स्त्रीधन के लिए जेल में पूछताछ जरूरी नहीं! 80 साल के बुजुर्ग को हाई कोर्ट से राहत
Delhi High Court: दिल्ली हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े यौन उत्पीड़न के मामले में 80 साल के आरोपी ससुर को अग्रिम जमानत दे दी है. अदालत ने कहा कि महिला के स्त्रीधन की बरामदगी के लिए आरोपी को हिरासत में लेकर पूछताछ करना जरूरी नहीं है.
Delhi News: दिल्ली हाईकोर्ट ने एक वैवाहिक विवाद से जुड़े यौन उत्पीड़न के मामले में 80 साल के आरोपी ससुर को अग्रिम जमानत दी है. कोर्ट का कहना है कि अगर जांच एजेंसी का उद्देश्य महिला का स्त्रीधन बरामद करना है, तो इसके लिए आरोपी को हिरासत में लेकर पूछताछ करने की कोई जरूरत नहीं है. अदालत ने ये साफ किया है कि स्त्रीधन की बरामदगी का मुद्दा अग्रिम जमानत की कार्यवाही के दायरे में नहीं आता है.
कोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति गिरीश कथपालिया की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान जांच अधिकारी की कार्रवाई पर भी सवाल उठाए हैं. जांच अधिकारी ने दावा किया था कि आरोपी को कई बार जांच में शामिल होने के लिए नोटिस दिए गए, लेकिन वो जांच में शामिल नहीं हुआ था. जब अदालत ने नोटिस को रिकॉर्ड पर पेश करने के लिए कहा, अधिकारी का कहना था कि नोटिस मौखिक रूप से दिए गए थे.
कोर्ट ने इस बात पर गौर किया कि इन कथित नोटिस से संबंधित कोई केस डायरी भी अदालत के सामने पेश नहीं की गई. पीठ ने जांच अधिकारी के इस तरीके को विश्वसनीय नहीं माना और कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसी सामग्री नहीं है, जिससे ये साबित हो सके कि आरोपी ने जांच में सहयोग करने से इनकार किया था.
महिला ने क्या आरोप लगाए थे
ये मामला एक वैवाहिक विवाद से जुड़ा है. शिकायतकर्ता महिला ने अपने ही ससुर पर यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगाए थे. FIR में आरोप लगाया गया था कि आरोपी ने कई बार उसके साथ गलत व्यवहार किया और शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश की. दूसरी तरफ आरोपी की ओर से इन आरोपों को गलत बताते हुए कहा गया कि उसके बेटे और शिकायतकर्ता के बीच चल रहे वैवाहिक विवाद के कारण उस पर दबाव बनाने के लिए ये आरोप लगाए गए हैं.
अभियोजन पक्ष ने जमानत का विरोध किया. साथ ही कहा कि जांच अभी शुरुआती चरण में है और आरोपी से हिरासत में पूछताछ करने पर जांच में ज्यादा मदद मिल सकती है. शिकायतकर्ता ने ये भी दलील दी कि महिला के स्त्रीधन की बरामदगी के लिए आरोपी की हिरासत जरूरी है.
क्या है ये मामला?
हालांकि, हाई कोर्ट ने इस तर्क को नहीं माना. कोर्ट ने कहा कि स्त्रीधन की बरामदगी के लिए हिरासत में पूछताछ को जरूरी नहीं माना जा सकता. पीठ ने ये भी ध्यान दिया कि शिकायतकर्ता ने स्त्रीधन की वापसी के लिए कोई अलग कानूनी प्रक्रिया शुरू नहीं की थी. अदालत ने मामले में लगाए गए यौन अपराधों के समय को भी महत्वपूर्ण माना. रिकॉर्ड के अनुसार, कथित घटनाएं मई 2022 या उससे पहले की बताई गई हैं, जबकि इस मामले में प्राथमिकी 29 अप्रैल 2026 को दर्ज की गई थी.