिपोर्ट में कई नालों को भी प्रदूषण के महत्वपूर्ण स्रोतों के रूप में चिह्नित किया गया. इनमें नजफगढ़ और सप्लीमेंट्री ड्रेन के अलावा ड्रेन नंबर 6, दिल्ली गेट, सेन नर्सिंग होम, बारापुला और शाहदरा ड्रेन शामिल हैं.
यमुना में प्रदूषण का सवाल इसलिए भी जटिल है क्योंकि नदी तक पहुंचने वाले प्रदूषक किसी एक पाइप या किसी एक औद्योगिक इकाई से नहीं आते. वे शहर के अलग-अलग हिस्सों से नालों के नेटवर्क के जरिए नदी तक पहुंचते हैं.
झाग हटाइए लेकिन प्रदूषण का क्या?
दिल्ली सरकार और दिल्ली जल बोर्ड के सामने सबसे आसान रास्ता यही होता है कि वह हर साल छठ से पहले झाग हटाने की तैयारी, रसायनों का छिड़काव और नदी की सतह को कुछ समय के लिए साफ दिखाने की कोशिश करती है.
हालांकि सवाल झाग हटाने वाले रसायनों के इस्तेमाल को लेकर भी है. किसी रसायन से सतह पर मौजूद झाग कम हो सकता है लेकिन इससे यह अपने आप साबित नहीं होता कि पानी से प्रदूषक भी निकल गए हैं.
झाग का गायब होना और नदी का साफ होना एक ही बात नहीं है. इसलिए ऐसे अभियान के साथ पानी की गुणवत्ता की जांच और रसायनों के पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन भी जरूरी है.
यहां सरकार को दो मोर्चों पर जवाब देना होगा. पहला, आपात स्थिति में झाग को नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे उपाय कितने प्रभावी और सुरक्षित हैं?
दूसरा, साल-दर-साल उसी जगह झाग लौटने से रोकने के लिए प्रदूषण के स्रोतों पर क्या कार्रवाई हुई?
असली परीक्षा नालों और ट्रीटमेंट प्लांट पर होगी
टेरी की रिपोर्ट केवल समस्या नहीं बताती समाधान की दिशा भी सुझाती है. इसमें एसटीपी और सीईटीपी की क्षमता तथा कार्यक्षमता सुधारने, उन्नत उपचार तकनीकें अपनाने, औद्योगिक इकाइयों के निरीक्षण को प्रभावी बनाने और विभागों के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत पर जोर दिया गया है.
इसके साथ फॉस्फेट आधारित डिटर्जेंट के विकल्पों को प्रोत्साहित करने, धोबी घाटों पर छोटे उपचार संयंत्र लगाने और नालों की जल गुणवत्ता की नियमित निगरानी करने जैसे कदम भी जरूरी हैं.
सबसे अहम जवाबदेही है. हर बड़े नाले के लिए यह स्पष्ट होना चाहिए कि उसमें कितना पानी आ रहा है, उसमें प्रदूषण का स्तर क्या है और उसे कम करने की जिम्मेदारी किस एजेंसी की है.
एसटीपी से निकलने वाले पानी के नमूनों की नियमित जांच होनी चाहिए. औद्योगिक इकाइयों को नियम तोड़ने पर कार्रवाई का सामना करना चाहिए. जनता के सामने केवल खर्च का ब्योरा नहीं, बल्कि नतीजे भी रखे जाने चाहिए.
नदी को साफ करने की जिम्मेदारी किसी एक विभाग तक सीमित नहीं है. दिल्ली सरकार, दिल्ली जल बोर्ड, प्रदूषण नियंत्रण से जुड़ी एजेंसियों और बैराज के संचालन से संबंधित विभागों के बीच तालमेल जरूरी है.
सवाल इच्छाशक्ति का भी
यमुना का झाग एक ऐसी समस्या बन चुका है जो हर साल सरकार की प्राथमिकताओं की परीक्षा लेती है. छठ पूजा के आसपास यह धार्मिक आस्था, जनस्वास्थ्य और राजनीति के केंद्र में आ जाता है.
टेरी की रिपोर्ट एक वैज्ञानिक आधार देती है. अब जरूरत उस आधार को सरकारी कार्रवाई में बदलने की है. इसके लिए समयबद्ध लक्ष्य, सार्वजनिक निगरानी, स्पष्ट जिम्मेदारियां और स्वतंत्र मूल्यांकन होना चाहिए.
यमुना को लेकर सबसे बड़ी विडंबना यही है कि समस्या के कारण अब किसी रहस्य की तरह छिपे नहीं हैं. प्रदूषण के स्रोत चिन्हित हैं, तकनीकी समाधान उपलब्ध हैं और सुधार के लिए आवश्यक कदम भी बताए जा चुके हैं.
फिर भी यदि झाग हर साल लौटता है तो सवाल ज्ञान की कमी से ज्यादा उस ज्ञान को लागू करने की इच्छाशक्ति और प्रशासनिक क्षमता का है.
22 अक्टूबर को यमुना के पुनरुद्धार से जुड़ी 8,941 करोड़ रुपये की परियोजनाओं के उद्घाटन और शिलान्यास के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मई 2029 से पहले यमुना को स्वच्छ बनाने का भरोसा दिया.
अब इस दावे की असली परीक्षा घोषणाओं और परियोजनाओं में नहीं, बल्कि नदी के पानी की गुणवत्ता में दिखने वाले बदलाव में होगी.
छठ से पहले यमुना पर झाग की वापसी यही याद दिलाती है कि नदी को साफ करने का लक्ष्य तभी पूरा माना जाएगा जब श्रद्धालुओं को हर साल इसी सवाल के सामने खड़ा न होना पड़े कि आस्था की डुबकी लगाएं या प्रदूषित पानी से बचें.