महारास केवल नृत्य या जीव का परमात्मा से मिलन, श्रीकृष्ण के जन्मों-जन्म के भटके भक्तों का गोपियां से क्या है संबंध?
क्या महारास केवल नृत्य है या यह एक माध्यम है जीव का परमात्मा से मिलन का, कौन हैं गोपियां जिनको लेकर अलग-अलग मान्यताओं का जिक्र अक्सर ही होता रहता है. महारास की गोपियों का श्रीकृष्ण के जन्मों-जन्म के भटके भक्तों से क्या है संबंध?
शरद पूर्णिमा को सार पूर्णिमा भी कहा जाता है क्योंकि इसी रात श्रीकृष्ण ने गोपियों संग महारास किया था. इस साल रास पूर्णिमा 25 अक्टूबर को यानी आज हैं. ऐसी मान्यता है कि सोलह कलाओं से परिपूर्ण श्रीकृष्ण के इस अवतार के आनंद भाव का पूरा विकास उनके द्वारा किए मधुर रासलीला में हुआ. यह रासलीला भगवान की दिव्य रास क्रीड़ा है. रासलीला शृंगार और रस से भरा होने पर भी वासना से मुक्त है. रासलीला में भगवान अपने विशुद्ध भक्तों के साथ रास करते हैं.
महारास क्या है, अगर इसे बहुत साधारण रूप में समझें तो महारास सिर्फ नृत्य नहीं है बल्कि आत्मा-परमात्मा का मिलन है. माना जाता है कि कृष्ण की यह रासलीला गोपियों का कृष्ण के प्रति प्रेम है जो किसी भी भौतिक स्वार्थ या सांसारिक आकर्षण से से ऊपर उठकर आत्मा का परमात्मा के लिए समर्पित है. आइए जानें महारास केवल नृत्य है या जीव का परमात्मा से मिलन है. श्रीकृष्ण के जन्मों-जन्म के भटके भक्तों का गोपियां से क्या है संबंध?
गोपियां कौन हैं?
हिंदू धर्म और पुराणों की मानें तो गोपियां भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य भक्त थीं. हलांकि, इसका आध्यात्मिक भाव ये है कि यमुना तट पर भगवान श्रीकृष्ण के साथ जो गोपियां महारास में उपस्थित होती थीं वो कोई सामान्य स्त्रियां नहीं थीं बल्कि श्रीकृष्ण की परम भक्त थीं. भागवत पुराण और वैष्णव मत में गोपियों का प्रेम सांसारिक नहीं है बल्कि यह जीव का परमात्मा के प्रति निस्वार्थ समर्पण है. गोपियां कौन हैं इसके लेकर कई मान्यताएं मिलती हैं.
दंडकारण्य के ऋषि-मुनि होने की मान्यता
गोपियों को लेकर एक मान्यता ये है कि त्रेतायुग में जब भगवान राम दंडकारण्य वन में वास कर रहे थे तब वहां के ऋषि-मुनियों ने उनके सौंदर्य और माधुर्य के दर्शन पाए और उनकी प्रियसी होने की इच्छा प्रकट की. तब उन्हें द्वापरयुग में श्री कृष्ण के रूप में मिलने का भगवान राम ने वरदान दिया. ये ऋषि-मुनि ही गोपी बनकर ब्रज में प्रकट हुए थे.
वेद की ऋचाएं होने की मान्यताएं
गोपियों के वेद की ऋचाएं होने की भी मान्यताएं है. पुराणों के अनुसार, भगवान के रूप-रस का पान करने की लालसा वेदों की ऋचाओं में जाग उठी जो ब्रज में गोपियों के रूप में अवतरित हुईं और श्रीकृष्ण अवतार के साथ रास किया.
देवांगनाएं और सिद्ध आत्माएं होने की मान्यताएं
एक मान्यता ये भी है कि कृष्ण की कुछ गोपियां देवांगनाएं यानी स्वर्ग की अप्सराएं हैं, कुछ नित्य-सिद्ध आत्माएं तो कुछ साधना-सिद्ध आत्माएं है. ठाकुर जी की लीलाओं में सहयोग करने के लिए व्रज क्षेत्र में अवतरिक हुई थीं.
रास में बंसी का रहस्य
महारास में बंसी का होना और उसका कृष्ण के द्वारा बजाए जाने का बड़ा महत्व है. रासलीला में जब श्रीकृष्ण बंसी बजाते हैं तो उसकी धुन पर गोपियां और सारा ब्रज सुध-बुध खो बैठता है और रास-महारास में खिंचा चला आता है. यह धुन जीवात्मा को परमात्मा से जोड़ने का साधन है. बांसुरी बताती है कि जिस तरह यह अंदर से पूरी तरह खाली है वैसे ही जब अहंकार और स्वार्थ को हटाकर जीव अपने आप को पूरी तरह से खाली कर देता है तब ईश्वर अपना दिव्य संगीत रूपी प्रेम और शांति जीव के भीतर प्रवाहित करते हैं.
आज के जीव के लिए महारास का संदेश
आज के लोग महारास को केवल नृत्य की नजर से देखते हैं. लेकिन इसके भाव और इसके संदेश को नहीं समझते हैं. महारास माया और वासना से मुक्ति का एक रास्ता है. महारास सिखाता है कि हृदय में किसी भी तरह का स्वार्थ या सांसारिक कामना जब नहीं रह जाती है तभी परमात्मा से जुड़ने का रास्ता खुलता है. जिस तरह गोपियां श्रीकृष्ण के वियोग से बेचैन हो उठती थी उसी तरह आज के लोगों को सांसारिक मोह-माया के बीच भगवान की प्राप्ति राह पकड़नी चाहिए, उनके प्रति सच्ची भक्ति भावना रखनी चाहिए.
(डिस्क्लेमर- यह लेख धार्मिक मान्यताओं, पुराणों और पंचांग पर आधारित है. इसकी सत्यता की हम पुष्टि नहीं करते. किसी भी जानकारी को अमल में लाने से पहले विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें.)