कई सौ साल पहले क्यों आदि गुरु शंकराचार्य ने शुरू की थी पंचायतन पूजा, कौन हैं पंचदेव जो समाज को एक सूत्र में बांधते हैं?
What is Panchayatana Puja: कई शताब्दी पहले आदि गुरु शंकराचार्य ने पंचायतन पूजा की शुरुआत की लेकिन इसकी जरूरत क्यों पड़ी, क्या है पंचायतन पूजा जो समाज को एक सूत्र में बांधती है? आइए इस लेख में विस्तार से जानें.
क्या आप जानते हैं कि एक ऐसा समय भी था जब अलग-अलग संप्रदाय में सनातन धर्म को मानने वाले बंटे थे. यह ऐसा था जैसे एक ही समाज के लोग एक होकर भी एक नहीं थे. एक ही धर्म को मानने वाले लोगों के विचारों में भी गहरा मतभेद था. एक अलग सोच के साथ आदि शंकराचार्य ने उसी बिखरे समाज को जोड़ने की कोशिश की जिसके लिए उन्होंने पंचायतन पूजा की परंपरा को शुरू किया. कई सौ साल पहले आदि गुरु शंकराचार्य ने पंचायतन पूजा क्यों शुरू की, कौन हैं पंचदेव और कैसे इनकी पूजा से समाज एक सूत्र में बंध जाता है? आइए इस बारे में विस्तार से जानें.
आदि शंकराचार्य और पंचायतन पूजा का संबंध
बात 8वीं शताब्दी के आसपास के समय की है जब अलग-अलग देवी-देवताओं की पूजा करने वाले अलग-अलग संप्रदाय में बंटे थे. जैसे शिव जी की पूजा करने वाले शैव, शक्ति के पूजक शाक्त कहलाए और विष्णु के पूजक वैष्णव कहलाए. ये सभी सनातनी ही थे लेकिन देवी-देवताओं की आस्था और उनकी उपासना को लेकर अलग-अलग संप्रदायों में बंटे थे. जिसके कारण ये एक तो थे लेकिन इनमें एकता नहीं थी. अपने-अपने देवी-देवता की महानता सिद्ध करते-करते लड़ पड़ते थे. तब सनातन परंपरा को एक साथ जोड़ने के लिए आदि शंकराचार्य देश की अलग-अलग जगहों पर घूमकर हिंदू धर्म को पुनर्जीवित करने और समाज को जोड़ने की कोशिश करने लगे. देवी-देवताओं के बीच का मतभेद समाज को तोड़ रहा था जिसका हल निकालते हुए आदि शंकराचार्य ने पंचायतन पूजा यानी पंचदेव पूजा को जन-जन तक पहुंचाया. जिससे कि अलग-अलग संप्रदाय के लोगों में एकता का भाव आ सके.
पंचदेव कौन हैं?
हिंदू धर्म में पंचदेव के नाम-
भगवान गणेश, भगवान शिव
भगवान विष्णु, देवी दुर्गा
सूर्य देवता
पंचायतन पूजा क्या है?
जब पंचदेवों की सामूहिक पूजा की जाती है तो इसे ‘पंचायतन पूजा’ के रूप में जाना जाता है जिसे करने से जीवन में संतुलन और मन में शांति आती है. घर में सुख-समृद्धि आती है और आध्यात्मिक उन्नति होती है. ‘पंचायतन’ के पंच का अर्थ है पांच और आयतन का अर्थ है निवास स्थान या मंदिर. इसका शाब्दिक अर्थ है पंचायतन यानी एक ऐसी पूजा वेदी जहां एक साथ पांच प्रमुख देवों को विराजमान कर उनकी उपासना की जाती है. आदि शंकराचार्य ने ऐसा नियम बनाया कि हर एक गृहस्थ इन पांचों देवों की पूजा एक वेदी पर ही करेगा. अपने इष्ट देव को बीच में रखें और बाकी चार देवताओं को उनके चारों ओर स्थापित कर उनकी पूजा करें.
पंचदेव पूजा का महत्व
धार्मिक परंपरा में पंचदेव पूजा का बड़ा महत्व बताया गया है. आज जहां लोग अलग-अलग भगवान की मान्यताओं को लेकर अलग-अलग सोच और मत में बंटे हैं. वहीं दूसरी ओर पंचायतन पूजा हमें बताती है कि एक ही परम तत्व के रूप का प्रतीक शिव, विष्णु, देवी, गणेश और सूर्य देव पांच देवता हैं. अहंकार को खत्म कर एकता का भाव यही पंचायतन पूजा पैदा करती है. इस पूजा को करने से घर में शांति, संतुलन और सकारात्मकता का संचार होता है. व्यस्त जीवन में यह इन पांच तत्वों की पूजा कर जीवन को संतुलित किया जा सकता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार पंचदेव पूजा से एक साथ पंच तत्वों को भी अपने जीवन में संतुलित कर सकते हैं. ये पंचतत्व हैं- पृथ्वी, अग्नि, जल, आकाश और वायु. ये पंचतत्व जब संतुलित रहते हैं तो इनके प्रतीक देवताओं का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है. इसके लिए जानना होगा कि कौन से देवता का किस तत्व से संबंध है.
कौन से देवता का किस तत्व से संबंध है?
भगवान गणेश जल तत्व के प्रतीक हैं.
भगवान शिव आकाश तत्व के प्रतीक हैं.
भगवान विष्णु वायु तत्व के प्रतीक हैं.
देवी दुर्गा पृथ्वी तत्व की प्रतीक हैं.
भगवान सूर्य अग्नि तत्व के प्रतीक हैं.
पंचदेव पूजा के फायदे
पंचदेवों की नियमित पूजा करने से व्यक्ति के जीवन से रोग, दरिद्रता व नकारात्मक ऊर्जा का नाश हो जाता है. मान्यता है कि किसी भी तरह के शुभ काम को करने से पहले अगर मन ही मन पंचदेवों का ध्यान कर लें तो उस काम में जरूर सफलता मिलती है. जीवन में शांति आती है और मन में गजब का आत्मविश्वास पैदा होता है.
पंचायतन पूजा कैसे करें?
- सुबह उठें, स्नान करें और साफ कपड़े पहनें.
- अब एक चौकी सजाएं या वेदी बनाएं.
- वेदी पर पंचदेवों को स्थापित करें.
- अपने इष्ट देव की प्रतिमा को बीच में रखें जैसे विष्णु जी को.
- ईशान कोण यानी उत्तर-पूर्व में शिव जी को रखें.
- आग्नेय कोण यानी दक्षिण-पूर्व में गणेश जी को स्थापित करें.
- नैऋत्य कोण यानी दक्षिण-पश्चिम में सूर्य देव को स्थापित करें.
- वायव्य कोण यानी उत्तर-पश्चिम में मां दुर्गा को स्थापित करें.
- इसी तरह अपने इष्ट देव को बीच में रखकर देवताओं को उनकी तय दिशा में स्थापित करें.
- सबसे पहले गणेश जी का आह्वान करें.
- दीपक और धूप जलाएं और पंचदेवों की उपासना करें.
(Disclaimer: यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं, ग्रंथों और जनश्रुतियों पर आधारित है. इसकी वैज्ञानिक पुष्टि नहीं है, पाठक विवेक से निर्णय लें.)