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Delhi News: दिल्ली के सत्य निकेतन में 5 मंजिला PG बिल्डिंग गिरने से लोगों के मन में कई सवाल खड़े हो गए हैं. इस घटना ने छात्रों के रहने की व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं. 6 सितंबर को हुए इस हादसे में सात लोगों की मौत हुई है, जबकि कई लोग घायल हैं. वहीं हादसे के बाद सबसे बड़ा सवाल ये है कि दिल्ली जैसे बड़े एजुकेशन हब में पढ़ने वाले छात्रों के लिए सुरक्षित और सस्ती रहने की व्यवस्था कितनी है?
दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) में अलग-अलग राज्यों से बड़ी संख्या में स्टूडेंट पढ़ने आते हैं. इसमें से बहुत सारे छात्र ऐसे होते हैं, जो घर से बाहर होने के कारण पढ़ाई के साथ रहने के लिए भी जगह तलाशते हैं. लेकिन DU के पास सभी छात्रों को हॉस्टल देने की क्षमता नहीं है. ऐसे में बड़ी संख्या में छात्र प्राइवेट PG, किराये के कमरे या शेरिंग फ्लैट का सहारा लेते हैं.
DU में कितने हैं छात्र और कितने हॉस्टल बेड?
DU की 2024-25 की रिपोर्ट के अनुसार, यूनिवर्सिटी में 2.10 लाख से ज्यादा अंडरग्रेजुएट स्टूडेंट्स हैं. इसके अलावा करीब 34 हजार पोस्टग्रेजुएट और PhD छात्र हैं. साथ ही लगभग 6 हजार छात्र सर्टिफिकेट और डिप्लोमा जैसे कोर्स में पढ़ रहे हैं. इस तरह रेगुलर मोड में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या 2.5 लाख से ज्यादा है. इसमें से आधे से ज्यादा छात्र दिल्ली के बाहर से आते हैं. यानी हर साल बड़ी संख्या में युवाओं को दिल्ली में रहने के लिए जगह की जरूरत होती है. वहीं हॉस्टल बेड की बात करें, तो DU के हॉस्टल में करीब 9 हजार बेड की ही क्षमता बताई गई है. इतना ही नहीं ये हॉस्टल यूनिवर्सिटी और उसके अलग-अलग कॉलेजों में बंटे हुए हैं. इसका सीधा मतलब ये है कि यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले छात्रों के मुकाबले हॉस्टल बेड काफी कम है.
क्यों नहीं मिल पाता हर छात्र को हॉस्टल?
दिल्ली यूनिवर्सिटी के सारे हॉस्टर सबके लिए नहीं खुले होते हैं. इसमें से कई हॉस्टल किसी खास कोर्स, कैटेगरी, जेंडर या दूसरे मानकों के आधार पर छात्रों को जगह देते हैं. वहीं इसमें से कुछ हॉस्टल पोस्टग्रेजुएट और रिसर्च छात्रों के लिए हैं, कुछ विशेष क्षेत्र से आने वाले स्टूडेंट्स के लिए तय हैं. इसके अलावा जिन भी कॉलेजों में हॉस्टल की सुविधा दी गई है, वहां सीटों की संख्या स्टूडेंट्स की कुल संख्या के मुकाबले बहुत कम है. हंसराज कॉलेज में हजारों की संख्या में छात्र पढ़ते हैं, लेकिन हॉस्टल में रहने की सुविधा कुछ सौ छात्रों तक ही मिलती है. यानी DU में एडमिशन मिल जाने के बाद भी हर छात्र को कैंपस के अंदर रहने की जगह मिलना आसान नहीं है.
कहां रहते हैं छात्र?
जब छात्रों को यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में जगह नहीं मिलती है, तो छात्र दूसरी जगह तलाशना शुरू कर देते हैं. इसी वजह से दिल्ली के कई इलाकों में PG और किराये के कमरों की मांग लगातार बढ़ी है. ऐसे में बता दें कि साउथ कैंपस के पास बसा सत्य निकेतन ऐसा ही एक बड़ा छात्रों के रहने का इलाका बन चुका है. यहां श्री वेंकटेश्वर कॉलेज, मोतीलाल नेहरू कॉलेज, आर्यभट्ट कॉलेज और राम लाल आनंद कॉलेज जैसे संस्थान आसपास हैं. कुछ कॉलेजों में कैंपस के अंदर हॉस्टल की सुविधा नहीं होती है. ऐसे में स्टूडेंट्स के पास PG लेने का ही ऑप्शन बचता है. इसी तरह नॉर्थ कैंपस के आसपास मुखर्जी नगर और हडसन लेन जैसे इलाकों में भी बड़ी संख्या में छात्र किराये के कमरे और PG में रहते हैं.
PG बढ़ने की वजह क्या है?
राजधानी में स्टूडेंट्स की बढ़ती संख्या और हॉस्टल की सीमित क्षमता PG के बिजनेस को तेजी से आगे बढ़ा रही है. बाहर से आने वाले स्टूडेंट्स ऐसी जगह की खोज करते हैं, जहां से कॉलेज आसानी से पहुंचा जा सके. साथ ही किराया भी उनकी बजट में ही हो. स्टूडेंट्स के लिए ये व्यवस्था आसान नहीं होती. उन्हें किराया, सिक्योरिटी डिपॉजिट, बिजली-पानी, खाना और दूसरी सुविधाओं का खर्च उठाना पड़ता है. वहीं दूसरी तरफ बिल्डिंग की सुरक्षा और रहने की स्थिति भी एक बड़ा सवाल बन जाती है. सत्य निकेतन जैसे इलाके में कई पुरानी इमारतों का इस्तेमाल छात्रों के लिए PG के तौर पर होने लगा है. वहीं इस तरह के इमारतों का समय समय पर जांच होना जरूरी होता है.
बाहर से आने वाले छात्रों पर ज्यादा असर
वहीं हॉस्टल की कमी का सबसे ज्यादा असर दूसरे शहरों से आने वाले स्टूडेंट्स पर पड़ता है. ऐसे स्टूडेंट्स को दिल्ली में पढ़ाई शुरू करने के साथ ही सुरक्षित और सस्ती जगह भी तलाशनी होती है. ये समस्या उन परिवारों के बच्चों के लिए बड़ी हो जाती है, जिनकी आर्थिक स्थिति कमजोर है. ऐसे बच्चों को जब हॉस्टल नहीं मिलता तो महंगा PG या कमरा लेना उनकी पढ़ाई के खर्च को बढ़ा सकता है. वहीं कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं, जिनके लिए ज्यादा किराया पढ़ाई जारी रखने में भी मुश्किल पैदा करता है. वहीं फीमेल स्टूडेंट्स के लिए सुरक्षा एक और महत्वपूर्ण बन जाता है. ऐसे में हॉस्टल की कमी उच्च शिक्षा के ऑप्शन को प्रभावित कर सकती है
बता दें कि हॉस्टल को केवल रहने की सुविधा के हिसाब से नहीं देखा जा सकता. ये छात्रों की पढ़ाई, सुरक्षा और कैंपस लाइफ से जुड़ा मुद्दा भी है. जो छात्र यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में रहते हैं, उन्हें लाइब्रेरी, कैंपस और दूसरी शैक्षणिक सुविधाओं तक आसानी से पहुंच मिलती है. वहीं बाहर रहने वाले छात्रों को रोजाना आने-जाने का खर्च और समय दोनों देना पड़ता है. आर्थिक रूप से कमजोर स्टूडेंट्स के लिए ये अंतर और बड़ा हो सकता है. ऐसे में हॉस्टल की उपलब्धता सीधे तौर पर इस बात को प्रभावित कर सकती है कि कौन छात्र दिल्ली आकर पढ़ाई कर सकता है और कौन नहीं.
क्या हो सकता है समाधान?
इस समस्या का एक समाधान DU और उसके कॉलेजों में हॉस्टल की क्षमता बढ़ाना हो सकता है. लेकिन सिर्फ नए हॉस्टल बनाने तक ही नहीं है. PG को भी सुरक्षित बनाने की जरूरत है. PG और किराये की इमारतों में फायर सेफ्टी, स्ट्रक्चरल मजबूती, बिजली व्यवस्था और लोगों की क्षमता जैसे नियमों की नियमित जांच जरूरी हो सकती है. दुनिया के कई बड़े शिक्षा केंद्रों में Purpose-Built Student Accommodation यानी PBSA मॉडल का इस्तेमाल किया जाता है. इसमें छात्रों के लिए विशेष रूप से आवासीय इमारतें बनाई जाती हैं. इनमें रहने के साथ सुरक्षा, परिवहन और दूसरी जरूरी सुविधाओं का भी ध्यान रखा जाता है