समस्तीपुर में कुम्हारों के पुश्तैनी धंधे पर संकट! महंगी मिट्टी और चाइनीज सामान ने छीनी कमाई, सरकार से लगाई गुहार
दीपावली नजदीक आते ही समस्तीपुर जिले में कुम्हारों के चाक की रफ्तार बढ़ गई है. घरों में मिट्टी के दीये और भगवान गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां तैयार की जा रही हैं. हालांकि, महंगी मिट्टी और बाजार में चाइनीज सामान की बढ़ती मांग ने कुम्हारों के कारोबार के सामने चुनौती खड़ी कर दी है.
आधुनिकता के दौर में कला-संस्कृति से जुड़े पारंपरिक हुनर की अनदेखी का सबसे अधिक असर पुश्तैनी धंधों पर पड़ा है. मिट्टी के दीये और दूसरी पारंपरिक वस्तुएं बनाने वाले कुम्हार भी इससे अछूते नहीं हैं. हर साल दीपावली नजदीक आते ही ग्रामीण इलाकों और कस्बों में दीये और उनसे जुड़ी दूसरी वस्तुएं बनाने के लिए चाक की रफ्तार बढ़ जाती है. कुम्हारों के चेहरे पर रोजगार की उम्मीद लौट आती है, लेकिन त्योहार बीतते ही यह रौनक धीरे-धीरे गायब हो जाती है. विषम परिस्थितियों के बावजूद जिन परिवारों ने मिट्टी की कला का दामन थामे रखा है, उनका संघर्ष महज मजबूरी नहीं, बल्कि अपनी परंपरा और हुनर के प्रति लगाव का भी प्रतीक है.
दीपावली पर कुम्हारों के घरों में रौनक
समस्तीपुर जिले के हर कुम्हार समाज के दरवाजे पर दीपावली की तैयारियों की रौनक साफ दिखाई देती है. कहीं चाक पर मिट्टी के दीये आकार ले रहे हैं, तो कहीं तैयार दीये, खिलौने और भगवान गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां सुखाकर बिक्री के लिए रखी जा रही हैं. परिवार के बड़े-बुजुर्गों से लेकर युवा और महिलाएं तक इस काम में जुटे हैं. किसी के जिम्मे मिट्टी तैयार करने का काम है, तो कोई चाक पर दीये बना रहा है. कुछ लोग तैयार वस्तुओं को धूप में सुखाते हैं, जबकि अन्य उन्हें रंगने और सजाने में हाथ बंटाते हैं. त्योहार के दौरान परिवार के सभी सदस्यों का सामूहिक श्रम घरों को कामकाज और उम्मीदों से भर देता है. हालांकि, इस रौनक के पीछे साल भर की आर्थिक जद्दोजहद भी छिपी है. दीपावली के कुछ दिनों पहले तक जिस पुश्तैनी हुनर की बाजार को जरूरत महसूस होती है, त्योहार बीतने के बाद उसकी मांग काफी कम हो जाती है. ऐसे में कुम्हारों के सामने नियमित काम और आमदनी बनाए रखने की चुनौती खड़ी हो जाती है.
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महंगी मिट्टी और कम कमाई से परेशान कुम्हार
चाक पर दीये बना रहीं एक महिला ने बताया कि यह काम उनके पूर्वज करते आ रहे हैं और समाज की जरूरतों को पूरा करते रहे हैं. अब वे उसी परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं, लेकिन परिवार चलाना काफी मुश्किल हो गया है. उन्होंने बताया कि मिट्टी चार से छह हजार रुपये प्रति ट्रेलर मिलती है, जबकि उससे तैयार होने वाले सामान की बाजार में उचित कीमत नहीं मिल पाती है. इससे पुश्तैनी काम पर काफी असर पड़ा है. वहीं, इस काम से जुड़े जितेंद्र पंडित ने बताया कि बाजारों में चाइनीज सामान की उपलब्धता और उसके बढ़ते इस्तेमाल से मिट्टी से बनी वस्तुओं की मांग प्रभावित हो रही है. उन्होंने सरकार से कुम्हार समाज के हित में नियम बनाने की मांग की, ताकि लोग मिट्टी से बने सामान का अधिक इस्तेमाल करें और समाज के सभी वर्गों के बीच आर्थिक संतुलन बना रहे.
सरकार से लगाई गुहार
मिट्टी कला से जुड़े लोगों के लिए कुम्हार जिला संघ के अध्यक्ष ने बिहार सरकार से मिट्टी कला बोर्ड का गठन करने की मांग की. उन्होंने कहा कि कुम्हारों को आधुनिक उपकरण, तकनीकी प्रशिक्षण और उत्पादों की बिक्री के लिए बेहतर बाजार उपलब्ध कराने की जरूरत है. यदि इस दिशा में ठोस पहल की जाए, तो पारंपरिक हुनर को संरक्षित करने के साथ कारीगरों की आजीविका भी मजबूत हो सकती है. इससे मिट्टी की कला केवल दीपावली तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि साल भर रोजगार का माध्यम बन सकेगी. कुम्हारों को उम्मीद है कि सरकार उनकी समस्याओं पर ध्यान देगी और उनके पुश्तैनी व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी कदम उठाएगी.
रिपोर्ट: मंटुन कुमार रॉय