App

MLC Elections 2026: बनारस-पटना-नागपुर में क्यों हारी BJP? ऐसे 5 सवालों का एक्सपर्ट ने दिया जवाब

4 राज्यों में विधान परिषद की 28 सीटों पर हुए चुनावों में बीजेपी को बनारस, पटना और नागपुर जैसी सीटों पर हार का सामना करना पड़ा. वहीं, कर्नाटक में सत्ताधारी कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया. यूपी की 11 सीटों पर सपा ने कड़ी टक्कर देते हुए 5 सीटें झटक लीं और बीजेपी को 6 सीटें मिलीं. इन नतीजों से क्या संदेश निकल रहा है, एक्सपर्ट से समझिए.

MLC Elections 2026: बनारस-पटना-नागपुर में क्यों हारी BJP? ऐसे 5 सवालों का एक्सपर्ट ने दिया जवाब
Image Credit: MLC चुनाव में जनता ने दिया क्या संदेश?

यूपी-बिहार समेत देश के 4 राज्यों में विधान परिषद की 28 सीटों पर हुए चुनाव के नतीजे सामने आ गए हैं. इन चुनावों में बनारस, पटना और नागपुर जैसी सीटों पर बीजेपी की हार ने पार्टी के भविष्य पर बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा दिया है. वहीं, कथित 'वोट चोरी' के आरोप लगाकर बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग करने वाले राहुल गांधी को कर्नाटक में तगड़ा झटका लगा है. प्रदेश में कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद पार्टी का सूपड़ा साफ हो गया. यहां की चारों सीटों पर NDA ने फतह हासिल करने में कामयाबी हासिल की. उधर, महाराष्ट्र में शरद पवार का 'पॉवर' एक बार फिर से देखने को मिला. राज्य की कुल 5 सीटों में से शरद पवार की पार्टी ने 2 सीटें जीत लीं, तो RSS का गढ़ यानी नागपुर में कांग्रेस का कब्जा हो गया. यूपी की 11 सीटों पर सपा ने कड़ी टक्कर देते हुए 5 सीटें झटक लीं और बीजेपी को 6 सीटें मिलीं. इन नतीजों से समाजवादी पार्टी काफी खुश है. सपा नेताओं का दावा है कि विधानसभा चुनाव में जनता बीजेपी को सत्ता से बाहर कर देगी. इन नतीजों से किसे फायदा हुआ और किसे नुकसान, इसे समझने के लिए ज़ी न्यूज ने चुनावी एक्सपर्ट नवीन जिंदल से बात की.

सवाल- नागपुर, वाराणसी और पटना में बीजेपी की हार से क्या मैसेज निकलकर आ रहा? बीजेपी और कांग्रेस के लिए इस रिजल्ट के क्या मायने हैं?

जवाब- MLC चुनाव की विधानसभा या लोकसभा चुनावों से तुलना नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि इस चुनाव में ना तो आम जनता ने वोट डाले थे और ना ही सारे दल मैदान में उतरे थे. तमाम जगहों पर सिर्फ दो कैंडिडेट के बीच ही लड़ाई देखने को मिली. वहीं, दूसरी ओर जब विधानसभा या लोकसभा चुनाव होगा, तो समीकरण बड़ी तेजी से बदलेंगे. सीट शेयरिंग को लेकर गठबंधनों में घमासान देखने को मिलेगा. पार्टियों में भगदड़ भी देखने को मिलेगी. यूपी में कांग्रेस और बसपा ने इस चुनाव में हिस्सा नहीं लिया, लेकिन दोनों दल विधानसभा चुनाव जरूर लड़ेंगे. सपा के साथ गठबंधन के बाद भी कांग्रेस कम से कम 50 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. मायावती की पार्टी बसपा भी मैदान में होगी. इसके अलावा चंद्रशेखर आजाद की भीम आर्मी और अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी भी यूपी चुनाव में अपने उम्मीदवार जरूर उतारेगी. असदुद्दीन ओवैसी भी मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर अपने कैंडिडेट जरूर उतारेंगे. इसके बाद भी तमाम छोटे-छोटे दल होंगे, जो चुनाव में हिस्सा लेंगे. इस तरह से यूपी का विधानसभा चुनाव काफी दिलचस्प हो जाएगा. रहा सवाल कि नागपुर, वाराणसी और पटना में बीजेपी क्यों हारी, तो पार्टी को इस पर गहन चिंतन करने की जरूरत है. पार्टी के लिए अपने कार्यकर्ताओं की नाराजगी को समझना, काफी जरूरी हो गया है. इसके अलावा बीजेपी को यूजीसी पर भ्रांतियों दूर करना चाहिए. इस कानून की वजह से पार्टी से उसका कोर वोटर नाराज हो गया है. सरकार की योजनाओं और कार्यों की जानकारियों को भी जनता तक पहुंचाना काफी जरूरी है. पार्टी ने अगर समय रहते इन विषयों पर काम नहीं किया, तो आने वाला समय उसके लिए और भी मुश्किल हो जाएगा.

UP Chunav 2027

 

सवाल- 28 में सिर्फ 1 सीट जीतने वाली कांग्रेस, बैलेट पेपर से चुनाव में भी फिसड्डी साबित हुई. क्या इससे राहुल गांधी का 'वोट चोरी' वाला दावा कमजोर साबित होगा?

जवाब- 'वोट चोरी' कहीं नहीं है. कांग्रेस ने अपनी असफलताओं को छिपाने के लिए इस तरह भ्रम खड़ा किया है. दरअसल, कांग्रेस पार्टी का जनाधार ही नहीं बचा है, खासतौर पर उत्तर भारत के राज्यों में. बार-बार 'वोट चोरी' कहने से कुछ नहीं होता और ना ही आगे कुछ होने वाला है. 'वोट चोरी' अगर कहीं हो रही होती, तो जनता खुद आवाज उठाती. अगर किसी का वोट कट गया होता, तो वह खुद सामने आता. राहुल गांधी आज तक ऐसा कोई प्रमाण नहीं दे सके, जिससे लगे कि लोगों के नाम काट कर 'वोट चोरी' की गई हो. वोटर लिस्ट में सुधार आवश्यक है और इसे होना चाहिए. राहुल 13 करोड़ वोटरों के नाम कटने की बात कहते हैं. नाव आयोग के मुताबिक, जिन लोगों का नाम कटा है, उनमें 6.3 करोड़ से अधिक लोग दूसरी जगह स्थायी रूप से शिफ्ट हो चुके हैं. वहीं, 3 करोड़ से ज्यादा ऐसे मतदाता मिले हैं, जो दिए गए पते पर मौजूद नहीं थे. इसके अवावा करीब 2.8 करोड़ मतदाताओं की मृत्यु हो चुकी है. SIR में करीब 1 करोड़ से ज्यादा मतदाता ऐसे भी पाए गए, जिनकी दो या दो से अधिक जगहों पर वोटर लिस्ट में एंट्री थी. राहुल गांधी से पूछा जाना चाहिए क्या जो 2 करोड़ से ज्यादा वोटर मृत पाए गए, उनके नाम भी वोटर लिस्ट में जुड़ने चाहिए. क्या डुप्लीकेसी खत्म नहीं होनी चाहिए. अगर कांग्रेस के बीएलओ ने जमीन पर उतरकर अपना काम किया होता तो यह समस्या ही नहीं होती. कांग्रेस की तुलना में सपा के कार्यकर्ताओं ने जमीन पर वोटर लिस्ट को ठीक करने का बड़ा काम किया. बंगाल में 80 गज के मकान में 62 मुस्लिम और 34 हिंदुओं के नाम थे, अगर इन्हें काट दिया गया, तो क्या दिक्कत है. ऐसा फर्जीवाडा क्यों नहीं रुकना चाहिए. दिल्ली, चंडीगढ़ और कर्नाटक यूनिवर्सिटी में हुए छात्र संघ के चुनाव में कांग्रेस का छात्र विंग हार गया था. 'वोट चोरी' के आरोप और छात्र आंदोलन के बाद भी Gen-Z का चुनाव भी कांग्रेस पार्टी नहीं जीत पा रही है.

सवाल- आगामी 5 राज्यों के चुनाव, खासकर यूपी में एमएलसी चुनाव के रिजल्ट का क्या असर पड़ेगा?

जवाब- मेरा अपना मानना है कि यूपी के एमएलसी चुनाव का असर विधानसभा पर ना के बराबर रहेगा. इसका कारण है कि अभी दो पक्षों का चुनाव हुआ. अभी बसपा, कांग्रेस और अन्य छोटे-बड़े दलों ने चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन विधानसभा चुनाव में सभी लड़ेंगे. हर कैंडिडेट कुछ ना कुछ वोट जरूर हासिल करेगा, तो वोट भी बंटेंगे. MLC चुनावों में सिर्फ एक विशेष वर्ग (स्नातक या शिक्षक) ने वोट डाले थे, जबकि विधानसभा चुनाव में आम जनता वोट डालेगी. उस वक्त 18 साल से ऊपर का हर शख्स वोट डालेगा. सभी के अपने-अपने मुद्दे होंगे और अपनी-अपनी विचारधारा होगी. MLC चुनाव में अक्सर कैंडिडेट को प्रमुखता दी जाती है, जबकि विधानसभा या लोकसभा चुनाव में पार्टी को प्रमुखता मिलती है. इस तरह से उस वक्त जिस दल के वादों ने जनता को लुभा लिया, उसकी सफलता की उम्मीद उतनी ही ज्यादा होगी. MLC चुनाव के नतीजों को देखकर ये नहीं सोचना चाहिए कि विधानसभा चुनाव में भी सपा इसी तरह की टक्कर दे पाएगी. अगर इन चुनावों को भी आधार मान लें, तब भी बीजेपी की सरकार बन जाएगी, क्योंकि नंबर गेम में बीजेपी ही आगे है, इसलिए उस चुनाव का अभी से अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है.

सवाल- कर्नाटक में कांग्रेस की हार राहुल 2.O पर कितना बड़ा डेंट है?

जवाब- कांग्रेस पार्टी को यह समझना चाहिए कि राहुल गांधी की रणनीति अब फ्लॉप हो चुकी है. राहुल बार-बार असफल होते हैं, लेकिन पार्टी फिर से उन्हें ही लॉन्च करने की कोशिश करती रहती है. उत्तर भारत के 5 राज्यों में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. चुनावों से पहले ही राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी हिंदुओं को नाराज करने में जुटी है. हिंदुओं का सबसे बड़ा त्योहार दिवाली आ रही है और इससे पहले दिल्ली के रामलीला मैदान में कांग्रेस की ओर से एक रैली आयोजित की जा रही है. इस रैली की वजह से हिंदुओं का त्योहार तो बर्बाद हो जाएगा. इससे सनातनी नाराज हैं. वहीं भारत जोड़ो यात्रा के दौरान मोहर्रम पड़ने से राहुल गांधी ने यात्रा रोक दी थी. उस वक्त यात्रा को रोक दिया गया था, लेकिन अब व्यापारियों की अपील के बाद भी रैली को स्थगित नहीं किया जा रहा है. इस तरह से जानबूझकर हिंदू त्योहार को टारगेट किया जा रहा है. इससे कांग्रेस ही नहीं बल्कि उसके सहयोगियों को भी बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है. वैसे भी कांग्रेस का इतिहास हिंदू विरोधियों के साथ समझौता करने का रहा है. भारत जोड़ो यात्रा में भी यही देखने को मिला था. तमिलनाडु में सनातन का विरोध करने वाली डीएमके की कांग्रेस पार्टी साथी रही है.

सवाल- यूपी में 5 सीटें जीतने वाली सपा क्या 2027 के चुनाव से ठीक पहले नैरेटिव की लड़ाई में आगे हो गई है? क्या अब अखिलेश के सामने कांग्रेस की बार्गेनिंग पावर कम होगी?

जवाब- देखिए, यूपी में कांग्रेस की बार्गेनिंग पॉवर कुछ भी नहीं है और सपा नैरेटिव सेट करने वाली पार्टी नहीं है. यूपी में कांग्रेस का जनाधार खिसक चुका है. यहां वह सपा की मदद पर ही चल रही है. विधानसभा चुनाव में सपा जितनी चाहेगी, उतनी ही सीटें देगी, कांग्रेस के पास इतनी हैसियत नहीं कि वह कोई बार्गेनिंग कर सके. दूसरी ओर, सपा ने कभी नैरेटिव सेट नहीं किया. गोधरा कांड के बाद गुजरात के मुसलमान काफी नाराज थे और चुनाव में नरेंद्र मोदी को हटाने के लिए एकजुट हो रहे थे, तब सपा वहां करीब 65 सीटों पर चुनाव लड़ गई थी. इससे मुस्लिम समाज का वोट कांग्रेस और सपा में बंट गया था और इसका सीधा फायदा बीजेपी को मिला था. सपा के चुनाव लड़ने के कारण ही बीजेपी फिर से चुनाव जीत गई थी और नरेंद्र मोदी फिर से मुख्यमंत्री बने थे. ये दल किसी का नहीं हो सकता. इसने ना तो हिंदुओं का भला किया और ना ही कभी मुसलमानों के लिए सोचा.

Add Zee News as a Preferred Source

About the Author

K. Raj Mishra

K. Raj Mishra

कर्मराज मिश्रा ज़ी न्यूज (डिजिटल) टीम में बतौर चीफ सब एडिटर कार्यरत हैं. वे यहां देश-विदेश की राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लिखते हैं. कानपुर यूनीवर्सिटी से पत्रकारिता में मास्टर की डिग्री हासिल करके IBN-7 न्यूज चैनल से इंटर्नशिप की. इसके बाद खबर फास्ट, नेशन लाइव और साधना न्यूज न्यूज चैनलों में काम करने के बाद डिजिटल का रुख किया और 2017 से 2020 तक हिंदुस्थान समाचार न्यूज एजेंसी में बतौर सीनियर सब एडिटर काम किया. इसके बाद News Nation, India Ahead के बाद वर्तमान में Z Media का हिस्सा हैं. मीडिया में 10 साल के कार्यकाल के दौरान यूपी, बिहार, छत्तीसगढ़ और दिल्ली विधानसभा चुनावों के अलावा 2019 और 2024 का लोकसभा चुनाव कवर किया है.
Read More