7 महीने की गर्भवती सरपंच को हटाने की थी तैयारी…फिर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पहुंचा मामला, सुनाया बड़ा फैसला
सक्ती जिले में 7 महीने की गर्भवती सरपंच को कोर्ट से बड़ी राहत मिली है. कोर्ट ने गर्भावस्था को अहम मानते हुए अविश्वास प्रस्ताव की कार्रवाही पर रोक लगा दी है. इसके अलावा, कोर्ट ने क्या कहा है. आइए आपको विस्तार से बताते हैं.
छत्तीसगढ़ में एक सात महीने की गर्भवती ग्राम पंचायत की निर्वाचित सरपंच को हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है. कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए सरपंच के खिलाफ चल रही अविश्वास प्रस्ताव की कार्रवाही पर रोक लगा दी है. कोर्ट ने यह भी कहा कि ग्राम पंचायत के पंचों को सरपंच के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का कानूनी अधिकार है.
दरअसल, यह मामला सक्ती जिले की सिरियागढ़ ग्राम पंचायत की सरपंच मनीषा राज चौहान का है. सरपंच मनीषा चौहान के खिलाफ पंचायत के नौ पंचों ने उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की मांग की थी. यह मामला जब हाईकोर्ट पहुंचा तो कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए अविश्वास प्रस्ताव की प्रक्रिया पर रोक लगा दी.
मामला क्या है?
मिली जानकारी के मुताबिक, 17 सितंबर को ग्राम पंचायत के 9 पंचों ने आवेदन दिया था. उन्होंने उसमें कहा कि उनका विश्वास सरपंच मनीषा राज चौहान पर नहीं रहा है. उन्होंने 7 महीने की गर्भवती मनीषा चौहान को सरपंच पद से हटाने की मांग की थी. इसके बाद जब 21 सितंबर को अविश्वास प्रस्ताव पर बैठक बुलाने का नोटिस जारी किया गया. यह बैठक 1 अक्टूबर को दोपहर पंचायत भवन में रखी गई थी. लेकिन यह नोटिस सरपंच के पास 24 सितंबर को पहुंचा तो उन्होंने इस पर आपत्ति जताई.
हाईकोर्ट में दायर की याचिका
इसके बाद सरपंच मनीषा राज चौहान ने हाईकोर्ट में अविश्वास प्रस्ताव के खिलाफ एक याचिका दायर की. उनका कहना था कि अविश्वास प्रस्ताव के पीछे जिन बातों का जिक्र किया गया, उसकी उन्हें कोई जानकारी नहीं दी गई. ऐसे में अपने खिलाफ लगे आरोपों के जवाब देना मुश्किल था. उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें बैठक की तैयारी के लिए स्पष्ट समय भी नहीं मिल पाया. इसके अलावा, उन्होंने कोर्ट को बताया कि वह लगभग 7 महीने की गर्भवती हैं. उन्होंने अपनी गर्भावस्था से जुड़े दस्तावेजों को कोर्ट में पेश किया.
वित्तीय गड़बड़ी का आरोप
इतना ही नहीं पंचों ने सरपंच मनीषा राज चौहान पर चार अलग-अलग मामलों में कुल 12,92,914 रुपये की वित्तीय गड़बड़ी के आरोप भी लगाए थे. पंचों का कहना था कि इन पैसों से जुड़े काम भी पूरे नहीं हुए. इस पर राज्य सरकार की तरफ से कोर्ट को बताया कि संबंधित अधिकारियों ने इन आरोपों की बारीकी से जांच की. इसकी जांच के बाद अविश्वास प्रस्ताव शुरू करने के लिए पर्याप्त आधार भी बताया.
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
इस मामले पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अधिकारियों द्वारा रिकॉर्ड मंगवाने और रिकॉर्ड मिलने से पहले ही नोटिस जारी कर देने से पूरी कार्यवाही अपने आप अवैध नहीं हो जाती. यह भी देखना जरूरी होता है कि क्या किसी अनिवार्य कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ है. या फिर इससे सरपंच को कोई नुकसान हुआ है. हालांकि, हाईकोर्ट ने सरपंच मनीषा राज चौहान की उस आपत्ति को अहम माना, जिसमें उन्होंने कहा था कि उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए जिन दस्तावेजों और सामग्री का इस्तेमाल किया गया, वह उन्हें उपलब्ध नहीं कराई गई.
नोटिस पर कोर्ट ने क्या कहा
हाईकोर्ट ने कहा कि निष्पक्ष सुनवाई के लिए सरपंच को उनके खिलाफ इस्तेमाल किए गए दस्तावेज और सामग्री की जानकारी मिलना जरूरी है, ताकि वह आरोपों का सही जवाब दे सकें. कोर्ट ने नोटिस की अवधि पर भी कहा कि सात दिन की गणना नोटिस जारी होने की तारीख से नहीं, बल्कि उसके मिलने की तारीख से की जानी चाहिए. हालांकि, कोर्ट ने नोटिस को सीधे तौर पर अवैध नहीं माना. संबंधित अधिकारी को सरपंच की आपत्ति पर फैसला करने का निर्देश दिया.
गर्भावस्था को माना अहम
कोर्ट ने सरपंच की 7 महीने की गर्भावस्था को भी अहम माना है. कोर्ट ने कहा कि स्वास्थ्य का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है. पंचों को अविश्वास प्रस्ताव लाने का अधिकार है, लेकिन सरपंच को स्वास्थ्य और अजन्मे बच्चे से समझौता किए बिना अपना पक्ष रखने का उचित मौका मिलना चाहिए. फिलहाल, कोर्ट ने सरपंच मनीषा राज चौहान को बड़ा राहत दी है. लेकिन अविश्वास प्रस्ताव अभी खत्म नहीं हुआ है.