धरती पर बसा 'एलियन ग्रह': यहां पेड़ों से बहता है लाल खून, उड़न तश्तरी जैसी बनावट देख चकरा जाएगा दिमाग; तस्वीरें कर देंगी हैरान
धरती पर कुछ जगहें ऐसी हैं, जिन्हें देखकर पहली नजर में यकीन करना मुश्किल हो जाता है कि हम अपनी ही दुनिया में हैं. हिंद महासागर में यमन के पास मौजूद सोकोत्रा द्वीप भी ऐसी ही एक जगह है. यहां पेड़ों की बनावट आम पेड़ों से बिल्कुल अलग है और कुछ पेड़ों से गहरे लाल रंग का रस निकलता है, जो खून जैसा दिखता है. इन अनोखे पौधों और जीव-जंतुओं के कारण मशहूर इस द्वीप पर साल 2018 में 38 भारतीय नाविक भी फंस गए थे.
जब भी किसी फिल्म में दूसरी दुनिया का नजारा दिखाया जाता है, तो वहां अजीब तरह के पेड़, अनजान पौधे और अनोखे जीव नजर आते हैं. लेकिन सोकोत्रा में ऐसा नजारा देखने के लिए किसी फिल्म या कल्पना की जरूरत नहीं है. यहां पहुंचने पर कई जगहों पर पेड़-पौधों की बनावट ही ऐसी दिखाई देती है, मानो किसी दूसरी दुनिया में आ गए हों.
हिंद महासागर में स्थित यह द्वीप यमन का हिस्सा है. अपनी अनोखी प्राकृतिक बनावट के कारण इसे दुनिया के सबसे अलग-थलग और दिलचस्प द्वीपों में गिना जाता है. यहां की खूबसूरती के साथ-साथ इसकी वनस्पतियां भी लोगों को हैरान करती हैं. यहां के ड्रैगन ब्लड ट्री से निकलने वाला लाल रेजिन प्राचीन काल से औषधियों और रंगों में इस्तेमाल होता रहा है.
उल्टे छाते जैसे दिखते हैं ड्रैगन ब्लड ट्री
सोकोत्रा की पहचान यहां पाए जाने वाले ड्रैगन ब्लड ट्री से होती है. इन पेड़ों की शाखाएं ऊपर की तरफ फैलती हैं और मिलकर एक बड़े उल्टे छाते जैसा आकार बना लेती हैं. इनकी बनावट इतनी अलग होती है कि दूर से देखने पर ये किसी फिल्मी दुनिया के पेड़ लगते हैं. इनकी डालियों के ऊपर पत्तियों का गुच्छा बन जाता है, जबकि नीचे का तना सीधा दिखाई देता है. इस वजह से पूरा पेड़ किसी बड़े छाते जैसा नजर आता है. इस द्वीप की तस्वीरों में ऐसे पेड़ों को देखकर लोग अक्सर इसकी तुलना एलियन ग्रह से करते हैं.
पेड़ से निकलता है लाल खून!
इन पेड़ों का नाम जितना दिलचस्प है, इसकी वजह भी उतनी ही खास है. ड्रैगन ब्लड ट्री की छाल या टिशू को नुकसान पहुंचने पर इसके अंदर से गहरे लाल रंग का रेजिन निकलता है. यह रस देखने में बिल्कुल खून जैसा लगता है. इसी लाल रंग के कारण इसे 'ड्रैगन ब्लड' यानी ड्रैगन का खून कहा जाता है. पुराने समय से इस तरह के लाल रेजिन का इस्तेमाल रंग, वार्निश और ट्रेडिशनल चीजों में होता रहा है. हालांकि, यह असली खून नहीं, बल्कि पेड़ से निकलने वाला नेचुरल पदार्थ है.
यहां के पौधे दुनिया में कहीं और मिलना मुश्किल
सोकोत्रा की खासियत सिर्फ ड्रैगन ब्लड ट्री तक सीमित नहीं है. यहां बोतल जैसे मोटे तने वाले पौधे भी पाए जाते हैं, जिन्हें रेगिस्तानी गुलाब कहा जाता है. इनके तने पानी जमा करने में मदद करते हैं, जिससे ये सूखे और गर्म वातावरण में भी जिंदा रह पाते हैं. यह द्वीप लंबे समय तक जियोग्राफिकल आइसोलेशन में रहा है. इस वजह से यहां के कई पौधों और जीवों का विकास दुनिया के दूसरे हिस्सों से अलग तरीके से हुआ. यहां मिलने वाली कई प्रजातियां स्थानीय हैं, यानी प्राकृतिक रूप से दुनिया में बहुत सीमित जगहों पर ही पाई जाती हैं.
पेड़ ही नहीं, जीव-जंतु भी हैं बेहद खास
सोकोत्रा की पहचान सिर्फ इसके पेड़-पौधों के अलावा अनोखे जीव-जंतुओं से भी है. यहां कई तरह के स्थानीय पक्षी, सरीसृप और कीट पाए जाते हैं. इनमें कुछ ऐसी प्रजातियां भी शामिल हैं, जो दुनिया के दूसरे हिस्सों में प्राकृतिक रूप से नहीं मिलतीं. यही वजह है कि यह द्वीप वैज्ञानिकों और प्रकृति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के लिए खास महत्व रखता है. यहां की जैव विविधता को समझना इस बात का भी उदाहरण है कि लंबे समय तक अलग रहने से किसी इलाके का प्राकृतिक जीवन कितना अनोखा बन सकता है.
नीला समुद्र और सफेद रेत भी बढ़ाते हैं खूबसूरती
अगर आपको लगता है कि सोकोत्रा सिर्फ अजीब पेड़ों और सूखे पहाड़ी इलाकों का नाम है, तो आप गलत हैं. यहां के समुद्र तट आपको हैरान कर सकते हैं. द्वीप के आसपास साफ नीला पानी, सफेद रेत और खूबसूरत तटीय इलाके मौजूद हैं. यहां का समुद्री जीवन भी प्राकृतिक रूप से काफी अहम है. जमीन पर अजीब आकार वाले पेड़ और आसपास फैला नीला समुद्र मिलकर ऐसा नजारा बनाते हैं, जो आम पर्यटन स्थलों से बिल्कुल अलग है.
जब सोकोत्रा में फंस गए थे 38 भारतीय
इस द्वीप का भारत से जुड़ा एक अहम किस्सा भी है. मई 2018 में चक्रवात मेकुनु के दौरान सोकोत्रा क्षेत्र में 38 भारतीय नाविक फंस गए थे. खराब मौसम और मुश्किल हालात के बीच उन्हें सुरक्षित निकालना बड़ी चुनौती थी. ऐसे समय में भारतीय नौसेना ने 'ऑपरेशन निस्तार' शुरू किया. इस अभियान के तहत आईएनएस सुनयना की मदद से सभी 38 भारतीयों को सुरक्षित निकाला गया. इस घटना ने सोकोत्रा को भारत में भी चर्चा में ला दिया था.
यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है द्वीप
सोकोत्रा की प्राकृतिक खासियतों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली है. साल 2008 में सोकोत्रा द्वीपसमूह को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया था. इसके पीछे यहां की अनोखी जैव विविधता और दुर्लभ प्रजातियों के संरक्षण का महत्व बड़ी वजह रहा. यहां की प्राकृतिक संपदा जितनी खास है, उसे सुरक्षित रखना भी उतना ही जरूरी है. पर्यावरण में बदलाव और इंसानी गतिविधियां ऐसे संवेदनशील इलाकों के लिए चुनौती बन सकती हैं. सोकोत्रा की कहानी बताती है कि धरती पर आज भी ऐसी जगहें मौजूद हैं, जिनके बारे में जानकर हैरानी होती है.