बिहार एमएलसी चुनाव नतीजों का सियासी संदेश: पुराने चेहरों पर सवाल, नए लोगों को मौका, राजद-कांग्रेस का टशन ठीक नहीं, अनंत सिंह को खास सबक
हर चुनाव कोई न कोई संदेश देकर जाता है. विधान परिषद चुनाव से भी कई संदेश निकले हैं. संदेश किसी एक दल के लिए नहीं है, सभी दलों या गठबंधन के लिए है. चुनाव-दर-चुनाव मिले संदेश को ग्रहण करने से आगे के चुनावों की तैयारी करने में सहूलियत होती है.
बिहार विधान परिषद की 8 सीटों के चुनाव परिणामों ने राज्य की राजनीति को लेकर कुछ संदेश दिए हैं. इन संदेशों में बदलाव और निरंतरता दोनों का मिश्रण है. शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में चारों सीटिंग विधान पार्षद चुनाव हार गए, वहीं स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में कुछ पुराने प्रतिनिधियों को जीत मिली है तो कुछ सीटों पर नए प्रत्याशियों को विजयश्री हा आशीर्वाद मिला है. रिजल्ट से जाहिर होता है कि कम मतदाता वाले इन सीटों पर भी पार्टी का संगठन, रणनीति और उम्मीदवार की विश्वसनीयता काफी मायने रखती है और इससे स्थानीय समीकरण बदल सकते हैं. महागठबंधन के लिए सबक है कि राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के बीच टशन से विपक्ष को नुकसान हो रहा है. अगर दोनों मिलकर चुनाव लड़ते तो महागठबंधन के लिए तस्वीर और बेहतर हो सकती थी.
पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में बड़ा उलटफेर
इन सभी 8 सीटों में से राजनीतिक महत्व के लिहाज से सबसे बड़ी जीत पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में राष्ट्रीय जनता दल के डॉ. संजीव ने हासिल की. उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के नवल किशोर यादव को हराया. यह बहुत बड़ा उलटफेर है. एक तो शहरी मतदाताओं वाले सीट पर राष्ट्रीय जनता दल की जीत काफी मायने रखती है और दूसरी पिछले 30 साल से नवल किशोर यादव इस सीट पर काबिज थे और उनको हराकर राजद ने प्रबुद्ध वर्ग में भी अपनी जगह बनाई है. इससे जाहिर होता है कि शिक्षकों की सेवा संबंधी समस्याएं, वेतन, पदोन्नति और प्रतिनिधियों की सक्रियता चुनावी फैसलों को प्रभावित करती है.
जन सुराज पार्टी को खास उपलब्धि
दरभंगा शिक्षक सीट पर जन सुराज के डॉ. सुरेश प्रसाद राय ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. मदन मोहन झा को हरा दिया. इसके साथ ही जन सुराज पार्टी ने विधान परिषद में अपना डेब्यू किया है. जन सुराज पार्टी के लिए यह किसी उपलब्धि से कम नहीं है. तिरहुत शिक्षक सीट की बात करें तो यहां से भाजपा के नरेंद्र प्रसाद सिंह ने जीत दर्ज की. उन्हें 2,945 मत मिले, जबकि निर्दलीय भूषण झा को 2,351 और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के निवर्तमान विधान पार्षद संजय कुमार सिंह को 1,967 वोट मिले.
प्रत्याशी चयन में खास सतर्कता की जरूरत
सारण शिक्षक सीट पर निर्दलीय राहुल राज ने जदयू के आनंद पुष्कर और जन सुराज के आफाक अहमद को पीछे छोड़कर दलगत समीकरणों को चुनौती दी. स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में पटना से जदयू के नीरज कुमार ने लगातार चौथी बार जीत दर्ज की. दरभंगा से भाजपा के सर्वेश कुमार और कोसी से भाजपा के डॉ. एनके यादव भी अपनी सीटें जीतने में सफल रहे. हालांकि, तिरहुत स्नातक सीट पर निर्दलीय वंशीधर ब्रजवासी ने जदयू के अभिषेक झा को हराकर पार्टी को झटका दिया.
बीजेपी को मिलीं दो स्नातक और एक शिक्षक सीट
इन चुनावों में भाजपा को तिरहुत शिक्षक और दो स्नातक सीटों पर सफलता मिली, लेकिन पटना शिक्षक सीट पर हार ने पुराने चेहरों की स्वीकार्यता पर सवाल उठाए. जदयू को पटना स्नातक सीट पर राहत मिली, जबकि सारण शिक्षक और तिरहुत स्नातक सीटों पर उसे झटका लगा. राजद ने पटना शिक्षक सीट जीतकर अपनी उपस्थिति मजबूत की, जबकि कांग्रेस दरभंगा शिक्षक सीट गंवा बैठी. जन सुराज ने एक सीट जीतकर अपनी चुनावी संभावनाओं का संकेत दिया.
अनंत सिंह! उछलकूद बहुत हो गई, अब जरा संभलना
यह चुनाव अनंत सिंह जैसे बाहुबलियों के लिए भी खास संदेश देता है. अगर राजनीति में लंबे समय तक बने रहता है तो ज्यादा उछलकूद अच्छा नहीं होता. और अगर आप किसी सत्ताधारी दल के साथ जुड़े हैं तब तो यह और भी अच्छा नहीं होता. अभी तो केवल अनंत सिंह को दल से निकाला गया है, उनकी पत्नी को 20 सूत्री समिति से हटाया गया है, राज्यमंत्री का दर्जा छीना गया है, भवन खाली करने का नोटिस दिया गया है और विधानसभा की सदस्यता रद्द करने के लिए स्पीकर को मांगपत्र दिया गया है. अनंत सिंह की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं. खबर है कि आईजी स्तर के एक अधिकारी को उनकी फाइलें खोलने को कहा गया है. अगर ऐसा होता है तो समझिए कि अनंत सिंह ने अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार ली है.
READ ALSO: बिहार MLC चुनाव रिजल्ट: एनडीए की जीत पर BJP-JDU का विपक्ष पर हमला, खुद के गिरेबान में झांकने की सलाह
सूत्रों के अनुसार, एक खबर यह भी है कि अगले विधानसभा चुनाव के लिए अनंत सिंह को टक्कर देने के लिए जनता दल यूनाइटेड की ओर से सोनू-मोनू से संपर्क किया गया है. उन्हें चुनाव की तैयारी में जुट जाने को कहा गया है. अगले विधानसभा चुनाव में मोकामा सीट से अनंत सिंह अपने बेटे को लांच करने की प्लानिंग बना रहे हैं, लेकिन वहां से उन्हें सोनू-मोनू गैंग से कड़ी टक्कर मिल सकती है. बाहुबल में भी अनंत सिंह को सोनू-मोनू गैंग से बराबर की टक्कर मिलती रही है.
सबके लिए कुछ खास
हालांकि, इन परिणामों को पूरे बिहार का जनमत नहीं माना जा सकता. शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की चुनावी प्रकृति अलग होती है और आम चुनाव की अलग. फिर भी नतीजे बताते हैं कि पार्टी का नाम ही जीत की गारंटी नहीं है. उम्मीदवार की स्वीकार्यता, मतदाताओं से सीधा संपर्क और उनकी समस्याओं के प्रति संवेदनशीलता महत्वपूर्ण हैं. कुल मिलाकर, विधान परिषद चुनाव के नतीजों ने राजनीतिक दलों को संगठन मजबूत करने, आंतरिक मतभेद दूर करने और मतदाताओं के साथ निरंतर संवाद बनाए रखने का संदेश दिया है. पुराने राजनीतिक गढ़ों की रक्षा और नए विकल्पों की सफलता, दोनों का आधार जनता का भरोसा है. चुनाव जीतना प्रतिनिधित्व की शुरुआत है, जबकि असली परीक्षा चुनाव के बाद जवाबदेही निभाने की होती है.