क्या सच में हस्तिनापुर का विजेता ही बनता है सत्ता का सिकंदर? जानिए मेरठ की इस सीट के चौंकाने वाले चुनावी आंकड़े
मेरठ की हस्तिनापुर विधानसभा सीट का अनोखा रिकॉर्ड है. यहां से जो पार्टी जीतती है, लखनऊ में सरकार भी उसी की बनती है. जानिए महाभारत कालीन इस सीट का पूरा सियासी समीकरण.
उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक से बढ़कर एक चुनावी किस्से और दिलचस्प आंकड़े सुनने को मिलते हैं. अगर आपसे कहा जाए कि यूपी की 403 विधानसभा सीटों में से एक सीट ऐसी है जो सीधे यह तय कर देती है कि लखनऊ के सिंहासन पर कौन बैठेगा... तो क्या आप यकीन करेंगे? यह कोई कोरी अफवाह या हवा-हवाई बात नहीं है... दशकों पुराना एक ऐसा ठोस रिकॉर्ड है जिसे देखकर बड़े-बड़े पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स भी हैरान रह जाते हैं. यहां बात हो रही है मेरठ जिले की ऐतिहासिक और पौराणिक हस्तिनापुर विधानसभा सीट की. आजादी के बाद से लेकर अब तक के ज्यादातर चुनावों का इतिहास उठाकर देख लीजिए.. हस्तिनापुर सीट पर जिस भी प्रत्याशी ने बाजी मारी, उसकी पार्टी ने यूपी में सरकार बनाई. आइये इस दिलचस्प चुनावी करिश्मे, आंकड़ों और इसके पौराणिक महत्व को बिल्कुल करीब से समझते हैं.
जब-जब हस्तिनापुर जीता, तब-तब लखनऊ जीता
हस्तिनापुर सीट का ट्रैक रिकॉर्ड इतना तगड़ा है कि इसे यूपी की राजनीति का 'राजनीतिक मौसम वैज्ञानिक' या 'बेलवेदर सीट' भी कहा जाता है. पिछले कुछ दशकों के नतीजे बयां करते हैं.... यह तिलिस्म हर बार सच साबित हुआ है.
2022 का विधानसभा चुनाव
बीजेपी के दिनेश खटीक ने हस्तिनापुर सीट से शानदार जीत हासिल की. नतीजा क्या हुआ? उत्तर प्रदेश में एक बार फिर पूर्ण बहुमत के साथ बीजेपी की सरकार बनी और योगी आदित्यनाथ दोबारा मुख्यमंत्री बने.
2017 का विधानसभा चुनाव
बीजेपी उम्मीदवार दिनेश खटीक ने हस्तिनापुर में परचम लहराया. इसके साथ ही राज्य में 15 साल का वनवास खत्म करके बीजेपी ने प्रचंड बहुमत से सरकार बनाई.
2012 का विधानसभा चुनाव
समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रत्याशी प्रभुदयाल वाल्मीकि ने हस्तिनापुर सीट जीती. नतीजे के बाद यूपी में सपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी और अखिलेश यादव राज्य के मुख्यमंत्री बने.
2007 का विधानसभा चुनाव
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के योगेश वर्मा ने हस्तिनापुर सीट पर अपनी जीत दर्ज की. परिणाम स्वरूप मायावती के नेतृत्व में बसपा ने राज्य में अपने दम पर बहुमत की सरकार बनाई. यह तो बस हालिया दौर की बात है, 1957 में कांग्रेस के बिशंभर सिंह की जीत से लेकर 1977 में जनता पार्टी की लहर और 1989 में जनता दल के दौर तक, हस्तिनापुर का यह समीकरण लगभग हमेशा सही साबित हुआ है.
महाभारत काल से जुड़ा है इस सीट का इतिहास
हस्तिनापुर सिर्फ चुनावी आंकड़ों या राजनीति तक ही सीमित नहीं है. इसका इतिहास सदियों पुराना और पौराणिक गहराइयों से भरा हुआ है. महाभारत काल में हस्तिनापुर कुरु साम्राज्य की राजधानी हुआ करती थी. कौरवों और पांडवों की कर्मभूमि रही यह पावन धरती ऐतिहासिक रूप से हमेशा से ही सत्ता के केंद्र में रही है. स्थानीय लोगों का मानना है कि जिस तरह महाभारत के युग में हस्तिनापुर का सिंहासन पूरे आर्यावर्त की सत्ता का फैसला करता था. ठीक उसी तरह आज के आधुनिक लोकतांत्रिक दौर में भी हस्तिनापुर की जनता जिस पार्टी पर अपनी मुहर लगाती है, उसी का राज उत्तर प्रदेश पर होता है!
राजनीतिक पार्टियां क्यों मानती हैं इसे अपना 'लकी चार्म'?
क्योंकि हस्तिनापुर का चुनावी ट्रेंड इतना अचूक रहा है, इसलिए हर बड़ी राजनीतिक पार्टी चुनाव प्रचार के दौरान इस सीट पर अपनी पूरी ताकत झोंक देती है. चाहे बीजेपी हो, सपा हो या बसपा, हर दल के शीर्ष नेता हस्तिनापुर में रैली करना और यहां के समीकरणों को साधना अपनी पहली प्राथमिकता मानते हैं. नेताओं और रणनीतिकारों के बीच यह धारणा बन चुकी है कि हस्तिनापुर में मिली बढ़त केवल एक सीट की जीत नहीं है... यह पूरे प्रदेश में बनने वाले राजनीतिक माहौल का एक मजबूत संकेत है. अगर हस्तिनापुर का वोटर किसी पार्टी के पक्ष में मूड बना लेता है, तो माना जाता है कि पूरे प्रदेश की जनता का रुझान भी उसी दिशा में जा रहा है.
हस्तिनापुर के सामाजिक और राजनीतिक समीकरण
भौगोलिक और सामाजिक नजरिए से देखें तो हस्तिनापुर अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित सीट है. मेरठ जिले में आने वाली यह विधानसभा सीट बिजनौर लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है. यहां के वोटर्स का पैटर्न काफी समझदार और जागरूक माना जाता है. दलित, गुर्जर, मुस्लिम, किसान और युवा वोटर्स का यह मिला-जुला कॉम्बिनेशन हर चुनाव में बहुत सोच-समझकर अपना फैसला सुनाता है. यही वजह है कि यहां का वोटर हवा के रुख को बहुत पहले भांप लेता है और जिस दल की तरफ जनता की लहर होती है, उसी प्रत्याशी के सिर पर जीत का सेहरा सजाता है.
क्या यह सिर्फ एक इत्तेफाक है?
कई राजनीतिक विश्लेषक इस ट्रेंड को केवल एक दिलचस्प संयोग या इत्तेफाक मानते हैं. जबकि स्थानीय जनता और समर्थकों के लिए यह एक अटूट विश्वास बन चुका है. वजह चाहे जो भी हो... लेकिन जब आंकड़े खुद गवाही दें तो किसी तर्क की गुंजाइश कम ही बचती है. दशकों से चला आ रहा यह ट्रेंड हर नए चुनाव में और ज्यादा रोमांचक हो जाता है. मेरठ जिले की हस्तिनापुर (SC) विधानसभा सीट का जातीय समीकरण और चुनावी रिकॉर्ड दोनों ही बेहद दिलचस्प हैं.
हस्तिनापुर सीट का जातीय समीकरण
हस्तिनापुर एक अनुसूचित जाति (SC) आरक्षित सीट है. यहां कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 3.35 लाख से 3.45 लाख के करीब है.
मुस्लिम मतदाता: लगभग 85,000 से 90,000 (कुल वोट का लगभग 25% - 26%). इस सीट पर मुस्लिम वोटर निर्णायक भूमिका निभाते हैं.
दलित मतदाता (SC): लगभग 70,000 से 75,000. इनमें जाटव समुदाय की संख्या सबसे अधिक है, जबकि वाल्मीकि और खटीक समाज का भी अच्छा-खासा असर है.
गुर्जर मतदाता: लगभग 50,000 से 55,000. हस्तिनापुर क्षेत्र में गुर्जर बहुल कई गांव हैं, जो चुनाव में एक एकमुश्त प्रभाव डालते हैं.
जाट मतदाता: लगभग 30,000 से 35,000. रालोद (RLD) और किसान राजनीति के असर के कारण यह ब्लॉक काफी अहम माना जाता है.
सैनी, कश्यप व अन्य अति-पिछड़ा (OBC) वर्ग: लगभग 35,000 से 40,000.
उच्च जातियां (त्यागी, ब्राह्मण, राजपूत आदि): लगभग 25,000 से 30,000.
पिछले तीन विधानसभा चुनावों में जीत का मार्जिन
पिछले तीन चुनावों (2012, 2017, और 2022) में हस्तिनापुर सीट पर बेहद कांटे की और दिलचस्प टक्कर देखने को मिली है..
1. विधानसभा चुनाव 2022
विजेता: दिनेश खटीक (भाजपा)- 1,07,587 वोट (46.72%)
निकटतम प्रतिद्वंद्वी: योगेश वर्मा (सपा)- 1,00,275 वोट (43.55%)
जीत का मार्जिन: 7,312 वोट (लगभग 3.18%)
2. विधानसभा चुनाव 2017
विजेता: दिनेश खटीक (भाजपा)- 99,436 वोट (44.92%)
निकटतम प्रतिद्वंद्वी: योगेश वर्मा (बसपा)- 63,374 वोट (28.63%)
तीसरे स्थान पर: प्रभुदयाल वाल्मीकि (सपा)- 48,979 वोट (22.13%)
जीत का मार्जिन: 36,062 वोट (लगभग 16.29%)
3. विधानसभा चुनाव 2012 विजेता: प्रभुदयाल वाल्मीकि (सपा)- 46,742 वोट (25.31%)निकटतम प्रतिद्वंद्वी: योगेश वर्मा (पीस पार्टी)- 40,101 वोट (21.71%)तीसरे स्थान पर: गोपाल काली (कांग्रेस)- 39,009 वोट (21.12%)जीत का मार्जिन: 6,641 वोट (लगभग 3.59%)