अब महीनों खराब नहीं होगा ऊंटनी का दूध: बीकानेर वैज्ञानिकों ने ढूंढ निकाला जादुई फॉर्मूला
बीकानेर की वेटरनरी यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने ऊंटनी के दूध में मौजूद प्रोटीन पर रिसर्च कर खास तकनीक विकसित की है. इस तकनीक को पेटेंट मिला है. इससे मिल्क प्रोडक्ट्स की शेल्फ लाइफ बढ़ाने और इम्यूनिटी से जुड़े उत्पादों की संभावनाएं बढ़ सकती हैं.
ऊंटों का इस्तेमाल कभी बोझा ढोने और खेती के कामों में बड़े पैमाने पर होता था. समय के साथ इन कामों में ऊंटों की उपयोगिता कम हुई, लेकिन ऊंटनी के दूध की अहमियत आज भी बनी हुई है. अब बीकानेर की वेटरनरी यूनिवर्सिटी में हुई रिसर्च ने ऊंटनी के दूध के इस्तेमाल की नई संभावनाएं सामने रखी हैं. यहां शोधकर्ताओं ने ऊंटनी के दूध से एक खास पाउडर तैयार किया है, जिसे लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है. इस तकनीक को पेटेंट भी कराया गया है.
ऊंटनी के दूध से तैयार किया खास पाउडर
ऊंटनी के दूध को लंबे समय से उसके संभावित औषधीय गुणों के लिए जाना जाता है. इस पर पहले भी कई तरह के शोध हुए हैं, खासकर डायबिटीज से जुड़े संभावित उपयोग को लेकर. अब बीकानेर की वेटरनरी यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने इसके इस्तेमाल को एक नई दिशा देने की कोशिश की है.
रिसर्च के तहत ऊंटनी के दूध से पाउडर तैयार किया गया है. इसका उद्देश्य दूध को लंबे समय तक सुरक्षित रखने और उसके उपयोग को आसान बनाना है. शोध के मुताबिक, इस पाउडर को लंबे समय तक स्टोर किया जा सकता है. साथ ही, इसे अलग-अलग मिल्क प्रोडक्ट्स में मिलाकर उनकी शेल्फ लाइफ बढ़ाने की संभावनाएं भी तलाशी जा रही हैं.
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इम्यूनिटी से जुड़े संभावित प्रभावों पर शोध
इस रिसर्च का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ऊंटनी के दूध में मौजूद बीटा-कैसीन प्रोटीन है. शोधकर्ताओं ने इस प्रोटीन और इससे बनने वाले बायोएक्टिव पेप्टाइड्स पर ध्यान केंद्रित किया है. ये पेप्टाइड्स शरीर की प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यूनिटी से जुड़े संभावित प्रभावों के लिहाज से महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं.
इस शोध से भविष्य में इम्यूनिटी से जुड़े उत्पाद विकसित करने की संभावनाएं सामने आई हैं. ऊंटनी के दूध से तैयार पाउडर के स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों और इसके व्यापक चिकित्सकीय इस्तेमाल को लेकर आगे और वैज्ञानिक अध्ययन की जरूरत होगी. फिलहाल, इस रिसर्च को संभावित उपयोगों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के तौर पर देखा जा रहा है.
वैज्ञानिकों की टीम ने किया शोध, तकनीक को मिला पेटेंट
इस रिसर्च को डॉक्टर राजकुमार बेरवाल ने किया है. इसमें पीएचडी की छात्रा अनीता तंवर और एनआरसीसी के डॉक्टर योगेश कुमार की टीम ने सहयोग दिया. शोध की खास बात यह है कि ऊंटनी के दूध से पाउडर तैयार करने की इस तकनीक को वेटरनरी यूनिवर्सिटी की ओर से पेटेंट कराया गया है.
इस तकनीक का उपयोग भविष्य में मिल्क प्रोडक्ट्स को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए किया जा सकता है. इससे दूध आधारित उत्पादों के संरक्षण और उनके इस्तेमाल को आसान बनाने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं.
राजस्थान के कैमल सेक्टर के लिए भी अहम रिसर्च
भारत में करीब चार लाख ऊंट होने का अनुमान है. इनमें लगभग 85 प्रतिशत ऊंट राजस्थान में पाए जाते हैं. ऐसे में ऊंटनी के दूध से जुड़े नए उत्पाद और तकनीक राज्य के कैमल सेक्टर के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं.
बीकानेर में हुई यह रिसर्च ऊंटनी के दूध को पारंपरिक उपयोग से आगे ले जाकर आधुनिक मिल्क प्रोडक्ट्स और न्यूट्रिशन सेक्टर में इस्तेमाल करने की संभावनाएं तलाश रही है. अगर आगे के अध्ययन और उत्पाद विकास में सकारात्मक नतीजे सामने आते हैं, तो इस तकनीक के व्यावहारिक उपयोग का दायरा बढ़ सकता है.
पारंपरिक उपयोग से आधुनिक उत्पादों तक नई राह
ऊंटनी का दूध अब तक मुख्य रूप से पारंपरिक और संभावित औषधीय उपयोगों के कारण चर्चा में रहा है. बीकानेर की वेटरनरी यूनिवर्सिटी में हुई रिसर्च ने इसे पाउडर के रूप में सुरक्षित रखने और मिल्क प्रोडक्ट्स में इस्तेमाल करने की नई संभावनाएं सामने रखी हैं. इम्युनिटी से जुड़े संभावित प्रभावों पर भी शोध किया गया है.
इसके स्वास्थ्य संबंधी फायदों की पुष्टि के लिए आगे वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी होंगे. फिलहाल, यह तकनीक ऊंटनी के दूध के बेहतर संरक्षण और उसके नए उपयोगों की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है.
Reporter- Rounak Vyas