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Delhi News: दिल्ली-NCR की हवा में सुधार का सिलसिला जारी है. सितंबर 2026 में दिल्ली का औसत AQI 102 रहा, जो 2022 के बाद सितंबर महीने में सबसे कम है. इससे पहले 2025 और 2024 में यह 105, 2023 में 108 और 2022 में 104 दर्ज किया गया था.
Delhi registers its lowest monthly average AQI (Air Quality Index) for September during 2026, as compared to the corresponding period of the last 05 years from 2022 to 2026: Commission for Air Quality Management pic.twitter.com/Dkj3ckGcLg
— ANI (@ANI) September 30, 2026
2026 में 200 से कम AQI वाले सबसे ज्यादा दिन
जनवरी से सितंबर 2026 के बीच दिल्ली में AQI 200 से कम रहने वाले दिनों की संख्या पिछले पांच साल में सबसे ज्यादा रही. इस दौरान 2026 में ऐसे 194 दिन दर्ज किए गए. वहीं 2025 में 187, 2024 में 188, 2023 में 193 और 2022 में 146 दिन रहे.
खराब से गंभीर हवा वाले दिन भी कम
इस साल जनवरी से सितंबर के बीच 'खराब से गंभीर+' श्रेणी वाले दिनों की संख्या भी पिछले पांच साल में सबसे कम रही. 2026 में ऐसे 79 दिन दर्ज किए गए, जबकि 2025 और 2024 में 86-86, 2023 में 80 और 2022 में 127 दिन थे.
प्रदूषण कम करने की कोशिशें जारी
वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) दिल्ली-NCR में प्रदूषण को रोकने और कम करने के लिए अलग-अलग विभागों और संबंधित एजेंसियों के साथ मिलकर काम कर रहा है. आने वाले दिनों में हवा की गुणवत्ता बेहतर रखने के लिए इन प्रयासों को और तेज करने की बात कही गई है.
AQI 2.5 और 10 में क्या अंतर होता है?
वायु प्रदूषण में PM2.5 और PM10 के बीच मुख्य अंतर कणों के आकार और उनके शरीर में प्रवेश करने की गहराई का होता है. यहां 'PM' का मतलब पार्टिकुलेट मैटर (Particulate Matter) यानी हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों से है.
• PM10: इसका व्यास 10 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है. यह मानव बाल की मोटाई से लगभग 5 से 7 गुना छोटा होता है. इसके स्रोत धूल-मिट्टी, सड़क का कचरा, निर्माण स्थलों (Construction) की धूल और परागकण (Pollen) है.
• PM2.5: इसका व्यास 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है. यह मानव बाल की तुलना में लगभग 30 गुना पतला और बेहद बारीक होता है. इसके स्रोत वाहनों का धुआं, गाड़ियों से निकलने वाली गैस, फैक्टरी का कचरा और किसी भी ईंधन या पराली को जलाने से निकला धुआं हैं.
• PM10 का प्रभाव: ये आकार में बड़े होने के कारण आमतौर पर नाक और गले में ही फंस जाते हैं. इससे गले में खराश, खांसी और आंखों में जलन जैसी समस्याएं होती हैं.
• PM2.5 का प्रभाव: ये अत्यंत सूक्ष्म होने के कारण सांस के साथ सीधे फेफड़ों की गहराई तक पहुंच जाते हैं. यहां तक कि ये खून में भी घुल सकते हैं, जिससे दमा (Asthma), हार्ट अटैक और गंभीर सांस की बीमारियां का खतरा बढ़ जाता है.