Tata Trusts Rift: टाटा ट्रस्ट्स में बढ़ी रार! टाटा संस के रीस्ट्रक्चरिंग प्लान पर दो ट्रस्टियों ने क्यों उठाए सवाल?
वेनू श्रीनिवासन और विजय सिंह ने सवाल उठाया है कि SDTT ने टाटा संस के रीस्ट्रक्चरिंग प्रस्ताव का समर्थन कैसे किया? ये सवाल ऐसे समय में उठा है, जब टाटा संस NBFC नियमों और लिस्टिंग के दबाव से जूझ रही है.
Tata Trusts Row : टाटा ट्रस्ट्स के अंदर खींचतान बढ़ गयी है. टाटा ट्रस्ट्स के अंदर चल रहा झगड़ा अब खुलकर सामने आने लगा है. सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (SDTT) के दो सीनियर ट्रस्टी- वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह ने उस प्रोसेस पर सवाल उठाए हैं, जिसके जरिए ट्रस्ट ने टाटा संस के रीस्ट्रक्चरिंग प्रपोजल का समर्थन किया था.
SDTT ट्रस्टियों को 30 सितंबर को लिखे एक लेटर में श्रीनिवासन और विजय सिंह ने कहा कि प्रस्तावित रीस्ट्रक्चरिंग का समर्थन करने वाला 28 सितंबर का लेटर टाटा संस बोर्ड को भेजने से पहले उनसे कोई सलाह-मशविरा नहीं किया गया था. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों ट्रस्टियों ने कहा कि लेटर भेजने से पहले प्रपोजल पर चर्चा या विचार-विमर्श करने के लिए SDTT ट्रस्टियों की कोई मीटिंग नहीं हुई थी.
ट्रस्टी किन बातों पर सवाल उठा रहे हैं?
28 सितंबर के प्रपोजल में टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम्स सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड (TESS) और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स (TCE) का टाटा संस के साथ मर्जर करने की बात कही गई थी. टाटा ट्रस्ट्स ने कहा था कि इस रीस्ट्रक्चरिंग से टाटा संस को NBFC या कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) के तौर पर क्लासिफाई होने से बचने में मदद मिलेगी. इससे कंपनी उस रेगुलेटरी फ्रेमवर्क से बाहर आ सकती है जिसके तहत उसे अनिवार्य रूप से लिस्ट होना पड़ता है.
लेकिन, श्रीनिवासन और विजय सिंह ने सवाल उठाया है कि क्या 28 सितंबर के लेटर को SDTT की इंस्टीट्यूशनल स्टेटस माना जा सकता है, जबकि ट्रस्टियों ने इस पर सामूहिक रूप से विचार-विमर्श नहीं किया था. उन्होंने ये भी सवाल उठाया है कि क्या किसी शेयरहोल्डर को टाटा संस बोर्ड को ऐसी रीस्ट्रक्चरिंग मंजूर करने का निर्देश देना चाहिए जो बोर्ड की स्वतंत्र निर्णय लेने की जिम्मेदारियों के दायरे में आती है.
विजय सिंह ने गवर्नेंस की जांच की मांग की
ET की रिपोर्ट के अनुसार, टाटा ट्रस्ट्स के वाइस चेयरमैन और SDTT के ट्रस्टी विजय सिंह ने महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर से SDTT के एडमिनिस्ट्रेशन और गवर्नेंस की तुरंत जांच की मांग की थी. इसमें टाटा संस के कमर्शियल और स्ट्रैटेजिक मामलों में SDTT की भूमिका की जांच भी शामिल थी. उन्होंने तर्क दिया था कि टाटा संस में SDTT की बड़ी हिस्सेदारी का मतलब ये नहीं होना चाहिए कि ट्रस्ट किसी कमर्शियल कंपनी की तरह काम करे या टाटा संस के बिजनेस मामलों में सीधे तौर पर शामिल हो.
सिंह ने जांच में खामियां मिलने पर जरूरी कार्रवाई की भी मांग की थी. इसमें जरूरत पड़ने पर ट्रस्टियों को सस्पेंड करना या हटाना शामिल था. उन्होंने जांच के दौरान SDTT और उसके बोर्ड को कुछ एडमिनिस्ट्रेटिव काम करने से रोकने के लिए निर्देश भी मांगे थे.
चैरिटेबल स्टेटस को लेकर चिंताएं
दोनों ट्रस्टियों ने ट्रस्ट के चैरिटेबल स्टेटस पर संभावित असर को लेकर भी चिंता जताई है. उन्होंने सवाल उठाया कि अगर टाटा संस के साथ ट्रस्ट की बातचीत का मतलब ये निकाला जाए कि ट्रस्ट ग्रुप की होल्डिंग कंपनी के कमर्शियल फैसलों को निर्देशित कर रहे हैं, तो इसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं. ट्रस्टीज ने रतन नवल टाटा का जिक्र करते हुए कहा कि ये एक ऐसा मुद्दा है जिस पर रतन टाटा के समय में ट्रस्ट ने लड़ाई लड़ी थी.