गाजा वॉर में खोया बेटा और दो भतीजे, संभाल चुके हैं इजरायली फौज की कमान, कौन हैं गादी आइजेकोट; जिनकी नेतन्याहू से है सीधी टक्कर
इजरायल में 27 अक्टूबर को संसदीय चुनाव होने हैं. प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए यह चुनाव एक बड़ी चुनौती है. उनके सामने हैं पूर्व आर्मी चीफ गादी आइजेनकोट. क्या वह उनको टक्कर दे पाएंगे, चलिए समझते हैं.
भारत के अजीज दोस्त इजरायल में 27 अक्टूबर को आम चुनाव होने जा रहे हैं. अक्टूबर 2023 के दर्दनाक हमले, फिर गाजा पर अटैक और ईरान व लेबनान के साथ हुए युद्ध के बाद देश में यह पहला राष्ट्रीय चुनाव है.
यह चुनाव मौजूदा प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए किसी 'अग्निपरीक्षा' से कम नहीं है. नेतन्याहू के प्रतिद्वंद्वी हैं गादी आइजेनकोट, जो इजरायल के पूर्व आर्मी चीफ रह चुके हैं और यशार पार्टी के नेता हैं. उनके बारे में आपको बताएंगे लेकिन पहले इस चुनाव के बारे में जान लेते हैं.
साल 1988 के बाद यह पहला मौका है, जब इजरायल की संसद, जिसे नेसेट भी कहा जाता है, वक्त से पहले भंग हुए बिना 4 साल का कार्यकाल पूरा करके इलेक्शन में जा रही है.
नेसेट का क्या है गणित?
नेसेट में 120 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए किसी पार्टी या गठबंधन को 61 सीटों के जादुई आंकड़े की जरूरत होती है. इजरायल के चुनाव में प्रोपोर्शनल रिप्रेजेंटेशन सिस्टम इस्तेमाल होता है. यानी लोग किसी उम्मीदवार का चुनाव नहीं करते बल्कि उनका वोट पार्टी की एक पूरी लिस्ट को जाता है. संसद में एंट्री करने के लिए किसी भी पार्टी के लिए कम से कम 3.25 प्रतिशत वोट हासिल करना जरूरी है.
अब बात करते हैं नेतन्याहू के सामने खड़े गादी आइजेनकोट की. उनके लिए सबसे अहम बड़ी चुनावी ताकतों में एक यही है कि वह बेंजामिन नेतन्याहू नहीं हैं. सीएनएन के मुताबिक, शायद इजरायल के बेहद अहम चुनाव में से एक में, बहुत सारे यहूदी मतदाताओं के लिए यही सबसे बड़ी बात है.
लेकिन उनकी एक और खूबी तब एक बड़ा सियासी विवाद बन गई, जब नेतन्याहू के करीबी माने जाने वाले मशहूर टीवी होस्ट यिनोन मगल ने उन पर तीखा हमला बोला. नस्लीय टिप्पणी करते हुए, मगल ने आइजेनकोट को 'मिजराही-मोरक्कन' मूल का एक 'बंदर' बताया.
इस बयान ने यूरोपीय मूल के यहूदियों और मध्य पूर्व से आए यहूदियों के बीच लंबे समय से चली आ रही असमानताओं को सामने ला दिया. बाद में मगल ने दावा किया कि उनका मकसद आइजेनकोट के बैकग्राउंड का मजाक उड़ाना नहीं था; बल्कि, उन्होंने अंडरवर्ल्ड की एक शब्दावली का इस्तेमाल किया था, जिसका मतलब होता है-पर्दे के पीछे से कंट्रोल किए जाने वाला कोई शख्स (फ्रंटमैन). यहां तक कि नेतन्याहू ने भी इन टिप्पणियों की निंदा की.
क्या है आइजेनकोट का पारिवारिक इतिहास
लेकिन, बावजूद इसके हर किसी का ध्यान आइजेनकोट के परिवारिक इतिहास पर जरूर गया है. सालों से, कई मिजराही (मध्य पूर्वी मूल के यहूदी) वोटर्स पारंपरिक रूप से नेतन्याहू की लिकुड पार्टी का समर्थन करते आए हैं. 66 वर्षीय आइजेनकोट मोरक्को से आए प्रवासियों के बेटे हैं और बाद में इजराइल के आर्मी चीफ बने. उनका बचपन तिबेरियास और इलियट में बीता, जो देश की राजनीतिक सत्ता के केंद्रों से दूर है. उनकी कहानी, नेतन्याहू से बिल्कुल अलग है, जो यरुशलम के सत्ताधारी एलीट हलकों में पले-बढ़े है.
आइजेनकोट शायद ही कभी अपने बैकग्राउंड का जिक्र करते हैं, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि यही बात लोगों के बीच उनकी पॉपुलेरिटी बढ़ा रही है. एक साल पहले तक उनके समर्थन के आंकड़े सिंगल डिजिट (10 से कम) में थे, लेकिन अब वे मंगलवार को होने वाले मतदान में नेतन्याहू को सत्ता से हटाने के लिए विपक्ष के प्रमुख उम्मीदवार के रूप में उभरे हैं. इजराइल में अब तक कोई मिजराही प्रधानमंत्री नहीं रहा है. अगर आइजेनकोट जीतते हैं, तो यह इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाएगा. यह तो हुआ उनका पारिवारिक इतिहास. अब उनके बारे में जान लेते हैं.
गादी आइजेनकोट कौन हैं?
आइजेनकोट नौ बच्चों में से दूसरे हैं और खुद पांच बच्चों के पिता हैं. उन्होंने अपना ज्यादातर जीवन इजरायल डिफेंस फोर्स (IDF) में बिताया है, इसलिए राजनीति में वे अभी नए ही हैं. उनके कार्यकाल के दौरान इजरायल के हालिया सैन्य इतिहास की सबसे विवादास्पद घटनाओं में से एक घटी. 2016 में, सार्जेंट एलोर अजारिया ने हेब्रोन में एक घायल फिलिस्तीनी हमलावर को गोली मार दी, जिससे उसकी मौत हो गई. नेतन्याहू समेत दक्षिणपंथी राजनेताओं के दबाव के बावजूद, आइजेनकोट ने सैन्य जांच और मुकदमे का समर्थन किया. उन्होंने कहा कि वे सेना के अनुशासन और नैतिक मूल्यों की रक्षा कर रहे थे.
जंग में खो चुके हैं बेटा और दो भतीजे
वे 2022 में सेना के एक अन्य पूर्व चीफ ऑफ स्टाफ, बेनी गैंट्ज के साथ राजनीति में आए. 7 अक्टूबर 2023 को जब हमास ने इजरायल पर हमला किया तो उसके बाद दोनों नेतन्याहू की इमरजेंसी वॉर कैबिनेट में शामिल हो गए. लेकिन जून 2024 में उन्होंने यह कहते हुए कैबिनेट छोड़ दी कि जंग के बाद की कोई साफ नीति नहीं है. तब तक, जंग के कारण आइजेनकोट के परिवार को भारी नुकसान उठाना पड़ा. दिसंबर 2023 में, जंग शुरू होने के दो महीने बाद, उनका सबसे छोटा बेटा 25 साल का बेटा गैल गाजा में लड़ते हुए मारा गया. उनके दो भतीजे भी लड़ाई में मारे गए.
आइजेनकोट को जीतने के लिए क्या करना होगा?
चुनाव के आखिरी दौर में आइजेनकोट विपक्ष के सबसे मजबूत उम्मीदवार के तौर पर उभरे हैं. हाल के ज्यादातर ओपिनियन पोल बताते हैं कि उनकी पार्टी 'यशार' को नेसेट में 120 सीटों में से 20 से 23 सीटें मिल सकती हैं, जो लिकुड पार्टी से ज्यादा हैं. प्रधानमंत्री बनने के लिए सबसे पॉपुलर शख्स कौन है, इस पर हुए पोल में भी वे नेतन्याहू से आगे हैं.
लेकिन जीत पक्की नहीं है. ओपिनियन पोल के आंकड़े उतने मायने नहीं रखते, जितना कि इजरायल में गठबंधन का गणित.
इजरायली सिस्टम के तहत, अगर आइजेनकोट की पार्टी सबसे ज्यादा सीटें जीत भी लेती है, तो भी राष्ट्रपति उन्हें अपने आप सरकार बनाने के लिए नहीं बुलाते. सरकार बनाने का मौका उस नेता को दिया जाता है, जिसके पास गठबंधन बनाने की सबसे ज्यादा संभावना हो. और यहीं से असली गणित शुरू होता है.
डेडलॉक की संभावना
ओपिनियन पोल बताते हैं कि न तो नेतन्याहू का गुट और न ही नेतन्याहू-विरोधी गुट, 61 सीटों के बहुमत तक पहुंच पा रहा है. ऐसे में डेडलॉक की पूरी संभावना है.
सत्ता तक पहुंचने के लिए आइजेनकोट को वामपंथी, दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी पार्टियों को साथ लाना होगा. कुछ स्थितियों में, उन्हें अरब पार्टियों के समर्थन की भी जरूरत पड़ सकती है. नेतन्याहू ने सालों तक अरब पार्टियों के साथ किसी भी तरह के सहयोग को गलत ठहराने की कोशिश की है, और विपक्ष के कुछ अन्य नेताओं ने भी साफ कह दिया है कि वे अरब पार्टियों के साथ काम नहीं करेंगे.
आइजेनकोट ने कहा है कि वे 61 सीटों के बिना भी सरकार बनाने की कोशिश करेंगे. इससे एक ऐसी 'अल्पमत सरकार' बनने की संभावना है, जिसे बाहर से अरब पार्टियों का समर्थन हासिल हो. लेकिन उनके गठबंधन में शामिल होने वाली दक्षिणपंथी पार्टियां इस विकल्प को खारिज कर सकती हैं.
नेतन्याहू से कितने अलग हैं आइजेनकोट?
आइजेनकोट स्वभाव, काम करने के तरीके और मिजाज के मामले में नेतन्याहू से बिल्कुल अलग हैं. उनके चुनावी होर्डिंग्स में उन्हें 'योद्धा, नेता और सबको साथ लाने वाले' के रूप में पेश किया गया है. उनकी पार्टी का नाम 'यशार' है, जिसका हिब्रू भाषा में मतलब होता है 'सीधा'. यह नाम 7 अक्टूबर को बंधक बनाए गए एली शराबी के एक बयान से प्रेरित है, जिसमें उन्होंने कहा था-'यह न तो दायां है, न बायां, यह सीधा है.'
उनके चुनावी अभियान के मुख्य वादे घरेलू मुद्दों और जवाबदेही पर टिके हैं. उन्होंने 7 अक्टूबर की नाकामी की जांच के लिए एक राज्य आयोग गठित करने का वादा किया है. इस कदम का नेतन्याहू ने जंग शुरू होने के बाद से ही विरोध किया है. उन्होंने सभी नागरिकों के लिए अनिवार्य सैन्य सेवा या राष्ट्रीय सेवा लागू करने का भी वादा किया है; जबकि मौजूदा गठबंधन सरकार उन पार्टियों पर निर्भर है जो ज्यादा-रूढ़िवादी यहूदियों को पूरी तरह से छूट दिए जाने की मांग करती हैं.
हालांकि, सुरक्षा के मामले में उनका रुख काफी सख्त है और कई मुद्दों पर वे नेतन्याहू से सहमत हैं. नेतन्याहू के लगभग सभी विरोधियों की तरह, उन्होंने भी गाजा, लेबनान और ईरान में इजरायली सैन्य अभियानों का मोटे तौर पर समर्थन किया है.
दहिया सिद्धांत से जुड़े हैं
IDF में वह दहिया सिद्धांत (Dahiyeh doctrine) से जुड़े हैं, जिसमें भविष्य के आतंकी हमलों को रोकने के लिए आम नागरिकों के बुनियादी ढांचे पर ज्यादा फोर्स का इस्तेमाल किया जाता है. इसके अलावा, वे युद्धों के बीच अभियान की रणनीति के भी समर्थक हैं, जिसमें गुप्त और सीमित स्तर के अभियान चलाए जाते हैं, ताकि फुल वॉर के बिना दुश्मन की क्षमताओं को कमजोर किया जा सके.
हालांकि, ईरान के संबंध में, उनकी और नेतन्याहू की सोच एक जैसी है- ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना और तेहरान के प्रॉक्सी नेटवर्क को कमजोर करना. हालांकि, उन्होंने मौजूदा संघर्ष में साफ रणनीति की कमी की आलोचना की है और उनका तर्क है कि सैन्य सफलताओं के साथ-साथ कूटनीति का होना भी जरूरी है.
उन्होंने गाजा युद्ध को संभालने के तरीके को लेकर नेतन्याहू की लगातार कड़ी आलोचना की. उन्होंने प्रधानमंत्री पर राजनीतिक कारणों से जंग को लंबा खींचने और इजरायली बंधकों की जान खतरे में डालने का आरोप लगाया. इसी आरोप के चलते उन्होंने वॉर कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया था.
फिलिस्तीनियों के लिए क्या है उनकी नीति?
आइजेनकोट मिलिट्री से आते हैं. और उनके गठबंधन सहयोही दक्षिणपंथी पार्टियों से हो सकते हैं, जो इजरायल की रणनीतिक दिशा में कोई बड़ा बदलाव स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं. गाजा को लेकर, उन्होंने 18 महीनों के भीतर हमास के शासन को खत्म करने का वादा किया है. चाहे वह ट्रंप की युद्धविराम योजना को लागू करके हो, या उनके बताए गए 'क्रिएटिव' मिलिट्री ऑपरेशन के जरिए.
देखा जाए तो नेतन्याहू के टारगेट भी काफी हद तक ऐसे ही हैं, लेकिन आइजेनकोट का तर्क है कि जब तक नेतन्याहू सत्ता में हैं, तब तक हमास भी सत्ता में बना रहेगा.
राजनीति में आने से पहले, आइजेनकोट ने चेतावनी दी थी कि वेस्ट बैंक के कब्जे वाले इलाकों में फिलिस्तीनियों पर इजराइल का लगातार कंट्रोल टू नेशन स्टेट बनने का खतरा पैदा करता है. हालांकि, 7 अक्टूबर के बाद से उन्होंने 'टू-स्टेट सॉल्यूशन'को खारिज कर दिया है. हाल के एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि जो कोई भी अभी भी इसका समर्थन करता है, वह 'भ्रम में है'. लेकिन खुद उन्होंने इसका कोई वैकल्पिक विजन पेश नहीं किया.
वह इस इलाके को अपने में मिलाने और अवैध बस्तियों का विरोध करते हैं. उन्होंने वेस्ट बैंक के विवादित E1 इलाके में कंस्ट्रक्शन करने की इजराइली सरकार की योजना को 'गलती' बताया है, क्योंकि इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नुकसान उठाना पड़ सकता है.
ट्रंप के साथ उनके संबंध कैसे रह सकते हैं?
ट्रंप अपनी पसंद पहले ही साफ कर चुके हैं और उन्होंने नेतन्याहू को 'महान योद्धा प्रधानमंत्री' कहकर अपना समर्थन दिया.उन्होंने चेतावनी दी कि कोई और शख्स 'गलत नेता' साबित होगा,जिसका मतलब यह है कि फिर अमेरिका को ईरान का सामना अकेले ही करना पड़ेगा.
इस मामले की जानकारी रखने वाले इजरायली सूत्रों के मुताबिक, आइजेनकोट और विपक्ष के अन्य नेताओं ने रिपब्लिकन पार्टी की बड़ी दानदाता मिरियम एडेलसन जैसे मध्यस्थों के जरिए व्हाइट हाउस से अनुरोध किया था कि वे इस चुनावी दौड़ से दूर रहें. लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ. नेतन्याहू और ट्रंप का एक लंबा इतिहास रहा है, जिसमें 2017 में यरुशलम में अमेरिकी दूतावास का ट्रांसफर, 2018 में ईरान परमाणु समझौते से बाहर निकलना, 2020 के 'अब्राहम समझौते' और 2025-2026 में ईरान पर किए गए हमले जैसी घटनाएं शामिल हैं. जब राजनीतिक विश्लेषक बराक राविद ने ट्रंप से पूछा कि क्या वह किसी दूसरे प्रधानमंत्री के साथ काम कर सकते हैं, तो उन्होंने जवाब दिया, 'शायद करूं, शायद न करूं, कौन जोखिम लेना चाहेगा?'