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मिस्र में 398 वोटों का महा-इम्तिहान: अल सीसी का 'सऊदी प्लान', क्या सेना भेजने को संसद से मिलेगी हरी झंडी?

सऊदी अरब में सेना भेजने के प्रस्ताव पर 26 अक्टूबर को इजिप्ट की संसद में वोटिंग होनी है. लेकिन यह डगर क्या इतनी आसान है. इजिप्ट की संसद में क्या स्थिति है, चलिए आपको बताते हैं.

Written By Rachit Kumar
Published: Oct 26, 2026, 07:11 AM IST | Updated: Oct 26, 2026, 07:19 AM IST
Image Credit: इजिप्ट में आज बड़ा दिन है.
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मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल सीसी ने सऊदी अरब को सैन्य मदद भेजने की गुजारिश की है. आज यानी 26 अक्टूबर को इसी पर मुल्क की प्रतिनिधि सभा में मतदान होना है.  संविधान के अनुच्छेद 152 के तहत इस प्रस्ताव को पारित करने के लिए सदन के 596 सदस्यों में से 398 का समर्थन चाहिए. टीबीएस न्यूज और द न्यू अरब के मुताबिक, पहले यह मतदान 19 अक्टूबर को होना था, लेकिन सांसदों ने एएफपी को बताया कि कि इसे एक हफ्ते के लिए टाल दिया गया है.

इस वोटिंग से यह तय होगा कि क्या मिस्र के राष्ट्रपति के पास सऊदी अरब की सिक्योरिटी के लिए अपनी सेना भेजने का अधिकार है या नहीं. विपक्ष के दो गुटों ने कहा है कि वे इसका समर्थन नहीं करेंगे. इसके अलावा, समर्थन करने वाली पार्टियों के कम से कम दो सांसदों ने भी अपनी असहमति जताई है.

वहीं, हूती आंदोलन ने अपने राजनीतिक ब्यूरो और अपनी विधायिका के जरिए मिस्र की संसद को चेतावनी भेजी है. मिस्र 'मक्का पैक्ट' का हिस्सा नहीं है. इस पैक्ट में सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान हैं. इसलिए, मिस्र जो भी मदद भेजेगा, वह अपने संविधान और अपने यहां होने वाले मतदान के आधार पर ही भेजेगा.

सीसी ने संसद से किस बात की मंजूरी मांगी?

सीसी ने 17 अक्टूबर को संसद के सामने यह अनुरोध रखा, जिसे उन्होंने बहुत सीमित दायरे में पेश किया. एपी के मुताबिक सीसी ने कहा,'मैं किसी से टकराव या हमले की बात नहीं कर रहा हूं. हम केवल रक्षा की बात कर रहे हैं.'

गल्फ न्यूज के मुताबिक, इसके एक दिन बाद, 18 अक्टूबर को मिस्र की राष्ट्रीय रक्षा परिषद ने सऊदी अरब को हर तरह की जरूरी और मुमकिन सहायता देने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी. परिषद के बयान में यह नहीं बताया कि इस मदद में जमीनी सैनिक शामिल होंगे या नहीं, और न ही इसमें सैनिकों की संख्या बताई गई है. इसे ही लेकर विपक्ष विरोध कर रहा है कि अधिकार में न तो सेना का आकार तय है, न ही कोई क्लियर मिशन या खत्म होने की तारीख.

उसी दिन सीसी के सार्वजनिक बयानों से यह साफ हो गया कि वे किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. द नेशनल के मुताबिक, उन्होंने कहा,'यह सोचना भी नामुमकिन है कि हम सऊदी अरब, उसकी सुरक्षा या स्थिरता को कोई नुकसान पहुंचने देंगे.' अल-हुरा के मुताबिक, राष्ट्रपति की गुजारिश पर यह सत्र बंद दरवाजे के पीछे होगा.

क्या इस प्रस्ताव को मिल पाएंगे 398 वोट?

कागजों पर तो सरकार के पास पर्याप्त संख्या बल है. साल 2025 के संसदीय चुनाव में सरकार समर्थक नेशनल यूनिफाइड लिस्ट ने 403 या उससे ज्यादा सीटें जीती थीं. इनमें नेशन्स फ्यूचर के पास 227, 'होमलैंड डिफेंडर्स' के पास 86, नेशनल फ्रंट के पास 65 और रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी के पास 25 सीटें हैं. 'अल-हुरा'ने जनवरी 2026 के मिस्र के स्टेट इंफॉर्मेशन सर्विस के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि विपक्ष के पास 53 सीटें हैं.

लेकिन, आंकड़ों का यह गणित उतना आसान नहीं है जितना कि कुल संख्या को देखकर लगता है. अगर सिर्फ इन चार पार्टियों को देखें, तो कागजों पर ये बहुमत के लिए जरूरी संख्या से 5 सीटें ज्यादा रखती हैं. इसके आगे की स्थिति राष्ट्रपति की ओर से मनोनीत सदस्यों, छोटी पार्टियों और सबसे अहम बात मौजूदगी पर निर्भर करेगी. चूंकि दो-तिहाई बहुमत के लिए कुल सदस्यों की संख्या को आधार माना जाता है, इसलिए जो सांसद घर पर रहता है या वोटिंग में हिस्सा नहीं लेता, उसका असर भी वैसा ही होता है जैसा कि 'नहीं' में वोट देने वाले सांसद .

हूतियों ने मिस्र को क्या जवाब दिया है?

हूतियों ने एक साथ दो संदेश दिए हैं, जो अलग-अलग दिशाओं की तरफ इशारा करते हैं. पहला संदेश नैतिक है. 'न्यू लाइन्स मैगजीन' के मुताबिक, इस आंदोलन के राजनीतिक ब्यूरो के सदस्य मोहम्मद अल-बुखैती ने कहा, किसी भी तरह की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भागीदारी, यमन के खिलाफ किए जा रहे अपराध और अन्याय में शामिल होने के बराबर है.' यहां प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष शब्द अहम हैं. यह उस फर्क को खत्म कर देते हैं, जिसे रेदा अब्दुलसलाम और सीसी ने सऊदी की रखवाली करने और यमन में लड़ने के बीच दिखाने की कोशिश की थी.

इसके बाद, 'अल-अरबी टीवी' को दिए एक इंटरव्यू में अल-बुखैती ने अपना लहजा थोड़ा नरम किया. वायनेट न्यूज के अनुसार, उन्होंने कहा,'हमें उम्मीद नहीं है कि मिस्र यमन के खिलाफ आक्रामकता में शामिल होगा. मिस्र इससे कहीं बड़ा है.'

सदन को हूतियों ने भेजा खत

दूसरा संदेश औपचारिक तरीकों से आया और यह कहीं ज्यादा सख्त था. सना में हूतियों की ओर से चलाई जा रही संसद के स्पीकर, याह्या अली अल-राई ने मिस्र की संसद के स्पीकर हिशाम बदवी को सीधे खत लिखा. द नेशनल और शिन्हुआ के अनुसार, अल-राई ने लिखा कि मिस्र को तकफीरी ताकतों और इजरायली कब्जे वाली सत्ता के साथ एक ही पाले में नहीं आना चाहिए. उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसा करना मिस्र की राष्ट्रीय सुरक्षा और आंतरिक स्थिरता के लिए एक गंभीर खतरा पैदा करेगा.'

यह खत उस सदन को भेजा गया, जिसके सदस्य इस पर मतदान करेंगे, न कि उस राष्ट्रपति कार्यालय को जिसने यह गुजारिश की है. हूतियों ने अपने किसी भी सार्वजनिक बयान में यह साफ नहीं किया है कि अगर यह प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो वे मिस्र के खिलाफ क्या कदम उठाएंगे.

लेकिन मिस्र को दी गई ये चेतावनियां उन सैन्य टकरावों के बीच आई हैं, जिनका जिक्र इस साइट पर अन्य जगहों पर भी किया गया है, जैसे मक्का और मदीना के ऊपर मिसाइल अलर्ट, सऊदी तेल भंडारों और हवाई अड्डों पर हूतियों के हमले, सना और मोचा पर गठबंधन सेना के हमले.

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रचित कुमार जी न्यूज डिजिटल में असिस्टेंट एडिटर हैं. देश, दुनिया और डिफेंस की खबरों को आसान भाषा में बताने में महारत हासिल है. जी न्यूज से मई 2022 में जुड़े और शिफ्ट देखने का 12 साल से ज्यादा का अनुभव है. जी न्यूज में Best Performer अवॉर्ड भी मिल चुका है. जी न्यूज, आजतक और एबीपी न्यूज में शिफ्ट देखते हुए महामहिम, बिहार के बाहुबली सीरीज शुरू की और कई एक्सप्लेनर खबरों पर काम किया.  इंडिया न्यूज और जनसत्ता में शिफ्ट देखने के साथ-साथ ट्रैफिक लाने वाली खबरों को तवज्जो दी. नवभारत टाइम्स से करियर की शुरुआत हुई और वहां तकरीबन ढाई साल तक फ्रंट पेज 2 और देश-विदेश के पन्नों की जिम्मेदारी संभाली. जर्नलिज्म में पोस्टग्रेजुएट और IIMC से डिप्लोमा करने  वाले रचित कुमार 13 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में काम कर रहे हैं. आप Rachit.kumar@India.com पर सीधे ईमेल कर इनसे जुड़ सकते हैं. 
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