World Bank Report: भारत की बड़ी कामयाबी, 12 साल में 49.6 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर निकले; फिर भी अमीरी-गरीबी की खाई बरकरार
विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में गरीबी में भारी कमी आई है. लेकिन, साथ ही वेतन में 13 गुना का अंतर भी देखने को मिला है. ये निष्कर्ष आय में लगातार बनी हुई असमानता, नौकरियों की खराब गुणवत्ता और ग्रामीण इलाकों में अधिक गरीबी की ओर इशारा करते हैं.
India Reduces Extreme Poverty: आर्थिक मोर्चे पर भारत ने पिछले 12 वर्षों में बड़ी कामयाबी हासिल की है. विश्व बैंक के मुताबिक, भारत में अत्यधिक गरीबी यानी एक्सट्रीम पावर्टी की दर 2011 के 27.1% से घटकर 2023 में 2.6% रह गई है. इस दौरान, अनुमानित 49.6 करोड़ लोग 'लोअर-मिडिल-इनकम' (निम्न-मध्यम आय) गरीबी रेखा से ऊपर आ गए हैं.
कमाई में असमानता बरकरार
हालांकि, गरीबी में भारी कमी के बावजूद, देश में सबसे ज्यादा कमाने वाले और सबसे कम कमाने वाले लोगों के बीच का अंतर अभी भी काफी बड़ा है. सबसे अमीर 10% लोगों की कमाई, सबसे गरीब 10% लोगों की तुलना में लगभग 13 गुना अधिक है.
विश्व बैंक ने अपनी 'पावर्टी एंड इक्विटी ब्रीफ' (अक्टूबर 2026) में बताया कि भारत की वो आबादी जो 4.20 डॉलर प्रतिदिन की 'लोअर-मिडिल-इनकम' गरीबी रेखा से नीचे रहती है. उसका हिस्सा 2011 के 57.7% से घटकर 2023 में 16.1% रह गया है. इसी अवधि में, 3 डॉलर प्रतिदिन की रेखा के आधार पर मापी जाने वाली अत्यधिक गरीबी 27.1% से घटकर 2.6% हो गई है.
विश्व बैंक ने ये भी बताया कि 2023 में भारत का 'गिनी इंडेक्स' (Gini index) 23.0 था. ये सूचकांक इस बात को मापता है कि किसी देश की आबादी के बीच आय या उपभोग का वितरण कितना समान या असमान है.
विश्व बैंक ने कहा, 'मजदूरी में असमानता अभी भी काफी ज्यादा है. 2023 में सबसे अमीर 10% कामगारों की औसत कमाई, सबसे गरीब 10% कामगारों की तुलना में लगभग 13 गुना अधिक थी.
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अत्यधिक गरीबी घटकर 2.6% हुई
अत्यधिक गरीबी में कमी का मतलब है कि 2011 की तुलना में 2023 में भारत की बहुत कम आबादी 3 डॉलर प्रतिदिन की सीमा से नीचे रह रही थी. विश्व बैंक अत्यधिक गरीबी को मापने के लिए 3 डॉलर प्रतिदिन की रेखा का उपयोग करता है, जबकि 'लोअर-मिडिल-इनकम' वाले देशों में गरीबी मापने के लिए 4.20 डॉलर प्रतिदिन की रेखा को मानक (बेंचमार्क) माना जाता है.
ये दोनों सीमाएं 2021 की 'परचेजिंग पावर पैरिटी' (PPP) पर आधारित हैं. ये जीवन-यापन की लागत में होने वाले अंतर को ध्यान में रखकर तय की गई हैं. 12 साल की अवधि में रोजाना 4.20 डॉलर से कम कमाने वाले लोगों की हिस्सेदारी 57.7% से घटकर 16.1% हो गई. विश्व बैंक के अनुसार, इससे लगभग 496 मिलियन (49.6 करोड़) लोग गरीबी रेखा से ऊपर आ गए.
गैर-मौद्रिक पैमानों पर भी गरीबी में कमी आई है. ऑक्सफोर्ड पॉवर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनिशिएटिव के 'मल्टीडायमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स' (बहुआयामी गरीबी सूचकांक) के अनुसार, गरीबी दर 2005-06 में 53.8% थी, जो 2019-21 में घटकर 16.4% रह गई है. 2022-23 में विश्व बैंक का अपना 'मल्टीडायमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स' 15.5% रहा.
आय असमानता: भारत का गिनी इंडेक्स 23 पर है
विश्व बैंक के मुताबिक, 2023 में भारत का गिनी इंडेक्स 23.0 था. इस इंडेक्स का इस्तेमाल यह मापने के लिए किया जाता है कि किसी आबादी के बीच आय या उपभोग (खर्च) का वितरण कितना समान या असमान है.
ये शून्य से 100 के पैमाने पर होता है. शून्य का स्कोर पूरी तरह से समानता को दर्शाता है, जहां हर किसी की आय या उपभोग एक समान होता है. 100 का स्कोर सबसे अधिक असमानता को दिखाता है, जहां एक व्यक्ति के पास सब कुछ होता है और बाकी सबके पास कुछ भी नहीं.
सरल शब्दों में कहें तो कम गिनी स्कोर का मतलब है कि डिस्ट्रीब्यूशन अधिक समान है, जबकि हाई स्कोर अधिक असमानता को दर्शाता है. विश्व बैंक के पैमाने के मुताबिक, भारत का 23 का स्कोर ये बताता है कि यहां आय डिस्ट्रीब्यूशन में असमानता का स्तर काफी कम है.
हालांकि, इसका मतलब ये नहीं है कि हर कोई एक जैसी कमाई करता है या अधिक और कम कमाने वालों के बीच का अंतर बहुत कम है. गिनी इंडेक्स पूरी आबादी में आय के डिस्ट्रीब्यूशन को देखता है. ये केवल सबसे अमीर और सबसे गरीब समूहों की कमाई की तुलना नहीं करता है.
विश्व बैंक के मुताबिक, सबसे ज्यादा कमाने वाले 10% लोग, सबसे कम कमाने वाले 10% लोगों की तुलना में 13 गुना अधिक कमाते हैं. आसान शब्दों में कहें तो अगर सबसे कम कमाने वाले 10% लोगों के बीच का कोई कर्मचारी 1,000 रुपये कमाता है, तो सबसे अधिक कमाने वाले 10% लोगों के बीच का कोई कर्मचारी लगभग 13,000 रुपये कमाएगा. ये सिर्फ अनुपात को समझाने का एक उदाहरण है, न कि विश्व बैंक द्वारा बताई गई कमाई के वास्तविक आंकड़े.
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यही वजह है कि गिनी इंडेक्स और 13 गुना वेतन अंतर (wage gap) दोनों एक साथ हो सकते हैं. गिनी इंडेक्स पूरी आबादी में असमानता को मापता है, जबकि वेतन अंतर दो खास समूहों की मीडियन कमाई की तुलना करता है.
विश्व बैंक ने ये भी चेतावनी दी है कि उनके घरेलू सर्वेक्षणों में अमीर परिवारों के उपभोग (खर्च) का पूरा ब्यौरा शायद न आ पाए, इससे असमानता के आंकड़े असल से कम दिख सकते हैं.
रोजगार में ग्रोथ, लेकिन कमाई में कोई खास बदलाव नहीं
वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, रोजगार में ग्रोथ हुई है, लेकिन वास्तविक कमाई में कोई खास बदलाव नहीं आया है. विश्व बैंक ने कहा कि भारत में गरीबी कम होने के मुख्य कारण थे. इसमें खपत में मजबूत ग्रोथ , रोजगार में बढ़ोतरी (खासकर महिलाओं के बीच) और खाद्य सब्सिडी सहित सामाजिक सहायता योजनाओं का विस्तार जैसे चींजों ने भारत में गरीबी कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
रोजगार की गुणवत्ता और कमाई को लेकर चिंता
2017 से 2023 के बीच रोजगार में लगभग 134 मिलियन लोगों की ग्रोथ हुई, जो कामकाजी उम्र की आबादी में हुई ग्रोथ से लगभग दोगुनी है. इस बढ़ोतरी का एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण महिलाओं के वेतन वाले काम से जुड़ने और परिवारों में कमाने वालों की संख्या बढ़ने से आया है.
हालांकि, रिपोर्ट में रोजगार की गुणवत्ता और कमाई को लेकर चिंता जताई गई है. वास्तविक कमाई में कोई खास बदलाव नहीं आया, जबकि रोजगार में ग्रोथ मुख्य रूप से कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों में हुई.
युवा बेरोजगारी भी वित्त वर्ष 2026 की पहली तिमाही में 14.6% से बढ़कर वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में 15.9% हो गई. ये विशेष रूप से ग्रामीण युवा महिलाओं के बीच देखी गई.
रिपोर्ट में गरीबी के भौगोलिक डिस्ट्रीब्यूशन में असमानता को भी उजागर किया गया है. 2023 में 4.20 डॉलर प्रतिदिन की आय रेखा के आधार पर, ग्रामीण आबादी में गरीबी दर 19.3% थी, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 8.6% थी. विश्व बैंक के अनुसार, उत्तर प्रदेश से लेकर पश्चिम बंगाल तक फैले एक निरंतर क्षेत्र (बेल्ट) में रहने वाले परिवारों की संख्या भारत की कुल गरीब आबादी का लगभग 57% है.