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कागज के स्ट्रॉ पर्यावरण के लिए प्लास्टिक से अधिक हानिकारक? रिसर्च में सामने आया चौंकाने वाला सच

क्या कागज के स्ट्रॉ प्लास्टिक से भी ज्यादा नुकसानदेह हैं? हालिया रिसर्च में सामने आया है कि इनमें मौजूद केमिकल्स (PFAS) और इनका उत्पादन पर्यावरण और सेहत को भारी नुकसान पहुंचा सकता है. जानें पूरा सच.

Written By Ravindra Pratap Singh
Published: Oct 29, 2026, 11:45 PM IST | Updated: Oct 29, 2026, 11:57 PM IST
Image Credit: क्या कागजी स्ट्रॉ सचमुच 'इको-फ्रेंडली' हैं? हालिया रिसर्च से सामने आया एक चौंकाने वाला सच
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प्लास्टिक के बढ़ते प्रदूषण को रोकने के लिए पिछले कुछ वर्षों में कागजी (पेपर) स्ट्रॉ को एक बेहतरीन और 'पर्यावरण-अनुकूल' विकल्प के रूप में बढ़ावा दिया गया. रेस्तरां, कैफे और जूस सेंटर्स में प्लास्टिक की जगह कागज की स्ट्रॉ का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा. हालांकि, हाल ही में दक्षिण कोरिया में हुए एक नए अध्ययन ने इस धारणा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. 

इस रिसर्च के मुताबिक, पेपर स्ट्रॉ अपनी पूरी जीवन चक्र (Life Cycle) प्रक्रिया के दौरान प्लास्टिक स्ट्रॉ की तुलना में पर्यावरण और सेहत के लिए अधिक नुकसानदेह साबित हो सकती हैं. दक्षिण कोरिया के जलवायु, ऊर्जा और पर्यावरण मंत्रालय द्वारा कराए गए इस अध्ययन को पीपुल्स पावर पार्टी के प्रतिनिधि किम वाई-सांग द्वारा सार्वजनिक किया गया. इस अध्ययन में चार मुख्य प्रकार की स्ट्रॉ का तुलनात्मक आकलन किया गया:

रिसर्च के नतीजों ने सभी को हैरान कर दिया. अध्ययन में पाया गया कि अपनी निर्माण प्रक्रिया (Manufacturing), इस्तेमाल और कचरे के निपटान (Disposal) के पूरे लाइफ-साइकिल के दौरान, कागजी स्ट्रॉ का कार्सिनोजेनिक (कैंसर का कारण बनने वाला) प्रभाव पारंपरिक प्लास्टिक स्ट्रॉ की तुलना में 6.33 गुना अधिक दर्ज किया गया.

इस सूची में बायो-बेस्ड पॉलीइथिलीन (Bio-PE) स्ट्रॉ की स्थिति सबसे खराब पाई गई, जिसका प्रभाव पारंपरिक प्लास्टिक से 16.18 गुना अधिक था. वहीं, बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक स्ट्रॉ का प्रभाव प्लास्टिक की तुलना में 3.34 गुना अधिक दर्ज किया गया.

बायो-PE और बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक में क्या अंतर है?

अध्ययन में स्पष्ट किया गया कि 'बायो-PE' गन्ने जैसे प्राकृतिक और जैविक स्रोतों से तैयार किया जाता है, लेकिन रासायनिक रूप से यह पूरी तरह से पारंपरिक पॉलीइथिलीन जैसा ही होता है. सबसे बड़ी बात यह है कि बायो-PE स्ट्रॉ प्राकृतिक रूप से सड़ती या गलती (Biodegrade) नहीं हैं. इसलिए इसे बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक समझने की भूल नहीं की जानी चाहिए; दोनों में बड़ा अंतर है.

कचरे के निपटान की प्रक्रिया और अध्ययन का आधार

वैज्ञानिकों ने इस जीवन चक्र मूल्यांकन (Life-Cycle Assessment) को तैयार करते समय यह भी ध्यान रखा कि इस्तेमाल के बाद इन स्ट्रॉ को कैसे नष्ट किया जाता है. दक्षिण कोरिया के राष्ट्रीय अपशिष्ट आंकड़ों के आधार पर, शोधकर्ताओं ने माना कि:

73.6% इस्तेमाल की गई स्ट्रॉ को जलाया (Incinerate) जाता है.

26.4% इस्तेमाल की गई स्ट्रॉ लैंडफिल (कचरे के ढेरों) में फेंक दी जाती हैं.

जलाने और सड़ने की इस पूरी प्रक्रिया में निकलने वाली गैसों और रासायनिक तत्वों का पर्यावरण पर जो प्रभाव पड़ता है, उसी के आधार पर यह आंकड़े तैयार किए गए हैं.

क्या स्ट्रॉ से पीने वालों को कैंसर का सीधा खतरा है?

यहां यह समझना बहुत जरूरी है कि अध्ययन में बताया गया 'कैंसरजनक प्रभाव' सीधे तौर पर स्ट्रॉ से ड्रिंक पीने वाले व्यक्ति के स्वास्थ्य जोखिम को नहीं दर्शाता है. इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि पेपर स्ट्रॉ से जूस या कोल्ड ड्रिंक पीने से किसी को तुरंत कैंसर हो जाएगा.

यह आंकड़ा स्ट्रॉ के बनने से लेकर कचरे में बदलने तक निकलने वाले जहरीले उत्सर्जन और पर्यावरणीय प्रभाव का एक मॉडल आधारित अनुमान (Life-Cycle Estimate) है.

'ग्रीनवाशिंग' पर सरकार को घेरा

अध्ययन के नतीजे सामने आने के बाद प्रतिनिधि किम वाई-सांग ने दक्षिण कोरियाई सरकार की नीतियों पर कड़ा प्रहार किया. उन्होंने सरकार की इस नीति को 'ग्रीनवाशिंग', पर्यावरण सुरक्षा का झूठा दावा करना, करार दिया. किम ने कहा, 'सरकार को अपनी ग्रीनवाशिंग नीति की विफलता को स्वीकार करना चाहिए, जो केवल अप्रभावी वैकल्पिक सामग्रियों के इस्तेमाल पर टिकी हुई थी. हमें इस गलती को दोहराने से बचना होगा. असली नीति का ध्यान डिस्पोजेबल (एक बार इस्तेमाल होने वाले) उत्पादों के कुल उपयोग को कम करने पर होना चाहिए, न कि केवल उनका मटीरियल बदलने पर.'

समस्या का असली समाधान क्या है?

शोध में एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह सामने आया कि स्ट्रॉ चाहे किसी भी मटीरियल (प्लास्टिक, कागज या बायो-प्लास्टिक) की बनी हो, उसे रीसायकल करना बेहद मुश्किल काम है.

इसके दो मुख्य कारण हैं:

छोटा आकार: स्ट्रॉ आकार में बहुत छोटी होती हैं, जिससे कचरा छंटाई मशीनों में इन्हें अलग करना व्यावहारिक रूप से असंभव हो जाता है.

कोटिंग और गोंद: पेपर स्ट्रॉ को पानी में गलने से बचाने के लिए उन पर केमिकल कोटिंग्स और गोंद (Adhesives) का इस्तेमाल किया जाता है, जो रीसाइक्लिंग प्रक्रिया को और जटिल बना देता है.

इसलिए, शोधकर्ताओं का मानना है कि केवल प्लास्टिक स्ट्रॉ पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा देना सही समाधान नहीं है. उन्होंने सुझाव दिया कि दुकानों और कैफे में डिफॉल्ट रूप से (अपने आप) किसी भी प्रकार की डिस्पोजेबल स्ट्रॉ न दी जाए. स्ट्रॉ केवल तभी दी जानी चाहिए जब ग्राहक खुद इसके लिए अनुरोध करे. अंतिम निष्कर्ष यही निकलता है कि मटीरियल बदलने से पर्यावरण की समस्याएं हल नहीं होंगी; समाधान केवल डिस्पोजेबल चीजों के अत्यधिक इस्तेमाल को घटाने में ही छिपा है.

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About the Author

रवींद्र प्रताप सिंह ने साल 2015 में जागरण.कॉम से डिजिटल मीडिया में कदम रखा मौजूदा समय वो ज़ी न्यूज डिजिटल में चीफ सब एडिटर हैं. अगस्त 2025 में उन्होंने ज़ी न्यूज ज्वाइन किया है. रवींद्र देश और दुनिया की खबरों के अलावा खेलों में क्रिकेट जगत और क्राइम की खबरों पर बेहतरीन पकड़ रखते हैं. इसके पहले रवींद्र रिपब्लिक भारत में इवनिंग शिफ्ट के इंचार्ज रहे और शाम की शिफ्ट संभालते हुए होम पेज की जिम्मेदारी रवींद्र के ऊपर थी. उससे पहले रवींद्र ने जनसत्ता और न्यूज नेशन में भी शाम की शिफ्ट और होम पेज की जिम्मेदारी बखूबी निभाई. इसके पहले रवींद्र ने 5 सालों तक पी7 और लाइव इंडिया जैसे न्यूज चैनलों में काम किया था. रवींद्र आकाशवाणी में काम करने का अनुभव रखते. अवध यूनिवर्सिटी से मॉस कम्युनिकेशन से पोस्ट ग्रेजुएट रवींद्र पिछले डेढ़ दशक से सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं. आप रवींद्र से जुड़ने के लिए Ravindra.Singh@India.com पर मेल कर सकते हैं या फिर फेसबुक पर संपर्क करने के लिए https://www.facebook.com/pintu.singh.397 और एक्स पर https://x.com/rs66533 रवींद्र से संपर्क किया जा सकता है. 
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