पंजाब में BJP के ‘चाणक्य’ की चाल: नशे पर वार, सत्ता पर नजर! अमित शाह के NDA वाले दांव से पलटेगी बाजी?
अमित शाह को बीजेपी का चाणक्य यूं ही नहीं कहा जाता. न जाने कितनी जीतों के सूत्रधार शाह को चुनावी रणनीति बनाने में महारथ हासिल है. 'गुरुओं की धरती' में एक्टिव शाह ने नशे की समस्या को दो साल में खत्म करने का दावा कर NDA सरकार का संदेश दिया है. उनके बयान ने एक बार फिर पंजाब में बीजेपी के सियासी पार्टनर से जुड़ी अटकलों को हवा दे दी है.
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ड्रग्स माफिया और नशे के सौदागरों की कमर तोड़कर नशे के दलदल में फंसे युवाओं को खुशहाल भविष्य देने का दावा अक्सर करते हैं. नशे के विरुद्ध युद्ध में ब्रिक्स देशों के मंत्रियों की बैठक करा चुके शाह का फोकस पंजाब जीतने पर है. इसी मुहिम के तहत शाह पंजाब में सेवा-समर्पण के साथ नशामुक्त सुशासन का राज देने की बातें कर रहे हैं. वोटर लिस्ट के पहले पन्ने से आखिरी पेज तक का हिसाब लगाने में माहिर अमित शाह अपने पन्ना प्रमुख से लेकर बूथ प्रमुखों तक सीधे कनेक्ट करते हैं. बीजेपी की चुनावी जीत को लेकर उनका स्ट्राइक रेट इतना शानदार है कि उनके कौशल की तारीफ उनके धुर-विरोधी भी करते हैं.
यूं तो अभी पंजाब चुनाव होने में करीब 4 महीने का वक्त बाकी है, लेकिन अमित शाह काफी समय पहले से ही विधानसभा चुनाव को लेकर एक्शन मोड में हैं.
नशा मुक्त पंजाब
शाह ने अपने हालिया पंजाब दौरे में दावा किया कि अगर पंजाब की एनडीए की सरकार बनती है, तो दो साल के भीतर पंजाब में 'नशे की समस्या' को पूरी तरह खत्म किया जा सकता है. इसके बाद पूरे पंजाब में बीजेपी चर्चा के केंद्र में आ गई. उनका ये दावा न तो बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया था और न ही सतही था. सीमावर्ती राज्य पंजाब में नशे की समस्या की गंभीरता को देखते हुए इसे व्यावहारिक लक्ष्य के तौर पर पेश किया गया.
भारत में बीते एक दशक में नशे के कारोबारियों के उखड़ते पांव और नशे की खेप की भारी बरामदगी के बीच उनकी छवि कुछ ऐसी बन रही है कि शायद ये शख्स पंजाब राज्य को नशे के दलदल से बाहर निकाल सकता है. वैसे भी अमित शाह वही नेता हैं, जिन्होंने 5 अगस्त 2019 को एक सोची-समझी और कानूनी रूप से मजबूत संवैधानिक रणनीति के जरिए जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा प्रभावी रूप से खत्म कर दिया था.
पंजाब की राजनीति की पटकथा
इस कड़ी में शाह के पंजाब दौरे के कई मायने निकाले जा रहे हैं. एनडीए सरकार वाले उनके बयान के बाद एक बार फिर से पंजाब में बीजेपी-अकाली दल के गठबंधन की अटकलें लगाई जाने लगी हैं, हालांकि उन्होंने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया कि बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल या उसके टूटकर बने गुटों के बीच गठबंधन जल्द होने वाला है. हालांकि, जमीनी स्तर पर दोनों तरफ के कार्यकर्ता इस दिशा में लगातार सक्रिय हैं.
सियासी हांडी में क्या पक रहा?
पंजाब के पॉलिटिकल पंडितों का मानना है कि ऐतिहासिक रूप से पंजाब ने हमेशा से मजबूत व्यक्तित्व वाले नेताओं का साथ दिया है. खासकर ऐसे नेताओं, जिनका कामकाज का रिपोर्ट कार्ड अच्छा रहा हो या फिर ऐसे नेता जो पुरानी घिसी-पिटी लीक वाली व्यवस्था को चुनौती देकर मुश्किल वक्त में नतीजे देने की क्षमता रखते हों.
शाह की 'रण'नीति
1. अमित शाह ने दावा किया कि NDA की सरकार बनने पर पंजाब में 2 साल के भीतर नशे की समस्या खत्म की जा सकती है.
2. मार्च में मोगा की एक रैली में शाह ने कहा था कि बीजेपी 2027 का विधानसभा चुनाव अपनी सरकार बनाने के लिए लड़ेगी. तब उन्होंने याद दिलाया था कि अकाली दल के साथ गठबंधन में बीजेपी हमेशा ‘छोटे भाई’ की भूमिका में रही है.
3. बीजेपी नेता सिख समुदाय तक पहुंच बनाने के लिए किए गए अपने प्रयासों का भी जिक्र करते हैं. शाह खुद करतारपुर कॉरिडोर, वीर बाल दिवस जैसे प्रयासों के उदाहरण गिना चुके हैं.
4. पंजाब चुनाव लड़ने के लिए बीजेपी ने हरियाणा को वार रूम बनाया है. इसी साल सुखबीर बादल ने हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी से भी मुलाकात की थी. सैनी को पंजाब में बीजेपी के अहम राजनीतिक संपर्कों में से एक माना जाता है.
5. बीजेपी ने हाल ही में 15 दिन की नशा मुक्त पंजाब यात्रा निकाली. राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने उसमें शिरकत करके जनता को यह भरोसा दिलाने की कोशिश की कि बीजेपी की डबल इंजन सरकार ही पंजाब को नशा मुक्त कर सकती है.
6. जुलाई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जालंधर में 5,470 करोड़ रुपये की परियोजनाओं का उद्घाटन किया.
7. पीएम मोदी ने भी समय-समय पर पंजाब के विकास का भरोसा दिलाया है. अगस्त में सुखबीर बादल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की.
8. पंजाब बीजेपी के प्रमुख केवल सिंह ढिल्लों ने अगस्त में कहा था कि प्रदेश इकाई सभी 117 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है.
9. BJP और अकाली दल ने 2020 में कृषि कानूनों को लेकर अपना पुराना गठबंधन तोड़ दिया था. बाद में इन कृषि कानूनों को वापस ले लिया गया.
10. कुछ समय पहले शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख ने संसद भवन परिसर स्थित पार्लियामेंट एनेक्सी में प्रधानमंत्री से मुलाकात की थी. वहीं, अलग होकर बने अकाली दल (पुनर सुरजीत) गुट की BJP के साथ बातचीत चल रही है.
अमित शाह ने भले ही गठबंधन को लेकर खुलकर कुछ नहीं कहा लेकिन बीजेपी का नेचुरल अलायंस पार्टनर कौन हो सकता है इसका जवाब कोई भी आसानी से दे सकता है.
BJP-अकाली दल साथ आए तो कैसे बदलेगा सियासी गणित?
पंजाब लंबे समय से इस राजनीतिक घटनाक्रम का इंतजार कर रहा है. बीजेपी और अकाली दल का गठबंधन तमाम चुनावी सर्वेक्षणों के अनुमानों को उलट सकता है और राज्य की राजनीति की दिशा बदल सकता है. राज्य के राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अगर गठबंधन आकार लेता है, तो सत्ता का संतुलन बड़े पैमाने पर बदल सकता है.
ऐसा होने पर ये गठबंधन राज्य के कोर वोटबैंक तक अपनी पहुंच बना सकता है. ऐसा हुआ तो शहरी और ग्रामीण मतदाताओं के साथ हिंदू और सिख समुदायों के मतदाताओं को भी एक साझा राजनीतिक मंच पर लाकर उनसे सीधा कनेक्ट किया जा सकता है. पहले भी दोनों इसी समीकरण के आधार पर मुश्किल दौर में पंजाब में सरकार बना चुके हैं.
गौरतलब है कि बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल ने पहले 1997-2002, 2007-12 और 2012-17 के दौरान पंजाब में मिलकर सरकार बना चुके हैं.
पंजाब का चुनावी कार्यक्रम
शाह के पंजाब दौरे और नशे के खिलाफ उनके वादे ने राज्य की चुनावी राजनीति में बीजेपी की रणनीति को फिर चर्चा में ला दिया है. बीजेपी नशा मुक्त पंजाब का मुद्दा उठा रही है. शिरोमणि अकाली दल के साथ संभावित समीकरणों पर भी उसकी निगाहें टिकी हुई हैं.
गठबंधन को लेकर अटकलों और आधिकारिक फैसले के जमीन-आसमान जितना फर्क हो सकता है. ऐसे में अधिकारिक बयान आने के बाद ये देखना दिलचस्प होगा कि पंजाब में भारतीय जनता पार्टी की सियासत का ऊंट किस करवट बैठेगा.