रूप चौदस से काली चौदस तक: नरक चतुर्दशी पर निभाई जाने वाली ये हैं अलग-अलग परंपराएं
हिंदू धर्म में हर एक पर्व को मनाए जाने का कोई न कोई कारण जरूर होता है. दिवाली से पहले मनाई जाने वाली छोटी दिवाली जिसे नरक चतुर्दशी भी कहते हैं. कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली चतुर्दशी तिथि पर ही काली चौदस और हनुमान पूजा भी की जाती है.
दिवाली से एक दिन पहले यानी आज छोटी दिवाली पर्व मनाया जा रहा है. इस दिन नरक चतुर्दशी और रूप चौदस के नाम से भी जाना जाता है और इस दिन काली चौदस पर्व भी मनाया जाता है. जहां तक नरक चतुर्दशी की बात करें तो भगवान श्रीकृष्ण ने जब नरकासुर का वध किया तब से यह पर्व मनाया जाता है. वहीं, इस रात मां काली की पूजा की जाती है जिसके कारण इसे काली चौदस भी कहा जाता है. कुल मिलाकर नरक चतुर्दशी पर देश के अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग प्रथाएं निभाई जाती हैं. कहीं यम के नाम का दीपक जलाने की प्रथा है तो कहीं काजल लगाने की प्रथा है. कुछ जगहों पर रूप निखारने की परंपरा को निभाया जाता है. आइए जानें गुजरात से लेकर बंगाल में नरक चतुर्दशी पर किन परंपराओं को निभाया जाता है.
पश्चिम बंगाल में भूत चतुर्दशी
पश्चिम बंगाल में कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि पर काली पूजा करने का विशेष महत्व है. इस दिन बंगाली लोग काली पूजा और 14 तरह के साग बनाते हैं. दीपावली से एक दिन पहले चतुर्दशी तिथि की मध्य रात में काली मां की पूजा की जाती है. पश्चिम बंगाल में रूप चौदस को भूत चतुर्दशी नाम से जाना जाता है. अमावस्या तिथि से एक दिन पहले 14 तरह के साग को पानी में भिगोया जाता है और उस पानी को पूरे घर में छिड़का जाता है. इसके बाद साग बनाकर खाया जाता है. ऐसी मान्यता है कि इसे खाने से ठंड के दिनों में स्वास्थ्य अच्छा रहता है और शरीर में वात और पित्त जैसे विकार संतुलित रहते हैं.
पंजाब में बंदीछोड़ दिवस
सिख धर्म में चतुर्दशी और दिवाली को स्वर्ण मंदिर को सजाते हैं और आतिशबाजी होती है, इस दिन को बंदीछोड़ दिवस के रूप में मनाने का विधान है. इस त्योहार को 1618 से ही हर साल बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है. 52 हिंदू राजाओं को मुगल बादशाह जहांगीर की कैद से इसी दिन सिखों के छठे गुरु श्री हरगोबिंद सिंह जी ने मुक्त करवाया था और फिर स्वर्ण मंदिर पहुंचे थे. इसी दिन दीप जलाकर सभी राजाओं का संगत ने स्वागत किया था. तब से ही सिख समुदाय दिवाली पर बंदीछोड़ दिवस मनाता है.
काली चौदस पर गुजरात की प्रमुख परंपराएं
गुजराती परंपरा में काली चौदस पर अभ्यंग स्नान किया जाता है. इस दिन सुबह के समय स्नान करने का विशेष महत्व है. सूर्योदय से पहले इस दिन लोग शरीर पर तेल और उबटन लगाकर नहाते हैं जिसे 'अभ्यंग स्नान' कहा जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस स्नान से शरीर शुद्ध होता है और ऊर्जा सकारात्मक होती है. इसके अलावा, काली चौदस की शाम को गुजरात में एक और प्रथा निभाई जाती है और वो है हनुमान जी की पूजा की प्रथा जिसे लेकर धार्मिक विश्वास है कि इस रात बजरंगबली की पूजा करने से जीवन में आने वाले सभी संकट दूर होते हैं और भय का नाश होता है.
(Disclaimer: यह लेख केवल सामान्य जानकारी और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है. किसी भी परंपरा को अपनाने से पहले स्थानीय विद्वानों से सलाह अवश्य लें. हम किसी भी दावे की पुष्टि नहीं करते.)